रामनगर(सुनील कोठारी)। 2017 के विधानसभा चुनावों में उत्तराखंड ने भारतीय जनता पार्टी को ऐसा जनादेश दिया था, जिसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई दी। सत्तर सीटों में से सत्तावन पर विजय पाकर बीजेपी ने राज्य की सियासत में एकतरफा बढ़त बनाई। इसे महज़ जीत नहीं, बल्कि लैंसलाइट विक्ट्री कहा गया। लेकिन इस प्रचंड बहुमत की दीवार के पीछे छिपे असंतोष के स्वर अगले चुनाव तक धीरे-धीरे उभरने लगे। 2022 में जब दोबारा जनता ने वोट दिया, तब बीजेपी ने अपने ही सत्तावन विधायकों में से ग्यारह के टिकट काटकर नया संदेश दिया कि पार्टी में सत्ता के साथ अनुशासन और परफॉर्मेंस भी उतनी ही अहम है। यह घटनाक्रम अब फिर चर्चा में है, क्योंकि 2027 की ओर बढ़ते कदमों ने फिर से सियासत की जमीन को गरमा दिया है।
2027 का विधानसभा चुनाव अब बस एक साल की दूरी पर है और उत्तराखंड का राजनीतिक तापमान चरम पर पहुंच चुका है। भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता में अपनी हैट्रिक सुनिश्चित करने के लिए तैयारियां तेज़ कर दी हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी के अंदरूनी गलियारों में इस वक्त एक व्यापक सर्वे जारी है, जो सभी सत्तर विधानसभा सीटों पर अलग-अलग चरणों में किया जा रहा है। पहले चरण का सर्वे इस समय चल रहा है और उसके नतीजे आने से पहले ही बीजेपी दफ्तरों में कानाफूसी शुरू हो चुकी है। पार्टी के भीतर से खबरें हैं कि इस बार खतरे का स्तर दोगुना है। यानी 2022 में जिन ग्यारह विधायकों के टिकट कटे थे, इस बार उनकी संख्या बीस तक पहुंच सकती है। यानी कम से कम बीस मौजूदा विधायकों को टिकट गंवाने का डर सता रहा है।
बीजेपी का यह सर्वे महज़ एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि सत्ता की रणनीति का हिस्सा है। संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर यह जांच की जा रही है कि किन विधायकों ने अपने क्षेत्रों में जनता से जुड़ाव बनाए रखा और किसके खिलाफ जनता का गुस्सा बढ़ रहा है। पार्टी ने प्रदेश के हर विधानसभा क्षेत्र में बूथ स्तर से लेकर जिला स्तर तक अलग-अलग फीडबैक इकठ्ठा किया है। इसके साथ ही ऐसे दावेदारों का भी मूल्यांकन हो रहा है, जो भविष्य में बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। पार्टी का यह तरीका पहले भी देखा गया है – चाहे गुजरात हो या बिहार – जहां बीजेपी ने सत्ता में रहते हुए अपने ही विधायकों के टिकट बड़ी संख्या में काट दिए थे। इस बार उत्तराखंड में वही ‘सर्जरी मॉडल’ दोहराने की तैयारी है।
