देहरादून। राज्य की नर्सिंग सेवाओं से जुड़े हजारों अभ्यर्थियों की नाराज़गी मंगलवार को उस समय उफान पर पहुंच गई, जब नर्सिंग एकता मंच और नर्सिंग सेवा संघ के बैनर तले बड़ी संख्या में नर्सिंगकर्मी सचिवालय की ओर कूच करते दिखाई दिए। वर्षों से लटक रही मांगों और नई भर्ती प्रक्रिया में अचानक किए गए बदलाव ने नर्सिंग समुदाय को इस कदर उद्वेलित किया कि पूरा प्रदर्शन राजधानी के प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट आरोप है कि जिस प्रणाली में पारदर्शिता और क्रमबद्धता के आधार पर वर्षवार भर्ती की प्रक्रिया लंबे समय से चल रही थी, उसे बिना किसी बैठक, सुझाव या सहमति के बदल दिया गया है और यह निर्णय सीधे-सीधे प्रतियोगी अभ्यर्थियों के अधिकारों पर आघात है। नर्सों का कहना है कि इस बदलाव से कई युवाओं का भविष्य अधर में लटका है और सरकार को इस विसंगति को तुरंत सुधारना चाहिए।
दूसरी ओर, हाल ही में जारी 690 पदों की नई भर्ती विज्ञप्ति भी आंदोलन का मुख्य कारण बन गई है। नर्सिंग समुदाय का तर्क है कि राज्य की अस्पताल व्यवस्था में बढ़ते कार्यभार और प्च्भ्ै मानकों के अनुसार मौजूदा कर्मचारियों पर पहले से अधिक जिम्मेदारियां डाल दी गई हैं, ऐसे में 690 पदों की भर्ती न सिर्फ अपर्याप्त है बल्कि स्वास्थ्य तंत्र की वास्तविक आवश्यकता का मज़ाक उड़ाती है। नर्सिंग एकता मंच ने इस बात को जोर देकर कहा कि प्रदेश को कम से कम 2500 नर्सिंग पदों की तत्काल आवश्यकता है और सरकार यदि इस आंकड़े को नजरअंदाज कर रही है तो वह केवल भर्ती का “औपचारिक दिखावा” कर रही है। मंच के सदस्यों का आरोप है कि जब स्वास्थ्य संस्थानों में मरीज बढ़ रहे हैं, सेवाओं का दायरा बढ़ रहा है, तो कर्मचारियों की संख्या क्यों नहीं बढ़ाई जा रही? यह सवाल सरकार को टालने के बजाय उसका समुचित उत्तर देना चाहिए।
भर्तियों में आयु सीमा को लेकर भी अभ्यर्थियों में व्यापक असंतोष देखा गया। नर्सिंग सेवा संघ ने घोषणा की कि बड़ी संख्या में ऐसे युवा हैं जो वर्षों से भर्ती का इंतज़ार करते-करते अब अधिकतम आयु सीमा पार कर चुके हैं। ऐसे अभ्यर्थियों के लिए कम से कम दो वर्षों की विशेष आयु छूट प्रदान की जानी चाहिए, ताकि वे पुनः प्रतियोगिता में सम्मिलित हो सकें। संघ का यह भी कहना है कि उत्तराखंड के मूल निवासी उम्मीदवारों को प्राथमिकता देना तर्कसंगत और न्यायोचित है क्योंकि राज्य के युवाओं के लिए अवसर सीमित हैं और लगातार विलंबित भर्ती प्रक्रियाओं ने उनका मनोबल गिराया है। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि बाहरी राज्यों के अभ्यर्थियों के लिए अवसरों की कोई कमी नहीं, जबकि उत्तराखंड के स्थानीय युवाओं का रोजगार उनसे छिन रहा है, जो चिंता का विषय है।
अभियान के दौरान नर्सिंग कर्मचारी सचिवालय के बाहर घंटों डटे रहे और अपनी आवाज़ प्रशासन तक पहुंचाने के लिए नारेबाज़ी और शांतिपूर्ण धरना जारी रखा। इस बीच नर्सिंग सेवा संघ के प्रदेश संरक्षक विजय चौहान ने प्रतिनिधिमंडल के साथ सिटी मजिस्ट्रेट को विस्तृत ज्ञापन सौंपा, जिसे बाद में मुख्यमंत्री कार्यालय तक भेजा गया। ज्ञापन में वर्षवार भर्ती की वापसी, 690 पदों की विज्ञप्ति का तत्काल पुनरीक्षण, बड़ी संख्या में रिक्त पदों पर व्यापक भर्ती, और आयु छूट सहित कई प्रमुख मांगें शामिल की गई हैं। ज्ञापन सौंपने के बाद विजय चौहान ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि यदि सरकार ने सात दिनों के भीतर निर्णय नहीं लिया तो नर्सिंग समुदाय पूरे प्रदेश में बड़े पैमाने पर आंदोलन करेगा, जिसका प्रभाव अस्पतालों की नॉनदृइमरजेंसी सेवाओं पर भी पड़ सकता है। उनका कहना है कि नर्सिंग कर्मियों को अक्सर “सेवा भावना” का हवाला देकर चुप रहने को कहा जाता है, परंतु जब अधिकारों की बात आती है तो वही सेवा भावना सरकार की उदासीनता के नीचे दबा दी जाती है।
प्रदर्शन खत्म होने के बाद भी नर्सिंग समुदाय में रोष कम नहीं हुआ है। कई अभ्यर्थियों ने कहा कि वर्षों से भर्ती का इंतज़ार करते-करते उनकी आयु बढ़ चुकी है और यदि अब भी सरकार ने नियमों को तर्कसंगत नहीं बनाया, तो हजारों युवाओं का भविष्य बर्बाद हो जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार भर्ती प्रक्रिया को आवश्यकता अनुसार पारदर्शी बनाने के बजाय उसे जटिल कर रही है, जिससे यह आशंका बढ़ रही है कि चयन प्रक्रिया पर कहीं न कहीं बाहरी दबाव हावी है। नर्सिंग संगठनों का मानना है कि यह लड़ाई सिर्फ नौकरी की नहीं बल्कि पूरे स्वास्थ्य प्रणाली की मजबूती की लड़ाई है, क्योंकि पर्याप्त नर्सिंग स्टाफ न होने से मरीजों की सेवाएं कमजोर पड़ती हैं, और यह स्थिति किसी भी राज्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।



