काशीपुर। कटोरा ताल क्षेत्र की सड़क पर स्थित काशीपुर सहकारी क्रय विक्रय समिति लिमिटेड का परिसर बुधवार को असाधारण हालात का गवाह बना, जब यहां दर्जनों किसान और किसान नेताओं ने कार्यालय के मुख्य द्वार पर तालाबंदी कर दरी बिछाकर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया। बाहर से शांत दिखने वाले इस परिसर के भीतर फैली बेचौनी, किसानों के टूटते सब्र और प्रशासन के प्रति गहरे आक्रोश की तस्वीर साफ झलक रही थी। किसानों का कहना है कि महीनों पहले उन्होंने खून-पसीने से उगाया गया धान इसी समिति को सौंप दिया था, लेकिन आज तक न तो उन्हें सरकारी दर पर भुगतान मिला और न ही यह स्पष्ट हो पाया कि उनका धान आखिर गया कहां। मुख्य गेट पर ताला लटक रहा था। किसानों का आरोप है कि जब वे भुगतान की मांग को लेकर पहुंचे तो अधिकारी-कर्मचारी गायब मिले, जिससे मजबूर होकर उन्होंने यह कठोर कदम उठाया।
धान की खेती कर जीवनयापन करने वाले किसानों ने बताया कि उन्होंने करीब छह महीने की मेहनत के बाद फसल तैयार की और सरकार द्वारा तय प्रक्रिया के तहत काशीपुर सहकारी क्रय विक्रय समिति को अपना धान दिया। शुरू में उन्हें आश्वासन दिया गया कि जल्द ही भुगतान हो जाएगा, लेकिन यह ‘आज-कल’ का सिलसिला महीनों तक चलता रहा। किसानों का कहना है कि अब जाकर उन्हें पता चला कि उनका धान सरकारी पोर्टल पर ही अपलोड नहीं किया गया। सरकारी नियमों के अनुसार जब तक धान पोर्टल पर दर्ज नहीं होता, तब तक न तो न्यूनतम समर्थन मूल्य पर भुगतान संभव है और न ही आगे की प्रक्रिया। किसानों के मुताबिक, लगभग 16 से 17 हजार कुंतल धान का कोई अता-पता नहीं है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यह धान किन मिलों में भेजा गया, किसके आदेश पर भेजा गया और उसका लाभ आखिर किसने उठाया।
किसानों ने बताया कि धान खरीद की सरकारी अवधि एक अक्टूबर से 31 दिसंबर तक होती है। उन्होंने अक्टूबर में ही अपना धान समिति के क्रय केंद्र में जमा करा दिया था। इसके बावजूद नवंबर से लेकर दिसंबर के अंत तक उन्हें सिर्फ टालमटोल का सामना करना पड़ा। अब जबकि 31 दिसंबर की अंतिम तिथि नजदीक है, किसानों का कहना है कि उसके बाद चाह कुछ भी हो जाये उस धान को पोर्टल पर दर्ज नहीं कराया जा सकता। ऐसे में उनका पूरा भुगतान अटकने का खतरा मंडरा रहा है। किसानों का दर्द यह है कि यह उनकी छह महीने की कमाई थी, जिससे उन्हें बच्चों की फीस, घर की शादियां, बीमारियों का इलाज और रोजमर्रा के खर्च चलाने थे। अब हालत यह है कि न पैसा मिला और न ही कोई जवाब।

लगातार निराशा और अधिकारियों की गैरहाजिरी से क्षुब्ध किसानों ने आखिरकार समिति कार्यालय पर तालाबंदी का फैसला किया। किसान नेताओं का कहना है कि उन्होंने अंतिम दिन तक उम्मीद बनाए रखी, लेकिन जब यह साफ हो गया कि कोई जिम्मेदार अधिकारी सुनवाई के लिए नहीं आ रहा, तब यह कदम उठाना पड़ा। किसानों के अनुसार, जब उन्होंने फोन पर अधिकारियों से संपर्क किया तो जवाब मिला कि “हमारे बस में कुछ नहीं है।” इसी के बाद किसानों ने कहा कि यदि उनके बस में कुछ नहीं है तो वे कार्यालय में बैठकर क्या कर रहे हैं। इसके बाद अधिकारी कार्यालय बंद कर निकल गए और किसानों ने मुख्य द्वार पर ताला जड़ दिया। किसानों का दावा है कि चाबी उनके पास सुरक्षित है और जब तक समाधान नहीं निकलता, वे यहां से हटने वाले नहीं हैं।
धरने पर बैठे किसानों और किसान नेताओं ने समिति पर गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि इस बार 54 हजार कुंतल धान खरीद का लक्ष्य मिला था, लेकिन कर्मचारियों ने बड़े पैमाने पर धांधली की। आरोप है कि अपने परिचितों और सेटिंग वाले लोगों का धान पहले पोर्टल पर चढ़ा दिया गया, जबकि असली किसानों की पर्चियां आज तक अटकी हुई हैं। किसानों का कहना है कि उनके पास आज भी अक्टूबर माह की पर्चियां मौजूद हैं, लेकिन पोर्टल पर उनका नाम नहीं दिख रहा। इससे यह शक और गहरा गया है कि कहीं उनके धान को गलत तरीके से बेचकर या किसी और को लाभ पहुंचाकर करोड़ों का खेल तो नहीं किया गया।
