काशीपुर। होम्यो क्योर एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के बैनर तले बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS) विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन हुआ और बड़ी संख्या में होम्योपैथिक व इलेक्ट्रोपैथिक चिकित्सक इसमें शामिल हुए। कार्यशाला का संचालन संस्थान के संचालक डॉ. राजनीश शर्मा के मार्गदर्शन में किया गया, जहां उपस्थित विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को जीवन रक्षक तकनीकों की बारीकियों से अवगत कराया। इस मौके पर स्पर्श मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल के चेयरमैन डॉ0 वैभव शर्मा बतौर मुख्य वक्ता मौजूद रहे। उन्होंने विस्तार से समझाया कि अचानक आने वाली आपात परिस्थितियों में बेसिक लाइफ सपोर्ट का महत्व किस तरह मरीज की जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभाता है। कार्यक्रम के दौरान चिकित्सकों ने उत्साहपूर्वक विभिन्न सवाल पूछे और प्रशिक्षण के हर चरण को गहराई से समझा, जिससे इस कार्यशाला का महत्व और बढ़ गया।
समारोह के मुख्य आकर्षण डॉ0 वैभव शर्मा ने व्यावहारिक ढंग से समझाया कि सीपीआर, छाती पर दबाव, कृत्रिम सांस और एईडी मशीन का सही प्रयोग किस तरह किसी गंभीर स्थिति में मरीज को नई जिंदगी दे सकता है। उन्होंने कहा कि कई बार अस्पताल पहुंचने से पहले मरीज की हालत बेहद गंभीर हो जाती है और ऐसे में यदि चिकित्सक या प्रशिक्षित व्यक्ति समय पर बेसिक लाइफ सपोर्ट तकनीक का इस्तेमाल करे तो मरीज की सांसें लौट सकती हैं। डॉ. वैभव शर्मा ने चिकित्सकों को इस दौरान न केवल सैद्धांतिक जानकारी दी बल्कि उन्हें प्रत्यक्ष रूप से इन प्रक्रियाओं का अभ्यास भी कराया, ताकि किसी भी आकस्मिक परिस्थिति में उनका आत्मविश्वास बना रहे। प्रतिभागियों ने बताया कि इस प्रशिक्षण ने उन्हें और अधिक व्यावहारिक ज्ञान दिया है, जो भविष्य में उनके लिए बेहद उपयोगी साबित होगा।

डॉ. वैभव शर्मा ने चिकित्सकों को संबोधित करते हुए कहा कि बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS) सिर्फ एक तकनीक नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच की सबसे अहम कड़ी है। उन्होंने जोर देकर बताया कि आपातकालीन परिस्थितियों में जब हर पल अनमोल होता है, तब सही समय पर उठाया गया कदम किसी मरीज के जीवन को सुरक्षित कर सकता है। उन्होंने चिकित्सकों को यह स्पष्ट संदेश दिया कि CPR, छाती पर सही दबाव देना, कृत्रिम सांस प्रदान करना और AED का प्रयोग केवल किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इन्हें व्यावहारिक जीवन में पूरी दक्षता के साथ लागू करना चाहिए। उनका कहना था कि चिकित्सा जगत में सबसे बड़ा योगदान वही है जो किसी की सांसें लौटा सके और यही योगदान किसी चिकित्सक की असली पहचान बनाता है। उन्होंने आगे कहा कि जब तक डॉक्टर इन प्रक्रियाओं को गहराई से समझकर अभ्यास नहीं करेंगे, तब तक वे आकस्मिक स्थितियों में आत्मविश्वास से काम नहीं कर पाएंगे। डॉ. वैभव शर्मा ने इस दौरान यह भी बताया कि जीवन रक्षक तकनीकों का ज्ञान केवल चिकित्सकों के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए अमूल्य धरोहर है, जिसे फैलाना और अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