पिछले दो विधानसभा चुनावों पर नज़र डालें तो यह साफ झलकता है कि बीजेपी सत्ता में रहते हुए भी टिकट वितरण में बड़े बदलाव करने से नहीं झिझकती। 2017 में जब जनता ने रिकॉर्ड सीटें बीजेपी की झोली में डाली थीं, तब केवल दो मौजूदा विधायकों के टिकट कटे थे। लेकिन 2022 में यह आंकड़ा ग्यारह तक पहुंच गया। इस बार अंदरूनी चर्चा है कि संख्या बीस तक जा सकती है। इनमें वो विधायक भी शामिल हैं जो पहली बार जीते थे और वो भी जिन्होंने दो या तीन बार जीत का स्वाद चखा है। पार्टी का मानना है कि सत्ता में रहते हुए सुस्ती या जनता से दूरी, किसी का भी टिकट कटने के लिए काफी है। बीजेपी में अब यह समझ बन चुकी है कि पद से बड़ा संगठन है और कोई भी अछूता नहीं।
दिलचस्प यह है कि गुजरात और बिहार में भी बीजेपी ने यही फार्मूला अपनाया था। गुजरात जैसे मजबूत गढ़ में भी 35 से अधिक विधायकों के टिकट काटे गए थे और बिहार में भी 20 से अधिक मौजूदा विधायकों को किनारे किया गया था। ऐसे में उत्तराखंड के विधायकों में बेचौनी बढ़ना स्वाभाविक है। 47 मौजूदा विधायकों में से करीब 20 के नाम इस समय खतरे की सूची में बताए जा रहे हैं। पार्टी के भीतर ये चर्चाएं अब खुलकर सामने आने लगी हैं। हालांकि केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति हमेशा आख़िरी समय में ही सामने आती है। बीजेपी का यह भी रिवाज रहा है कि चुनाव से ठीक पहले कई नाम बदल दिए जाते हैं और कई दावेदार अचानक टिकट पा जाते हैं। यही अनिश्चितता अब पहाड़ की सियासत में नई सरगर्मी भर रही है।
जहां तक सुरक्षित माने जाने वाले विधायकों की बात है, पार्टी सूत्र बताते हैं कि करीब 26 से 27 विधायक ऐसे हैं जिनके टिकट लगभग तय माने जा रहे हैं। इनमें थराली से भूपालराम टम्टा, कर्णप्रयाग से अनिल नौटियाल, केदारनाथ से आशा नौटियाल, घनशाली से शक्ति लाल शाह, देवप्रयाग से विनोद कंडारी, नरेन्द्र नगर से सुबोध उनियाल, धनौल्टी से पीतम पंवार, विकासनगर से मुन्ना सिंह चौहान, सहसपुर से सहदेव सिंह पुंडीर, धरमपुर से विनोद चमोली, रायपुर से उमेश काउ, मसूरी से गणेश जोशी, राजपुर से खजान दास, डोईवाल से बृज भूषण गोरोला, हरिद्वार से मदन कौशिक, भेल रानीपुर से आदेश चौहान, शिवनग से धनसिंह रावत, चौबटृखाल से सतपाल महाराज,सोमेश्वर से रेखा आर्या, जागेश्वर से महान सिंह आर्य, भीतमाल से राम सिंह कैरा काशीपुर से त्रिलाक सिंह चीमा, गदरपुर से अरविंद पाण्डे, रूद्रपुर से शिव अरोरा, सितारागंज से सौरभ बहुगणा और चंपावत से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और रुद्रपुर से शिव अरोड़ा जैसे नाम शामिल हैं। इन सभी को पार्टी के ‘सेफ जोन’ में माना जा रहा है। संगठन का भरोसा इन पर कायम है और इनकी जनता में पकड़ भी मज़बूत बताई जा रही है।
इसके विपरीत, पहले चरण के सर्वें में उन विधायकों की सूची भी लंबी है जिनके सिर पर टिकट कटने की तलवार लटक रही है। पुरोला से दुर्गेश्वर लाल, गंगोत्री से सुरेश चौहान, रुद्रप्रयाग से भरत चौधरी, टिहरी से किशोर उपाध्याय, देहरादून कैंट से सविता कपूर, ऋषिकेश से पूर्व मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल, यमकेश्वर से रेनू बिष्ट, पौड़ी से राजकुमार पोरी, कोटद्वार से रितु खंडूरी, दीदीहाट से विष्णु सिंह चुफाल, बागेश्वर से पार्वती