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भव्य वैरागी द्वीप पर शताब्दी ध्वज लहराया, गायत्री परिवार ने युग परिवर्तन का शंखनाद किया

कनखल की पावन धरती पर श्रद्धा, साधना और संकल्प का अद्भुत संगम दिखा, जहाँ देश-विदेश से उमड़े जनसैलाब के बीच शताब्दी समारोह ने भारतीय संस्कृति, राष्ट्र चेतना और आत्मपरिवर्तन का सशक्त संदेश दिया।

हरिद्वार। कनखल स्थित वैरागी द्वीप की पावन भूमि उस समय साक्षी बनी जब शताब्दी ध्वज के लहराने के साथ एक नए युग के शुभारंभ का उद्घोष हुआ। यह केवल एक औपचारिक ध्वजारोहण नहीं था, बल्कि वह क्षण था जब इतिहास, साधना और भविष्य के संकल्प एक ही मंच पर एकत्र हुए। राजा दक्ष की प्राचीन नगरी में स्थित वैरागी द्वीप पर जैसे ही शताब्दी ध्वज फहराया गया, वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा, श्रद्धा और सांस्कृतिक चेतना से ओतप्रोत हो गया। अखिल विश्व गायत्री परिवार, शांतिकुंज के तत्वावधान में आयोजित गायत्री परिवार की संस्थापिका वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा जी एवं अखंड दीपक के शताब्दी समारोह का शुभारंभ अत्यंत गरिमामय वातावरण में हुआ। साधना, संकल्प और सेवा के भाव से सुसज्जित यह आयोजन केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के लिए दिशा निर्धारण का विराट मंच बन गया, जो 23 जनवरी तक चलेगा।

ऐसे पावन अवसर पर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने मुख्य अतिथि के रूप में समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि यह आयोजन माता भगवती देवी शर्मा जी के त्याग, तप और निःस्वार्थ सेवा के प्रति राष्ट्र की सामूहिक श्रद्धांजलि है। उन्होंने कहा कि माताजी का संपूर्ण जीवन अखंड साधना, आत्मबलिदान और राष्ट्र निर्माण की चेतना से अनुप्राणित रहा है। उनका व्यक्तित्व उन दीपशिखाओं में से एक है, जिसने समाज को नैतिकता, चरित्र और उद्देश्य की दिशा दी। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि गायत्री परिवार केवल एक संस्था नहीं, बल्कि युग चेतना का वह प्रवाह है जो व्यक्ति के आत्मविकास से समाज और समाज से राष्ट्र के उत्थान की ओर अग्रसर करता है। उन्होंने देवभूमि उत्तराखण्ड की आध्यात्मिक गरिमा को रेखांकित करते हुए गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ और आदि कैलाश को भारत की आत्मा की धड़कन बताया और कहा कि ऐसे पवित्र भूभाग पर आयोजित यह शताब्दी समारोह भारतीय संस्कृति और साधना परंपरा के नवजागरण का उद्घोष है।

इस ऐतिहासिक आयोजन को संबोधित करते हुए शताब्दी समारोह के दलनायक एवं देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने इसे केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न मानते हुए समाज परिवर्तन की प्रयोगशाला बताया। उन्होंने कहा कि यह आयोजन युगऋषि पूज्य आचार्यश्री द्वारा स्थापित वह “खोया-पाया विभाग” है, जहां व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य, मूल्य और सामाजिक उत्तरदायित्व को पुनः खोजता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह सौभाग्य किसी के द्वार पर प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि यह आयोजन स्वयं व्यक्ति के सौभाग्य का द्वार खोलता है। डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने समाज परिवर्तन का संदेश देते हुए प्रभावशाली पंक्तियों के माध्यम से कहा— “गंगा की कसम, यमुना की कसम, यह ताना-बाना बदलेगा। कुछ हम बदलें, कुछ तुम बदलो, तभी यह ज़माना बदलेगा।” उन्होंने आत्मपरिवर्तन को सामाजिक और राष्ट्रीय परिवर्तन की पहली शर्त बताते हुए कहा कि जब व्यक्ति स्वयं बदलने का साहस करता है, तभी राष्ट्र निर्माण की सुदृढ़ नींव रखी जा सकती है।

