रामनगर(सुनील कोठारी)। उत्तराखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं का भविष्य अब विवादों और संदेहों के घेरे में घिरता दिखाई दे रहा है। पहले एमपी, यूपी, राजस्थान और बिहार जैसे राज्य पेपर लीक की घटनाओं के चलते लंबे समय से बदनाम रहे हैं, लेकिन अब इस शर्मनाक सूची में उत्तराखंड का नाम भी जुड़ गया है। मामला सामने आने के बाद से ही कांग्रेस और छात्रों ने इसे लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है और आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी वास्तविक दोषियों पर सख्ती करने के बजाय इस घोटाले को धार्मिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार की तरफ से इस प्रकरण को नकल जिहाद का नाम दिया गया है, जो कि विपक्ष और छात्रों के गुस्से को और भड़काने का काम कर रहा है। पहले लव जिहाद, फिर लैंड जिहाद और अब नकल जिहाद—यह सिलसिला अब विपक्ष के लिए सरकार की नीयत पर सवाल उठाने का बड़ा आधार बन गया है।
राज्य की राजनीति में इस घटनाक्रम ने आग में घी डालने का काम किया है क्योंकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बयान सामने आया है कि हर समस्या की जड़ जिहाद है और उसके खिलाफ अभियान छेड़कर ही समाधान खोजा जा सकता है। उनके इस दृष्टिकोण ने न सिर्फ विपक्ष बल्कि समाज के एक बड़े वर्ग को भी असमंजस में डाल दिया है। छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि यहां मुख्य मुद्दा नकल माफिया और कोचिंग सेंटरों के गठजोड़ का है, जो संगठित होकर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। बावजूद इसके, सरकार धार्मिक शब्दों और उपमाओं का इस्तेमाल कर विषय को दूसरी दिशा देने में जुटी है। इस रवैये ने छात्रों की बेचैनी को और बढ़ा दिया है और कांग्रेस ने खुलकर सरकार पर यह आरोप लगाया है कि असली दोषियों को बचाने के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण की रणनीति अपनाई जा रही है।
उत्तराखंड पुलिस ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए कल ही पेपर लीक प्रकरण के मुख्य आरोपी मोहम्मद को गिरफ्तार किया है। इस गिरफ्तारी के बाद सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है और दावा कर रही है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। मगर विपक्ष का कहना है कि यह कार्रवाई तब की जा रही है जब मामले ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। कांग्रेस का आरोप है कि धामी सरकार ने पहले तो पेपर लीक की बात से ही इनकार कर दिया था और जब सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे और छात्रों का आक्रोश सामने आया, तब जाकर पुलिस ने गिरफ्तारी की। इससे साफ है कि सरकार शुरुआत से ही इस मुद्दे पर गंभीर नहीं थी और अब जिम्मेदारी से बचने के लिए धार्मिक शब्दावली का सहारा लिया जा रहा है।
इक्कीस सितंबर को आयोजित एसएससी स्नातक स्तरीय परीक्षा ने छात्रों का भविष्य अधर में डाल दिया जब परीक्षा शुरू होने के महज आधे घंटे बाद ही पूरा पेपर सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। यह घटना न केवल प्रशासन की तैयारियों पर सवाल खड़ा करती है बल्कि यह भी दर्शाती है कि नकल माफिया किस तरह से तंत्र को चकमा देकर छात्रों की मेहनत को बेकार कर रहे हैं। इस स्थिति ने युवाओं के बीच आक्रोश की लहर पैदा कर दी है और वे लगातार सड़कों पर उतरकर सरकार से निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। मगर विपक्ष का मानना है कि धामी सरकार असली दोषियों को बचाने और अपनी नाकामी छिपाने के लिए जानबूझकर धार्मिक एंगल का इस्तेमाल कर रही है, ताकि मुद्दा भटकाया जा सके।
विपक्ष ने इस पूरे घोटाले की जांच सीबीआई से कराने की मांग उठाई है और कहा है कि राज्य सरकार की एजेंसियां इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं कर सकतीं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब सरकार के पास किसी प्रश्न का स्पष्ट जवाब नहीं होता तो वह धार्मिक शब्दों का इस्तेमाल कर मुद्दे को दूसरी दिशा में मोड़ने का प्रयास करती है। नकल जिहाद जैसा शब्द भी उसी रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य असली दोषियों से ध्यान हटाकर भावनाओं को भड़काना है। विपक्ष का आरोप है कि अगर इस मामले की गहन पड़ताल की जाए तो कई ऐसे नाम सामने आएंगे जिनका सीधा संबंध सत्ता पक्ष के प्रभावशाली लोगों से है। यही वजह है कि सरकार सीबीआई जांच से बचना चाहती है और सतही स्तर पर गिरफ्तारी दिखाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने का दावा कर रही है।
आखिरकार इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तराखंड सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है क्योंकि छात्रों और अभिभावकों का विश्वास अब डगमगाने लगा है। नकल माफिया और कोचिंग गिरोहों के गठजोड़ ने युवाओं के सपनों को बर्बाद कर दिया है और ऊपर से सरकार का इसे धार्मिक रंग देना राज्य की साख को और नुकसान पहुंचा रहा है। धामी सरकार चाहे जितना भी यह दावा करे कि दोषियों पर सख्ती होगी, लेकिन विपक्ष यह सवाल खड़ा कर रहा है कि दोषी कौन हैं और उनके संरक्षण में यह खेल कब से चल रहा है। जिस तरह से पेपर लीक का मुद्दा अब राजनीतिक रंग पकड़ रहा है, उससे यह साफ हो गया है कि आने वाले समय में यह विषय उत्तराखंड की राजनीति का बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है और सरकार को जवाब देना ही होगा कि युवाओं का भविष्य सुरक्षित करने के लिए उसके पास वास्तविक समाधान क्या है।