इसी क्रम में कार्यशाला को संबोधित करते हुए डॉ. नित्या विश्वकर्मा ने ईसीजी (ECG) को लेकर उपस्थित चिकित्सकों को विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने समझाया कि हृदय की धड़कनों को पहचानने और समय रहते सही निर्णय लेने में ईसीजी की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। इस दौरान होम्योपैथी और इलेक्ट्रोपैथी से जुड़े चिकित्सकों को तकनीकी पहलुओं पर गहराई से प्रशिक्षित किया गया। डॉ. नित्या विश्वकर्मा ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि यदि चिकित्सक ईसीजी की सही व्याख्या करना सीख लें तो मरीज की जान बचाने के मौके और बढ़ जाते हैं। उनके व्याख्यान ने कार्यशाला में नई ऊर्जा भर दी और उपस्थित डॉक्टरों ने इस प्रशिक्षण को बेहद लाभकारी बताया। इस चर्चा के दौरान प्रतिभागियों ने कई प्रश्न पूछे जिनका समाधान विस्तार से किया गया, जिससे उनकी समझ और अधिक स्पष्ट हो सकी।
डॉ. नित्या विश्वकर्मा ने ईसीजी (ECG) के महत्व पर बोलते हुए होम्योपैथिक और इलेक्ट्रोपैथिक चिकित्सकों को गहन जानकारी दी और स्पष्ट किया कि हृदय की धड़कनों में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को समझना जीवन बचाने की दिशा में पहला कदम है। उन्होंने बताया कि कई बार मरीज की हालत अचानक बिगड़ जाती है और उस समय ईसीजी की सही व्याख्या कर लेना डॉक्टर को त्वरित निर्णय लेने में मदद करता है। उन्होंने चिकित्सकों को प्रेरित किया कि वे केवल सामान्य उपचार तक सीमित न रहें, बल्कि आधुनिक उपकरणों और तकनीकों का भी ज्ञान हासिल करें, जिससे उनके उपचार का दायरा और विस्तृत हो सके। डॉ. नित्या विश्वकर्मा ने कहा कि यदि होम्योपैथिक और इलेक्ट्रोपैथिक चिकित्सक ईसीजी की गहराई को समझकर उसे सही ढंग से लागू करना सीख लें, तो यह उनके लिए मरीजों की जान बचाने का सबसे बड़ा हथियार सिद्ध हो सकता है।
कार्यशाला में होम्यो क्योर एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के चेयरमैन डॉ. रजनीश शर्मा ने भी अपनी बात रखते हुए होम्योपैथी की संरचना और उसकी प्रासंगिकता को विस्तार से बताया। उन्होंने जोर दिया कि आधुनिक चिकित्सा के साथ होम्योपैथी की विशेषताओं को जोड़कर मरीजों के लिए बेहतर उपचार संभव है। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार द्वारा बेसिक लाइफ सपोर्ट को लेकर प्रमाणपत्र प्रदान किया जा रहा है और यह चिकित्सकों के लिए न केवल सम्मान की बात है बल्कि उनकी पेशेवर जिम्मेदारी को भी और मजबूत बनाता है। डॉ. रजनीश शर्मा ने यह जानकारी भी दी कि उनका क्लिनिक उत्तराखंड का पहला NABH मान्यता प्राप्त संस्थान है, जो गुणवत्ता और विश्वसनीयता की दृष्टि से महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उनकी बातों ने उपस्थित चिकित्सकों का उत्साह और बढ़ा दिया और उन्हें इस ओर प्रेरित किया कि वे भी अपनी सेवाओं को मानकों के अनुरूप और बेहतर बनाएँ।