उसी मंच से केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने शताब्दी समारोह को सेवा, साधना और संस्कार का त्रिवेणी संगम बताया। उन्होंने कहा कि यह आयोजन नवयुग निर्माण की दिशा में एक मील का पत्थर सिद्ध होगा। श्री शेखावत ने अपने संबोधन में कहा कि विश्व की सभी महान सभ्यताएं सामूहिक चरित्र निर्माण के बल पर ही विकसित हुई हैं। जब समाज के लोग नैतिक मूल्यों, अनुशासन और सेवा भाव को अपने जीवन का आधार बनाते हैं, तभी स्थायी संस्कृति और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव होता है। उन्होंने यह भी कहा कि यह जनशताब्दी समारोह उसी सामूहिक चेतना को जाग्रत करने का सशक्त माध्यम है, जो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित जीवन से निकालकर समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी नागरिक बनाता है।

कार्यक्रम के दौरान देश-विदेश से आए विशिष्ट अतिथियों ने भी अपने विचार रखे और इस आयोजन को युग परिवर्तन का आधार स्तंभ बताया। मंत्री स्वामी सतपाल महाराज, सुदर्शन न्यूज के प्रबंध निदेशक श्री सुरेश चव्हाण, प्रवर्तन निदेशालय के पूर्व निदेशक श्री राजेश्वर सिंह, श्री विनय रुहेला सहित अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों ने शताब्दी समारोह को भारतीय संस्कृति, साधना और सामाजिक पुनर्जागरण का विराट मंच बताया। वक्ताओं ने कहा कि गायत्री परिवार की विचारधारा आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है, जब समाज नैतिक संकट और मूल्यों के क्षरण से जूझ रहा है। उन्होंने इस आयोजन को केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज को नई दिशा देने वाला चिंतन केंद्र बताया।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में श्रद्धा, संस्कार और संकल्प का ऐसा दृश्य सामने आया जिसने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया। डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने विशिष्ट अतिथियों सहित न्यायाधीश श्री परविन्दर सिंह, भारतीय अंतरिक्ष यात्री श्री शुभांशु शुक्ला, स्वामी सम्पूर्णानंद जी, स्वामी वेलु बापू जी, श्री के. नारायण राव, श्री रमेश भट्ट, श्री दिनेश काण्डपाल, आचार्य डॉ. दयाशंकर विद्यालंकार आदि को शांतिकुंज का प्रतीक चिह्न, गंगाजली, रुद्राक्ष माला एवं युग साहित्य भेंट कर सम्मानित किया। यह क्षण केवल सम्मान का नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के मूल्यों, गुरु-शिष्य परंपरा और आध्यात्मिक उत्तराधिकार का जीवंत प्रतीक बन गया।

इस ऐतिहासिक शताब्दी समारोह में विश्व भर से आस्था का महासागर उमड़ पड़ा। हरिद्वार के प्रशासनिक अधिकारी, भारत के विभिन्न राज्यों से आए हजारों स्वयंसेवक, तथा अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका सहित अनेक देशों से आए साधक और अनुयायी वैरागी द्वीप पर एकत्र हुए। यह जनसैलाब इस बात का साक्ष्य बना कि गायत्री परिवार केवल एक संगठन नहीं, बल्कि वैश्विक मानवता के नव निर्माण की चेतना है। विविध देशों और संस्कृतियों से आए लोगों की उपस्थिति ने यह सिद्ध कर दिया कि गायत्री परिवार की विचारधारा सीमाओं से परे जाकर विश्व मानवता को जोड़ने का कार्य कर रही है।

समारोह का समापन इस भाव के साथ हुआ कि यह शताब्दी उत्सव केवल अतीत को नमन करने का अवसर नहीं, बल्कि वर्तमान का आत्ममंथन और भविष्य के लिए राष्ट्र निर्माण का दृढ़ संकल्प है। वैरागी द्वीप की पावन भूमि पर उठी यह चेतना आने वाले समय में समाज, संस्कृति और राष्ट्र के नवजागरण की आधारशिला बनेगी। शताब्दी ध्वज के साथ लहराता यह संकल्प संदेश दे गया कि जब साधना, सेवा और संस्कार एक साथ चलते हैं, तब युग परिवर्तन केवल सपना नहीं, बल्कि साकार सत्य बन जाता है।

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