रामनगर। तहसील परिसर सोमवार को उस समय तीखी नाराज़गी, बेचैनी और उफनते जनाक्रोश का बड़ा केंद्र बन गया, जब ग्राम पूछड़ी के उजाड़े गए परिवार अपने बच्चों और बुजुर्गों के साथ विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ संयुक्त संघर्ष समिति के नेतृत्व में बड़ी संख्या में पहुंच गए। सुबह से ही लोग समूह बनाते हुए तहसील की ओर आते दिखे, जहां माहौल देखते ही देखते गुस्से से भरे नारों में बदल गया। प्रदर्शनकारियों ने राज्य सरकार पर संवेदनहीन निर्णय लेने, वन विभाग पर बिना जांच मनमानी करने और पुलिस तंत्र पर अत्यधिक कठोरता तथा शक्ति के दुरुपयोग का गंभीर आरोप लगाते हुए जोरदार विरोध दर्ज कराया। लोगों का कहना था कि जिस तरीके से गांव में कार्रवाई की गई, वह अत्याचार की पराकाष्ठा है और प्रशासन ने लोगों की स्थिति को समझने की कोई कोशिश ही नहीं की। भीड़ ने नारेबाज़ी करते हुए साफ कहा कि ऐसी कार्रवाइयों से जनता का भरोसा टूटता है और सरकार को जनता की पीड़ा समझकर ही फैसले लेने चाहिए।
प्रदर्शन में शामिल ग्रामीणों का कहना था कि जिस तरह रविवार को वन विभाग, जिला प्रशासन और पुलिस की संयुक्त टीम ने बुलडोज़र चलाकर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की, वह पूरी तरह असंवेदनशील, अवैधानिक और मानवता के खिलाफ थी। लोगों का आरोप था कि कार्रवाई के नाम पर बिना किसी पूर्व सूचना के घरों को ढहा दिया गया, जिससे कई परिवार खुले आसमान के नीचे आ गए और बच्चोंदृमहिलाओं तक को बचाव का मौका नहीं मिला। स्थानीय लोगों का कहना था कि प्रशासन ने न्यायालय के आदेशों और वन कानूनों दोनों की अनदेखी कर गांव को अव्यवस्था में धकेल दिया, जिसके चलते पूरे क्षेत्र में भय और गहरी पीड़ा का माहौल है।

इसी उथल-पुथल और असंतोष के बीच प्रदर्शनकारियों ने जोर देकर कहा कि सरकार और प्रशासन ने उन परिवारों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की, जिन्हें एक झटके में घर से बेदखल कर दिया गया। लोगों ने बताया कि यदि प्रशासन वास्तव में नियमों का पालन करना चाहता, तो पहले पुनर्वास योजना लागू की जाती और फिर कार्रवाई की जाती, लेकिन यहां सब कुछ जल्दबाज़ी और कठोरता में किया गया। संयुक्त संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि तराई पश्चिमी वन प्रभाग के डीएफओ ने जानबूझकर उच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन किया है और उनसे जुड़े मामलों की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए। साथ ही उन्हें तत्काल पद से हटाने की मांग भी जोरदृशोर से उठाई गई। प्रदर्शन में शामिल ग्रामीणों ने यह भी कहा कि स्थानीय विधायक दीवान सिंह बिष्ट इस गंभीर मसले पर मौन साधे हुए हैं, जिससे लोगों में भारी रोष है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जनप्रतिनिधियों को जनता के दुख-दर्द के समय आगे आना चाहिए, लेकिन यहां नेतृत्व की चुप्पी से पीड़ा और नाराज़गी दोनों बढ़ी हैं।

