- शिक्षा विभाग की उदासीनता उजागर, फर्जीवाड़े में शामिल नेटवर्क तक पहुंचना चुनौती
- सवालों से भागता रहा विभाग, कोर्ट की कड़ाई ने दोबारा फाइलें खुलवाईं
- दिव्यांग कोटा घोटाले ने शिक्षा नैतिकता पर चोट की, असली हकदार हुए वंचित
- कानून की मार से जागा प्रशासन, वर्षों पुराना फर्जी सर्टिफिकेट खेल बेनकाब
- नौकरी पाने को नैतिकता गिरवी रखने वाले शिक्षक उजागर, सिस्टम की खामियां तैरकर सामने आईं
- सभी विभागों की जांच की मांग तेज, फर्जीवाड़ा अन्य सेवाओं में भी होने के संकेत
उत्तराखंड(सुनील कोठारी)। शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर ऐसे खुलासे से दहल उठी है, जिसने पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। जिस राज्य में गुरु को समाज मार्गदर्शक मानता है, वहीं पर सामने आई यह कहानी है उन इक्यावन शिक्षकों की, जिन्होंने दिव्यांग कोटे का लाभ उठाने के लिए फर्जी मेडिकल प्रमाण पत्रों का सहारा लिया और वर्षों तक आराम से नौकरी करते रहे। सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि इस पूरे खेल के बीच शिक्षा विभाग की भूमिका बेहद कमजोर और उदासीन दिखाई दी, पूरे सिस्टम को पहले से पता था कि इसमें गड़बड़ है, पर किसी ने मुंह खोलना जरूरी नहीं समझा। यह मामला केवल धोखाधड़ी नहीं बल्कि प्रदेश की नैतिक शिक्षा प्रणाली पर बड़ा धब्बा बन गया है, जिसने आम नागरिकों से लेकर नीति-निर्माताओं तक सभी की आंखें खोल दी हैं।
लंबे समय से चल रहे इस भ्रष्ट नेटवर्क में नई भर्तियों से लेकर पुराने जमाने के शिक्षकों तक का नाम सामने आ रहा है। जांच से पता चला है कि जिन पर उंगलियां उठी हैं, उनमें कुछ शिक्षक 1991 में नियुक्त हुए थे, जबकि कुछ 2019कृ20 में चयनित किए गए। यानी यह घटनाक्रम किसी एक बैच या एक समयसीमा तक सीमित नहीं, बल्कि कई सालों से बिना किसी रोक-टोक के चलता आ रहा था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस प्रकार की धांधली इतनी लंबी अवधि तक कैसे जीवित रही? विभाग में बैठे जिम्मेदार अधिकारी क्या आंखें मूंदे बैठे थे, या फिर इस ‘गोपनीय व्यवस्था’ में कहीं न कहीं उनकी भी सहमति शामिल थी? उत्तराखंड की नौकरी प्रणाली पर उठ रहे गंभीर सवालों ने अब पूरे प्रशासनिक ढांचे को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
दो वर्ष पहले 2022 में चिकित्सकीय बोर्ड ने स्पष्ट रूप से लिखित रिपोर्ट देकर बताया था कि इन 51 शिक्षकों के दिव्यांग प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए हैं। हैरानी की बात तो यह है कि इतनी गंभीर टिप्पणी के बावजूद किसी भी स्तर पर न कार्रवाई हुई, न किसी का वेतन रोका गया और न ही किसी को बर्खास्त किया गया। इसे लापरवाही कहना शायद कम होगा, क्योंकि विभाग का यह रवैया बता रहा था कि जैसे यह पूरा मामला पहले से ‘समझौतों’ की परतों में दबा हुआ था। यह भी अंदेशा जताया जा रहा है कि विभागीय अधिकारियों ने जानबूझकर इस रिपोर्ट को अनदेखा किया, ताकि फाइलें आगे न बढ़ें और मामला खुद ही समय के गर्त में खो जाए। यहीं से यह कहानी और संदिग्ध होती जाती है, और यह साफ होता है कि फर्जी प्रमाण पत्रों का खेल किसी एक शिक्षक की चाल नहीं बल्कि एक संगठित तंत्र की देन है।
