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श्रम विभाग में 125 करोड़ का घोटाला उजागर अफसरों और निजी अस्पतालों की साठगांठ से हड़कंप

देहरादून/काशीपुर(सुनील कोठारी)। राज्य की राजनीति और प्रशासन को हिला देने वाला एक बड़ा घोटाला सामने आया है, जिसने सरकार की योजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विभाग की जिम्मेदारी होने के बावजूद इस विभाग की बागडोर उन्हीं अफसरों ने अपने हाथ में ले ली, जिन पर जनता की सेवा का दायित्व था। आश्चर्यजनक रूप से इन्हीं अधिकारियों ने कुछ निजी अस्पतालों के साथ मिलकर 125 करोड़ रुपये का भारी घोटाला कर डाला। जब इस घोटाले की परतें खुलनी शुरू हुईं, तो शासन-प्रशासन से लेकर आम जनता तक हर कोई दंग रह गया। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर यह भ्रष्टाचार इतने लंबे समय तक बिना किसी रोक-टोक के कैसे चलता रहा और जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी आंखें क्यों मूंदी रखीं।

राज्य की कल्याणकारी योजनाओं का उद्देश्य गरीब और श्रमिक वर्ग तक लाभ पहुंचाना था, लेकिन इस मामले ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वाकई ये योजनाएं उन तक पहुंच रही हैं जिनके लिए बनाई गई थीं। सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के बजाय कुछ अफसरों और निजी अस्पतालों की मिलीभगत ने गरीब मजदूरों की राहत राशि को अपनी जेबों में डाल लिया। यह मामला श्रम विभाग से जुड़ा है—वह विभाग जो गरीब मजदूरों की भलाई के लिए काम करता है और कारखानों में कार्यरत निम्न स्तर के कर्मचारियों को मुफ्त इलाज की सुविधा देता है। लेकिन यही विभाग अब भ्रष्टाचार का गढ़ बन गया है। जब यह खुलासा हुआ, तो विभागीय गलियारों में हड़कंप मच गया और कई अधिकारी अपने बचाव में जुट गए।

इस गड़बड़ी का पर्दाफाश तब हुआ जब वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सी. रवि शंकर को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई। प्रारंभिक जांच में उन्होंने लगभग 6,657 मामलों का सैंपल लिया, जिनमें से 2,843 मामलों में गंभीर अनियमितताएं पाई गईं। पहले चरण में लगभग 25 करोड़ रुपये का घोटाला उजागर हुआ, लेकिन पूरे मामले का पैमाना इससे कहीं बड़ा निकला। जांच रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि कुल घोटाला लगभग 125 करोड़ रुपये का है। इस भारी भरकम रकम की पुष्टि के लिए विस्तृत जांच और विशेष ऑडिट की सिफारिश की गई है। जांच के दौरान यह पाया गया कि अस्पतालों में मामूली बीमारी जैसे सर्दी-खांसी या खरोंच पर भी हजारों रुपये के टेस्ट करा दिए जाते थे। सीटी स्कैन, एमआरआई और अल्ट्रासाउंड जैसी जांचें बिना जरूरत के कराई गईं ताकि बिल बढ़ाया जा सके।

विभाग और अस्पतालों के बीच इस गहरी साठगांठ का तरीका बेहद चालाकी भरा था। जिन अस्पतालों को गरीब श्रमिकों का मुफ्त इलाज करना था, वे मरीजों की फर्जी फाइलें बनाकर इलाज के नाम पर मोटी रकम वसूलते रहे। सरकारी रिकॉर्ड में उन मरीजों के नाम दर्ज कर दिए जाते जो कभी अस्पताल पहुंचे ही नहीं। डॉक्टरों और प्राइवेट अस्पतालों के बीच तय दरें तो थीं, लेकिन यह तय नहीं था कि कितने मरीजों का इलाज होगा या किस बीमारी पर कौन-सा टेस्ट होगा। यही छूट भ्रष्टाचार की जड़ बनी। जब सी. रवि शंकर की जांच टीम ने दस्तावेजों की छानबीन की तो कई हैरान करने वाले तथ्य सामने आए—नकली मेडिकल रिपोर्टें, डुप्लिकेट बिल और फर्जी साइन तक।

जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि यह घोटाला राज्य के कई औद्योगिक इलाकों तक फैला हुआ है। हरिद्वार, सितारगंज, काशीपुर और देहरादून में स्थित कई निजी अस्पताल इसमें शामिल पाए गए। रिपोर्ट के मुताबिक, केवल हरिद्वार में लगभग 90 करोड़ रुपये की वसूली की सिफारिश की गई है, जबकि काशीपुर से 10 करोड़, सितारगंज से 8.5 करोड़ और देहरादून से 1.5 करोड़ रुपये की रिकवरी का प्रस्ताव रखा गया है। कुल मिलाकर राज्यभर में भ्रष्टाचार का ऐसा नेटवर्क सामने आया जिसने मजदूरों के अधिकारों को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

जांच रिपोर्ट के आधार पर 15 निजी अस्पतालों की मान्यता तत्काल प्रभाव से रद्द कर दी गई है और उनके विरुद्ध जुर्माना वसूली की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। इन अस्पतालों को श्रम विभाग की सूची से हटा दिया गया है ताकि अब कोई कर्मचारी या श्रमिक इनसे मुफ्त इलाज न करा सके। रिपोर्ट को श्रम विभाग के सचिव को सौंप दिया गया है और यह स्पष्ट किया गया है कि आगे की कार्रवाई के लिए विस्तृत जांच अनिवार्य है। इस पूरी जांच प्रक्रिया की शुरुआत जुलाई 2024 में हुई थी और लगभग डेढ़ साल की मेहनत के बाद 15 अक्टूबर 2025 को रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।

अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार अगला कदम कब उठाएगी। क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई होगी, या यह मामला भी किसी अन्य घोटाले की तरह फाइलों में दब जाएगा? यह भी महत्वपूर्ण है कि जिन अफसरों को निगरानी की जिम्मेदारी दी गई थी, वे इतने लंबे समय तक इस गड़बड़ी को कैसे अनदेखा करते रहे। क्या उनके खिलाफ भी जांच होगी या वे बच निकलेंगे? इन सभी प्रश्नों के उत्तर अभी भविष्य की गर्भ में छिपे हैं।

फिलहाल इतना तय है कि निजी अस्पतालों और श्रम विभाग के अफसरों की इस मिलीभगत ने गरीब मजदूरों की मेहनत की कमाई को ठगा है। जिन पैसों से उनका इलाज होना था, वे पैसे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। अब यह देखना बाकी है कि विस्तृत जांच के बाद कौन दोषी साबित होता है और कौन खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश करता है। जनता अब सरकार की ओर देख रही है कि क्या मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस बड़े घोटाले में शामिल जिम्मेदारों को सजा दिलाने में सफल होंगे या यह भी एक और अधूरा अध्याय बनकर रह जाएगा।

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