रामनगर। उत्तराखंड की राजनीति इन दिनों एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां जनता की भागीदारी धीरे-धीरे सिमटती जा रही है और कुछ प्रभावशाली परिवारों का वर्चस्व बढ़ता नज़र आ रहा है। सवाल उठता है कि क्या वह पार्टी, जिसने कभी कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाकर सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ीं, अब उसी रास्ते पर चल पड़ी है? उत्तराखंड की राजनीति में बीते कुछ वर्षों में भाजपा की स्थिति का अवलोकन करें तो यह साफ़ झलकता है कि पार्टी के भीतर “नेपोटिज़्म” का जाल फैलता जा रहा है। सत्ता की चकाचौंध के बीच कार्यकर्ताओं की मेहनत और जनता के विश्वास की जगह अब नेताओं के रिश्तों और पारिवारिक नामों ने ले ली है, जिससे पार्टी के आदर्श और व्यवहार में स्पष्ट विरोधाभास उभर रहा है।
राजनीति के जानकार कहते हैं कि भाजपा, जिसने कांग्रेस को ‘परिवार की पार्टी’ कहकर घेरा था, अब उसी राजनीति का हिस्सा बनती दिख रही है। बीते दस वर्षों के भीतर उत्तराखंड में हुए उपचुनाव इसका प्रमाण हैं, जहां दिवंगत नेताओं की सीटों पर उनके परिवार के सदस्यों को टिकट देना एक परंपरा बन गई। विधायक मंगल लाल शाह की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी मुन्नी देवी शाह, प्रकाश पंत के निधन के बाद उनकी पत्नी चंद्रा पंत, हरबंस कपूर की विरासत उनकी पत्नी सविता कपूर और चंदन रामदास के बाद उनकी पत्नी पार्वती दास को टिकट मिला। इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि भाजपा भी अब उस भावनात्मक राजनीति का उपयोग कर रही है, जिसे वह कभी अवसरवादी कहती थी।
हालांकि दिलचस्प बात यह है कि यह परंपरा केवल पुरुष नेताओं के परिवार तक ही सीमित रही है। महिला नेताओं की विरासत को उनके परिवार में आगे नहीं बढ़ाया गया। जैसे केदारनाथ की विधायक शैला रानी रावत की मृत्यु के बाद टिकट उनकी बेटी ऐश्वर्या रावत के बजाय आशा नौटियाल को दिया गया। इससे यह सवाल उठता है कि क्या भाजपा का परिवारवाद भी पितृसत्तात्मक मानसिकता से संचालित है? राजनीति के विश्लेषक मानते हैं कि पार्टी में यह प्रवृत्ति अब अपवाद नहीं रही, बल्कि एक स्थापित परंपरा का रूप ले चुकी है।
यदि विधानसभा चुनावों की बात की जाए, तो यह प्रवृत्ति और भी स्पष्ट हो जाती है। 2022 के चुनाव में भाजपा ने करीब 20 प्रतिशत टिकट उन्हीं परिवारों को दिए जिनके सदस्य पहले से सत्ता में थे। काशीपुर से हरभजन सिंह चीमा के बेटे त्रिलोक सिंह, खानपुर से कुंवर प्रणव सिंह चौंपियन की पत्नी कुमरानी देवयानी, सल्ट से सुरेंद्र सिंह जीना के भाई महेश जीना, पिथौरागढ़ से चंद्रा पंत, लैंसडाउन से भारत सिंह रावत के बेटे दिलीप सिंह रावत, सितारगंज से विजय बहुगुणा के बेटे सौरव बहुगुणा, देहरादून कैंट से हरबंस कपूर की पत्नी सविता कपूर और कोटद्वार से बीसी खंडूरी की बेटी रितु खंडूरी को टिकट देना इसका प्रमाण है। यह वही रितु खंडूरी हैं जिनके पास राजनीतिक अनुभव सीमित था, फिर भी उन्हें पहले यमकेश्वर और बाद में दूसरी सीट पर उतारा गया।
भाजपा की यह प्रवृत्ति केवल विधानसभा चुनावों तक सीमित नहीं रही। पंचायत चुनावों में भी नेताओं के रिश्तेदारों की भागीदारी खुलकर सामने आई। नैनीताल विधायक सरिता आर्या के बेटे रोहित आर्या, सल्ट विधायक महेश जीना के बेटे करण, भीमताल विधायक राम सिंह कैड़ा की पत्नी कमलेश कैड़ा, लैंसडाउन विधायक दिलीप रावत की पत्नी नीतू रावत और विकासनगर विधायक मुन्ना चौहान की पत्नी मधु चौहान ने चुनाव लड़ा। इन सभी ने सत्ता के प्रभाव का उपयोग करते हुए जनता के बीच अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की, लेकिन दिलचस्प यह रहा कि कई लोग जनता का समर्थन पाने में नाकाम रहे। इससे यह साफ़ झलकता है कि जनता अब वंशवाद की राजनीति को नकारने लगी है, चाहे वह किसी भी पार्टी की हो।
अगर संगठनात्मक स्तर की बात करें तो यह प्रवृत्ति वहां भी गहरी जड़ें जमा चुकी है। युवा मोर्चा, जिसे भाजपा अपनी भविष्य की ताकत कहती है, वहां भी नेताओं के बेटे-बेटियां प्रमुख पदों पर हैं। मंत्री गणेश जोशी की बेटी नेहा जोशी, दिवंगत नेता बच्चा सिंह रावत के बेटे शशांक रावत और विधायक वंशीधर भगत के बेटे विकास भगत जैसे नाम यह दर्शाते हैं कि युवा नेतृत्व का चेहरा भी अब परिवारवाद के घेरे से बाहर नहीं है। इस स्थिति ने पार्टी की उस विचारधारा को चुनौती दी है, जो कभी ष्कर्मठ कार्यकर्ताष् को प्राथमिकता देने की बात करती थी।
यह स्थिति भाजपा के लिए दोहरी चुनौती लेकर आई है। एक ओर उसे कार्यकर्ताओं की नाराज़गी झेलनी पड़ रही है, जो वर्षों से पार्टी के लिए काम करने के बावजूद टिकट से वंचित रह जाते हैं। दूसरी ओर जनता में यह धारणा बनती जा रही है कि भाजपा भी कांग्रेस की तरह परिवारवाद की दलदल में उतर चुकी है। यह विडंबना है कि जो पार्टी कभी कहती थी, “अब राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा, हकदार ही शासक होगा”, वही अब सत्ता की सीढ़ियाँ रिश्तों के सहारे चढ़ती दिख रही है।
उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में जहां राजनीति व्यक्तिगत छवि और जनसंपर्क पर आधारित होती है, वहां परिवारवाद का यह बढ़ता प्रभाव लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर सकता है। भाजपा के लिए यह एक चेतावनी है कि जनता अब भावनाओं के सहारे नहीं, बल्कि काम और ईमानदारी के आधार पर अपने प्रतिनिधियों को चुनना चाहती है। यदि पार्टी ने समय रहते इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया, तो वह उसी राजनीतिक चक्रव्यूह में फंस सकती है, जिससे निकलने की बात कहकर उसने कभी सत्ता हासिल की थी। उत्तराखंड की जनता अब देख रही है कि परिवारों के इस वर्चस्व में उसकी भागीदारी कितनी सीमित होती जा रही है कृ और शायद यही वह सवाल है जो आने वाले चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा बन सकता है।