डॉ. रजनीश शर्मा ने इस दौरान बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS) को लेकर होम्योपैथिक और इलेक्ट्रोपैथिक चिकित्सकों को अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ दीं और इसके महत्व को विस्तार से समझाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि बीएलएस केवल आधुनिक चिकित्सा पद्धति का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह ऐसी जीवनदायी तकनीक है जो हर चिकित्सक के ज्ञान का आधार होना चाहिए। उनका कहना था कि आकस्मिक परिस्थितियों में सही समय पर और सही ढंग से किया गया हस्तक्षेप मरीज को नई जिंदगी देने में चमत्कार कर सकता है। उन्होंने बताया कि CPR, छाती पर दबाव देने की विधि, कृत्रिम सांस और AED जैसी तकनीकें किसी भी आपातकाल में चिकित्सक का सबसे बड़ा हथियार साबित होती हैं। उन्होंने इस तथ्य पर जोर दिया कि होम्योपैथी और इलेक्ट्रोपैथी के चिकित्सकों को भी इन जीवन रक्षक उपायों की गहन जानकारी होना अनिवार्य है, क्योंकि मरीज जब उनके पास पहुँचते हैं तब समय की कमी सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। डॉ. राजनीश शर्मा ने कहा कि बीएलएस के प्रति सजगता और इसे अपनाने का संकल्प न केवल चिकित्सा क्षेत्र को मजबूत करेगा बल्कि मानव जीवन की रक्षा में अमूल्य योगदान भी देगा।

कार्यशाला के दौरान डॉ. पंकज कुमार ने अपने संबोधन में इमरजेंसी मेडिसिन और टाइफाइड को लेकर होम्योपैथिक और इलेक्ट्रोपैथिक चिकित्सकों को गहन और विस्तृत जानकारी प्रदान की। उन्होंने कहा कि आकस्मिक परिस्थितियों में सही निर्णय और त्वरित उपचार मरीज की जिंदगी बचाने का सबसे बड़ा जरिया होता है। डॉ. पंकज शर्मा ने विस्तार से समझाया कि इमरजेंसी मेडिसिन केवल तात्कालिक राहत का माध्यम नहीं है, बल्कि यह ऐसी प्रणाली है जो डॉक्टर को तुरंत प्रभावी कदम उठाने के लिए तैयार करती है। उन्होंने चिकित्सकों को बताया कि किसी भी आपात स्थिति में मरीज की हालत को समझना और सही दवा का चुनाव करना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही उन्होंने टाइफाइड जैसी गंभीर बीमारी पर भी प्रकाश डाला और समझाया कि इसके लक्षणों को समय रहते पहचानकर इलाज शुरू करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि होम्योपैथिक और इलेक्ट्रोपैथिक चिकित्सकों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे टाइफाइड के हर चरण को समझें और मरीजों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उपचार दें। डॉ. पंकज शर्मा ने चिकित्सकों को यह प्रेरणा दी कि इमरजेंसी और संक्रामक रोगों की जानकारी उन्हें न केवल बेहतर चिकित्सक बनाएगी बल्कि समाज में उनकी जिम्मेदारी और बढ़ाएगी।
अंतिम चरण में कार्यशाला का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह रहा जब प्रतिभागियों को व्यावहारिक प्रदर्शन कराया गया। यहां चिकित्सकों ने स्वयं CPR, छाती पर दबाव देने की प्रक्रिया, कृत्रिम सांस देने की तकनीक और AED के प्रयोग का अभ्यास किया। प्रशिक्षकों ने बार-बार सही ढंग से प्रक्रिया करने पर जोर दिया ताकि किसी भी प्रकार की लापरवाही न हो। डॉक्टरों ने बताया कि इस तरह की कार्यशालाएँ उन्हें वास्तविक स्थितियों में बिना घबराए मरीज को संभालने का आत्मविश्वास देती हैं। कार्यशाला के समापन पर सभी प्रतिभागियों ने आयोजकों का धन्यवाद किया और कहा कि यह प्रशिक्षण उनके पेशेवर जीवन में मील का पत्थर साबित होगा। होमियो क्योर एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के बैनर तले इस आयोजन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि चिकित्सा जगत में समय पर दिया गया सही प्रशिक्षण कितनी बड़ी भूमिका निभा सकता है और मानव जीवन की रक्षा में कितना कारगर हो सकता है।