धरना स्थल पर कई महिलाएं और बुजुर्ग भी मौजूद थे, जिन्होंने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान पुलिस पर मारपीट और दुर्व्यवहार जैसे गंभीर आरोप लगाए। लोगों के मुताबिक महिलाओं को जबरन हटाया गया, उनके साथ बदसलूकी की गई और घर खाली करने की प्रक्रिया में कोई संवेदनशीलता नहीं बरती गई। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने बुलडोज़र कार्रवाई को तत्काल नहीं रोका, तो आंदोलन और उग्र होगा और आने वाले 2027 विधानसभा चुनावों में ऐसे नेताओं को जनता सबक सिखाएगी जो आज पीड़ितों के साथ खड़े नहीं दिख रहे।
दूसरी ओर, उपजिलाधिकारी प्रमोद कुमार ने ज्ञापन प्राप्त करते हुए यह कहा कि संयुक्त संघर्ष समिति द्वारा जो आपत्ति दर्ज कराई गई है, उसे कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत के पास भेजा जा रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट कहा कि कार्रवाई के दौरान किसी भी ऐसे भवन को नहीं गिराया गया जिस पर स्टे का आदेश था। यदि किसी परिवार के पास स्थगन आदेश मौजूद है, तो वह उसे डीएफओ के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। पुलिस पर लगे आरोपों पर एसडीएम ने कहा कि पूरी कार्रवाई की वीडियोग्राफ़ी मौजूद है और जांच की मांग होने पर तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच कराई जाएगी।
संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक मुनीष कुमार ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि बीते दिन पुलिस और वन विभाग ने जिस तरीके से कार्रवाई की, वह नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर गहरा आघात है। उनका कहना था कि माननीय उच्च न्यायालय द्वारा जिन लोगों को फिलहाल का स्टे दिया गया था, उन्हीं परिवारों की जमीनों पर कार्यवाही कर घर उजाड़ना न्याय की पूरी अवधारणा का मज़ाक बनाने जैसा है। उन्होंने आरोप लगाया कि महिलाओं और परिवार के सदस्यों को अपना स्टे दिखाने तक नहीं दिया गया और उन्हें हिरासत में लेकर घंटों तक परेशान किया गया।
मुनीष कुमार ने प्रशासन पर यह आरोप भी लगाया कि कानून व्यवस्था संभालने वाले अधिकारियों ने स्वयं कानून की धज्जियां उड़ाई हैं और जनता पर अत्याचार कर शासन की मंशा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने मांग की कि जिन लोगों को उजाड़ा गया है, उनका पुनर्वास तुरंत किया जाए और वन अधिकार कानून 2006 के तहत बनी समिति को सक्रिय कर क्षेत्र के वन ग्रामों से संबंधित सभी कार्यवाही पारदर्शी तरीके से की जाए। साथ ही उन्होंने डीएफओ तराई पश्चिमी के कार्यों और संपत्तियों की जांच कर उन्हें पद से बर्खास्त करने की मांग दोहराई।
धरना स्थल पर मौजूद दूसरे वक्ताओं ने भी सरकार को कड़ी चेतावनी दी कि यदि राज्य नेतृत्व वास्तव में सत्ता में बने रहना चाहता है, तो उसे जनता की आवाज़ सुननी होगी और जनहित में निर्णय लेने होंगे। उन्होंने कहा कि यदि सांप्रदायिक बयानों या एकतरफा कार्रवाई के दम पर उत्तराखंड में लोगों को बांटने की कोशिश की गई, तो जनता इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेगी। वक्ताओं ने दावा किया कि जिस जनता ने मुख्यमंत्री की कुर्सी दी है, वही कुर्सी छीनने की ताकत भी रखती है और यही संदेश देने के लिए आज यह धरना आयोजित किया गया है।

धरने में शामिल पीड़ित महिला धना देवी तिवारी ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि बुलडोज़र ठीक उनके खेत और घर तक पहुंच गया, जबकि उनके पास अदालत का स्पष्ट स्टे आदेश मौजूद था। उन्होंने आरोप लगाया कि जब वह कोर्ट का स्टे दिखाने पहुंचीं, तो पुलिस ने उसे महत्वहीन बताते हुए उन्हें धक्का देकर हटाया और फिर उनके परिवार के कई सदस्यों के साथ मारपीट की गई। धना देवी का कहना था कि उन्हें और उनके परिजनों को गाड़ी में बैठाकर ले जाया गया, पूरे दिन हिरासत में रखा गया और उल्टा उन पर ही हाथापाई का आरोप लगा दिया गया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके घर में सामान तोड़ा-फोड़ा गया, कृषि भूमि की फसलें रौंदी गईं और स्टे होने के बावजूद खेत तक को नहीं छोड़ा गया। धना देवी ने गहरे दुख के साथ बताया कि उन्होंने बारदृबार कोर्ट का आदेश दिखाकर कार्रवाई रोकने की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने नहीं सुनी। उनका आरोप था कि पुलिस कर्मियों ने क्रूरता की हद पार करते हुए उन्हें घेरकर पीटा और फिर चौकी ले जाकर घंटों तक बैठाए रखा, जबकि उनका अपराध केवल इतना था कि उन्होंने अपने अधिकारों की रक्षा करने की कोशिश की।