धरने के दौरान किसानों ने अपनी पीड़ा खुलकर रखी। उन्होंने बताया कि पहले सरकार ने गर्मी की धान की फसल बंद करवाई, जिससे उनकी एक फसल पहले ही बर्बाद हो चुकी थी। इसके बाद गेहूं की खेती किसी तरह संभाली गई। फिर धान की फसल में औसत उत्पादन कम रहा, लेकिन जो भी उपज हुई, वह पूरी ईमानदारी से समिति को सौंप दी गई। किसानों का कहना है कि केंद्र प्रभारी और कर्मचारियों ने उन्हें अलग-अलग मिलों में धान उतारने के लिए कहा और भरोसा दिलाया कि पर्चियां बन जाएंगी। किसानों ने सरकारी व्यवस्था पर भरोसा करते हुए वैसा ही किया, लेकिन आज ढाई महीने बाद भी भुगतान की कोई खबर नहीं है।
किसानों ने बताया कि भुगतान न मिलने से उनका पूरा पारिवारिक तंत्र चरमरा गया है। आढ़ती भी अब उन्हें उधार देने से मना कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें कहा जा रहा है कि सरकारी खरीद में दिया गया माल वहीं से पैसा मिलने पर ही क्लियर होगा। किसी किसान के घर बेटी की शादी है, किसी के बच्चे की फीस जमा होनी है और किसी के परिवार में बीमारी ने घर की जमा-पूंजी खत्म कर दी है। किसानों का कहना है कि वे सर्दी में सड़क पर बैठने के शौकीन नहीं हैं, बल्कि यह उनकी मजबूरी है। जब रोज़गार खत्म हो जाए और मेहनत की कमाई फंस जाए, तो इंसान के पास सड़क पर उतरने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।
धरने के दौरान किसानों ने भाजपा सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर भी सवाल खड़े किए। किसानों का कहना है कि एक ओर सरकार किसान गोष्ठियां आयोजित कर रही है, सांसद और स्थानीय नेता मंचों से किसानों के हित की बातें कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वास्तविक किसान अपनी ही उपज का भुगतान पाने के लिए दर-दर भटक रहा है। किसानों ने तीखे शब्दों में कहा कि यदि सरकार में हिम्मत है तो पहले उनका पैसा दिलवाए और यह बताए कि उनका धान कहां गया। उन्होंने मुख्यमंत्री धामी से इस पूरे मामले में संज्ञान लेने और दोषी कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की।
धरने पर बैठे नेताओं और किसानों का मानना है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित घोटाला है। उनका कहना है कि यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो, तो करोड़ों रुपये की अनियमितताएं सामने आ सकती हैं। आरोप लगाया गया कि कुछ राइस मिलों और प्रभावशाली लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए पोर्टल में हेरफेर की गई। किसानों का कहना है कि पूरे जिले में यही स्थिति है और आने वाले दिनों में जसपुर समेत अन्य क्षेत्रों के किसान भी इस आंदोलन में शामिल हो सकते हैं। उनका दावा है कि जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे इस घपले की परतें खुलती जाएंगी।

किसान नेताओं ने साफ शब्दों में कहा कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, वे यहां से हटने वाले नहीं हैं। धरना अनिश्चितकालीन रहेगा और जरूरत पड़ी तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। किसानों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार और प्रशासन ने जल्द समाधान नहीं निकाला, तो यह आंदोलन जिलेभर में फैल सकता है। किसानों का कहना है कि उन्होंने जनप्रतिनिधियों को वोट और समर्थन इसलिए नहीं दिया था कि उन्हें अपने ही पैसे के लिए सड़कों पर बैठना पड़े। समिति कार्यालय के बाहर दरी पर बैठे किसान, बंद पड़े दरवाजे और लटके ताले इस बात की गवाही दे रहे हैं कि मामला कितना गंभीर हो चुका है। अंदर न तो कोई अधिकारी मौजूद है और न ही कोई ठोस आश्वासन सामने आया है। समाधान कब निकलेगा, कैसे निकलेगा और किसानों को उनका हक कब मिलेगाकृयह सवाल फिलहाल हवा में तैर रहे हैं। लेकिन एक बात साफ है कि काशीपुर में उठी यह आवाज अब सिर्फ एक समिति तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह पूरे सिस्टम पर सवाल बनकर खड़ी हो गई है।



