काशीपुर/रामनगर। देश भर में दीपावली का उल्लास एक बार फिर चारों ओर छाया हुआ है, रोशनी और खुशियों से सजे इस पर्व का हर कोना जगमगाता दिख रहा है। लोग पूरे हर्षोल्लास के साथ दीप जलाकर, मिठाइयाँ बाँटकर और पूजा-पाठ में लीन होकर इस परंपरागत त्यौहार को मना रहे हैं। हर वर्ष की तरह इस बार भी दीपों का यह अद्भुत पर्व देश के कोने-कोने में धूमधाम से मनाया जा रहा है। गोवर्धन पूजा भी विधि-विधान के साथ संपन्न हो रही है, लेकिन त्योहारों की इस चमक के बीच एक चिंता जनक तस्वीर भी सामने आ रही है, जो लोगों की जेब पर गहरा असर डाल रही है। काशीपुर में त्योहारों की तैयारियों के बीच बाजारों में महंगाई ने ऐसा असर दिखाया है कि आम उपभोक्ता तक हैरान रह गया है। दीपावली के बाद भाई दूज जैसे स्नेह और प्रेम के इस पर्व से पहले ही जरूरत के सामानों के दाम आसमान छूने लगे हैं।
काशीपुर के स्थानीय बाजारों में इस बार गोले की कीमतों ने आम जनता को चौंका दिया है। जहां सामान्य दिनों में गोले का मूल्य 140 से 180 रुपये प्रति किलो तक हुआ करता था, वहीं इस बार दामों में ऐसी उछाल आई कि उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बढ़ गया है। इस बार भाई दूज के मौके पर गोले की कीमतें सीधे 400 से 450 रुपये प्रति किलो तक जा पहुँची हैं, जिससे त्योहार की मिठास में कड़वाहट घुल गई है। यह स्थिति केवल व्यापारियों के लिए नहीं, बल्कि गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए भी परेशानी का कारण बन गई है। सोचने वाली बात यह है कि जब एक मजदूर दिनभर की मेहनत कर मुश्किल से 300 से 400 रुपये तक कमा पाता है, तो उसी रकम से अपने परिवार के साथ त्योहार कैसे मनाए? यह प्रश्न हर उस व्यक्ति के मन में उठ रहा है जो इन दिनों बाजार के हालात से जूझ रहा है।
महंगाई की इस मार ने आमजन को गहराई तक प्रभावित किया है। यह पहली बार है जब किसी बड़े त्योहार के दौरान गोले की कीमतें इतनी ऊँचाई पर पहुँच गई हैं। त्योहारों के वक्त लोगों की भावनाओं से जुड़ी चीज़ों पर इस तरह का मूल्य वृद्धि होना न केवल चिंताजनक है बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का संकेत भी देता है। बाजार में जहां व्यापारियों ने यह तर्क दिया कि गोले की आपूर्ति में कमी आने और उत्पादन खर्च बढ़ने के कारण दामों में वृद्धि हुई है, वहीं उपभोक्ताओं का कहना है कि यह बढ़ोतरी मनमानी है और सरकार को इस पर तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। आखिर क्या कारण है कि हर साल त्योहारों के मौसम में महंगाई का ग्राफ अचानक चढ़ जाता है? क्या यह किसी योजनाबद्ध सट्टेबाजी का परिणाम है या फिर बाजार व्यवस्था पर नियंत्रण की कमी का नतीजा?
गरीब तबका इस स्थिति से सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। जिन परिवारों के लिए दीपावली और भाई दूज जैसे पर्व आपसी स्नेह और एकजुटता का प्रतीक हैं, उनके लिए इस बार यह खुशियों का नहीं बल्कि चिंता का पर्व बन गया है। जब महंगाई इस कदर बढ़ती चली जाती है तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आम जनता के जीवन को सुलभ बनाने की सरकारी योजनाएँ आखिर जमीन पर क्यों नहीं उतर पा रहीं? महंगाई पर नियंत्रण के तमाम दावे करने के बावजूद बाजार की वास्तविकता इससे उलट क्यों दिखती है? सरकार और प्रशासन की निगरानी तंत्र कहाँ है जब उपभोक्ताओं से त्योहारों पर इस तरह मनमाने दाम वसूले जा रहे हैं? क्या त्योहारों के मौके पर जरूरत के सामानों की कीमत तय करने के लिए कोई स्पष्ट नीति मौजूद नहीं है?
बाजार के जानकारों का मानना है कि यदि इसी तरह खाद्य पदार्थों और पूजा-सामग्री के दाम बढ़ते रहे तो त्योहार आम लोगों के लिए बोझ बनते चले जाएँगे। इस स्थिति में सवाल यह भी उठता है कि आखिर क्यों हर साल दीपावली, रक्षाबंधन या भाई दूज जैसे पर्वों के समय वस्तुओं की कीमतें अचानक उफान पर पहुँच जाती हैं? क्या यह महज संयोग है या फिर एक सुनियोजित आर्थिक चाल? आम जनता के जेहन में अब यह सवाल भी घूम रहा है कि सरकार द्वारा घोषित मूल्य नियंत्रण समितियाँ आखिर कब सक्रिय होंगी और उनके निर्णयों का असर आम लोगों तक कब पहुँचेगा?
काशीपुर की गलियों और मंडियों में इस समय जो चर्चा सबसे अधिक हो रही है, वह यही है कि महंगाई के इस दौर में त्योहारों का आनंद फीका पड़ता जा रहा है। दुकानों पर ग्राहक कम और शिकायतें ज़्यादा सुनाई दे रही हैं। लोग कहते हैं कि “त्योहार तो खुशी से मनाने के लिए होते हैं, पर अब डर लगने लगा है कि जेब संभालें या पूजा की थाली सजाएँ।” ऐसी स्थिति में पाँच बड़े प्रश्न लोगों के मन में उभरते हैं—पहला, आखिर कब तक त्योहारों के मौके पर महंगाई का बोझ जनता झेलती रहेगी? दूसरा, क्या प्रशासनिक तंत्र इतना कमजोर हो चुका है कि बाजार की मनमानी पर अंकुश नहीं लगा सकता? तीसरा, जब मजदूर वर्ग की दैनिक आय स्थिर है तो बढ़ती कीमतों का बोझ वह कैसे उठाएगा? चौथा, क्या त्योहारों के नाम पर व्यापारिक मुनाफाखोरी को रोकने के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई जा सकती? और पाँचवाँ, क्या आने वाले समय में सरकार ऐसे कदम उठाएगी जिससे हर वर्ग के लोग बिना आर्थिक चिंता के पर्व मना सकें?
इन सवालों के जवाब तलाशना अब जरूरी हो गया है क्योंकि जब त्योहार खुशी से ज्यादा बोझ देने लगें तो समाज की आर्थिक स्थिति पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि शासन और प्रशासन मिलकर ऐसे ठोस कदम उठाएँ जिससे त्योहारों की असली रौनक आम जनता तक पहुँच सके, न कि महंगाई की आँच में वह झुलसती रहे। दीपावली और भाई दूज जैसे पावन पर्व तभी सार्थक कहलाएँगे जब हर घर में दीप समान रूप से जले और कोई परिवार महंगाई की वजह से त्योहार की खुशियों से वंचित न रह जाए।