दास, रानीखेत से प्रमोद नेमवाल और लालकुआं से डॉक्टर मोहन सिंह बिष्ट, गंगोली हाट से फकीर राम टम्टा, कपकोट से सुरेश गारिया, बागेश्वर से पार्वती दास, सल्ट से महेश जीना, रानीखेत से प्रमोद नैनवाल लालमुवा से मोहन सिंह बिष्ट, नैनीताल से सरिता आर्य, कालाढंगी से बंसीधर भगत और रामनगर से रामनगर से दिवन सिंह बिष्ट – इन नामों पर सियासी चर्चा जोरों पर है। इन पर जनता से दूरी, संगठन के साथ कमजोर तालमेल या क्षेत्रीय असंतोष जैसे कारण बताए जा रहे हैं। बीजेपी में इसे “रडार पर आना” कहा जा रहा है, और इन सीटों पर चेहरे बदलने की पूरी संभावना जताई जा रही है।
बीजेपी का यह तरीका विरोधाभासों से भरा ज़रूर लगता है, लेकिन इसके पीछे एक सटीक राजनीतिक गणित है। पार्टी मानती है कि जनता के बीच नकारात्मक छवि रखने वाले नेताओं को बदलना जरूरी है, भले वे सत्ता का हिस्सा ही क्यों न हों। यही कारण है कि खुद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी हाल ही में अपने विधायकों को संकेत दिया कि संगठन जनता के मूड के हिसाब से निर्णय लेगा। उधर, प्रदेश में चल रहे सर्वे के पहले चरण के बाद दो और चरण बाकी हैं। माना जा रहा है कि तीसरे चरण तक आते-आते 2027 के टिकट वितरण की तस्वीर लगभग साफ हो जाएगी। तब तक बीजेपी के भीतर यह असमंजस बना रहेगा कि कौन से चेहरे सत्ता की रेस में बने रहेंगे और किनके लिए यह कार्यकाल अंतिम साबित होगा।
दिलचस्प यह भी है कि बीजेपी में टिकट कटना हमेशा अंत नहीं होता। पार्टी का इतिहास बताता है कि कई बार जिन नेताओं को किनारे किया गया, वही बाद में इनाम भी पा गए। तीरथ सिंह रावत इसका बड़ा उदाहरण हैं-एक दौर में घर बैठाए गए, लेकिन कुछ ही समय बाद लोकसभा से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। बीजेपी के अंदर इसे ‘सेक्रिफाइस थ्योरी’ कहा जाता है, जहां अनुशासन और संगठन के लिए झुकने वाले नेता को आगे चलकर पुरस्कृत किया जाता है। यही कारण है कि इस बार जिन विधायकों के टिकट खतरे में बताए जा रहे हैं, उनके समर्थकों को भी पूरी तरह निराश नहीं माना जा रहा। पार्टी में अंतिम समय तक संभावनाएं जिंदा रहती हैं और सत्ता का समीकरण हर पल बदल सकता है।
उत्तराखंड की सियासत अब पूरी तरह चुनावी मोड में है। पार्टी के अंदर सर्वे की गतिविधियां लगातार तेज़ हो रही हैं और दिल्ली से लेकर देहरादून तक बैठकों का दौर जारी है। बीजेपी के संगठन में यह स्पष्ट संकेत दिया गया है कि 2027 का चुनाव किसी औपचारिकता की तरह नहीं बल्कि अस्तित्व की परीक्षा की तरह लड़ा जाएगा। हैट्रिक की चुनौती बीजेपी के सामने है और इसके लिए पार्टी हर संभव सर्जरी करने को तैयार है। अब देखना यह होगा कि सर्वे के अगले चरणों के बाद किन विधायकों की टिकट सूची में जगह बनती है और किन्हें घर बैठा दिया जाता है। एक बात साफ है-पहाड़ की राजनीति अब फिर से करवट ले रही है, और इस बार दांव केवल जीत का नहीं, बल्कि चेहरे बचाने का भी है।