दो वर्षों तक दबा यह मामला तब फिर सामने आया जब न्यायालय आयुक्त दिव्यांगजन ने जनहित याचिका के आधार पर शिक्षा विभाग से जवाब तलब किया कि उन इक्यावन शिक्षकों की सूची आखिर सार्वजनिक क्यों नहीं की गई, जिनके प्रमाण पत्र अवैध पाए गए थे। सवाल उठते ही विभाग में ऐसी हलचल मची कि महीनों से धूल फांक रही फाइलें अचानक खोली जाने लगीं और शिक्षकों को नोटिस जारी किए जाने शुरू हो गए। इससे यह स्पष्ट हो गया कि प्रशासन खुद से नहीं, बल्कि केवल कानूनी दबाव पड़ने पर ही हरकत में आया। अब शासन की ओर से एक नई समिति गठित कर दी गई है, जिसकी अध्यक्षता निदेशक माध्यमिक शिक्षा कर रहे हैं। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह समिति सिर्फ वही प्रक्रिया दोहराएगी जिसे मेडिकल बोर्ड पहले ही पूरा कर चुका है, या इस बार जांच उस जाल तक पहुंचेगी जहां से फर्जी प्रमाण पत्र तैयार करने का खेल संचालित होता है?
यह भी सामने आया है कि इक्यावन में से सर्वाधिक संदिग्ध शिक्षक टिहरी जिले में तैनात पाए गए, जबकि बाकी देहरादून, पौड़ी और उत्तरकाशी में कार्यरत थे। एक ही जिले में इतने अधिक मामलों का सामने आना यह संकेत देता है कि यह सिर्फ व्यक्तिगत अनैतिकता नहीं बल्कि एक संगठित ‘नेटवर्क’ है, जिसमें मेडिकल विभाग, बिचौलिया तंत्र और विभागीय खिड़कियों की मिलीभगत साफ तौर पर झलकती है। ऐसी जालसाजी अकेले नहीं की जा सकती। इस प्रकार के फर्जी प्रमाण पत्र जारी होना तभी संभव है जब एक मजबूत अंदरूनी नेटवर्क उसकी राह तैयार करे। इसलिए इस पूरे मामले को केवल शिक्षकों की धोखाधड़ी कहना अधूरा सच होगाकृमूल समस्या उस व्यवस्था की है जिसने यह भ्रष्टाचार पनपने दिया।
जांच आगे बढ़ने के साथ यह सवाल और तीखा होता जा रहा है कि क्या सिर्फ नोटिस जारी कर देना समाधान है? दो साल तक फाइल दबाए रखने की जिम्मेदारी किसकी थी? और अगर न्यायालय आयुक्त दिव्यांगजन ने हस्तक्षेप न किया होता, तो क्या यह मामला कभी सामने आता? कई विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह सिर्फ शिक्षा विभाग तक सीमित गड़बड़ी नहीं है। संदेह जताया जा रहा है कि स्वास्थ्य विभाग, पुलिस विभाग और अन्य सरकारी सेवाओं में भी इसी प्रकार के फर्जी प्रमाण पत्रों पर नौकरी कर रहे लोग हो सकते हैं। यदि सरकार में सचमुच ईमानदारी है तो एक राज्यव्यापी जांच अनिवार्य हैकृवरना यह मानना पड़ेगा कि शासन भी इस खेल का मौन सहभागी है।
आने वाले दिनों में अब बड़ी कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है। यदि जांच सच्चाई तक पहुंची, तो न केवल कई शिक्षकों की नौकरी जाएगी बल्कि विभाग के कई अधिकारी भी निशाने पर आ सकते हैं। लेकिन यदि सिस्टम एक बार फिर सो गया, तो इस कहानी का अंत वही होगा जैसा अक्सर होता हैकृफाइल बंद, मामला शांत और जनता फिर से ठगा हुआ महसूस करेगी। यह महज़ अनियमितता नहीं, बल्कि उन्हीं असली दिव्यांग अभ्यर्थियों के अधिकारों की चोरी है जो अपने हिस्से का अवसर खो बैठे।



