काशीपुर। कटोरा ताल क्षेत्र की सड़क पर स्थित काशीपुर सहकारी क्रय विक्रय समिति लिमिटेड का परिसर बुधवार को किसानों के आक्रोश और पीड़ा का केंद्र बन गया, जहां दर्जनों किसान और किसान नेता एकजुट होकर कार्यालय के मुख्य द्वार पर तालाबंदी कर दरी बिछाकर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए। यह धरना दूसरे दिन भी लगातार जारी रहा और दिन-रात किसान उसी मुख्य गेट पर डटे रहे। किसानों का कहना है कि महीनों पहले उन्होंने अपने खून-पसीने की कमाई से उगाया गया धान इसी समिति को सौंपा था, लेकिन आज तक न तो उन्हें सरकारी समर्थन मूल्य के अनुसार भुगतान मिला और न ही यह स्पष्ट हो सका कि उनका धान आखिर गया कहां। समिति के मुख्य द्वार पर लटका ताला किसानों की मजबूरी और प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बन गया, जिसने पूरे इलाके में गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस आंदोलन में शामिल किसानों का आरोप है कि जब वे अपने भुगतान की जानकारी लेने और धान के हिसाब-किताब को समझने के लिए समिति कार्यालय पहुंचे, तो वहां कोई जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी मौजूद नहीं मिला। किसानों का कहना है कि बार-बार आने के बावजूद उन्हें सिर्फ टालने का प्रयास किया गया, जिससे आक्रोश बढ़ता चला गया। अंततः मजबूर होकर किसानों ने कार्यालय के मुख्य द्वार पर ताला लगाकर धरना शुरू कर दिया। किसानों का दर्द इस बात से और गहरा हो गया कि जिस संस्था पर उन्होंने भरोसा किया, वही संस्था अब उनके सवालों से बचती नजर आ रही है। उनका कहना है कि यह केवल भुगतान का मामला नहीं, बल्कि उनके सम्मान और अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न बन चुका है, क्योंकि इसी आय से उनके परिवारों का गुजारा चलता है।
धरने के दौरान उत्तराखंड युवा भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष जितेन्द्र जितू ने मीडिया से बातचीत करते हुए किसानों की स्थिति को बेहद गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि धान खरीद और भुगतान को लेकर स्थिति पूरी तरह संदिग्ध बनी हुई है और लगभग इकत्तीस घंटे बीत जाने के बावजूद शासन या प्रशासन की ओर से कोई ठोस संदेश या समाधान सामने नहीं आया है। उन्होंने यह भी कहा कि इतने लंबे समय तक धरना चलने के बावजूद किसी वरिष्ठ अधिकारी का मौके पर न पहुंचना यह दर्शाता है कि किसानों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। उनके अनुसार, एक बार आशीष साहब मौके पर आए थे, लेकिन उसके बाद किसी अन्य अधिकारी ने यहां आकर स्थिति की सुध लेना भी जरूरी नहीं समझा।
प्रदेश अध्यक्ष जितेन्द्र जित ने आरोप लगाया कि समिति में धान खरीद को लेकर बड़े स्तर पर गड़बड़ी की गई है। उनका कहना है कि जांच होनी चाहिए कि जो लगभग चौवन हजार कुंतल धान चढ़ाया गया बताया जा रहा है, वह वास्तव में किन किसानों के नाम दर्ज है और किसने उसमें हेराफेरी की है। उन्होंने दावा किया कि उन्हें केवल आशंका नहीं, बल्कि पूरा विश्वास है कि लगभग तीस हजार कुंतल धान मिलीभगत के तहत कागजों में चढ़ाया गया है, जिसमें मंडी विभाग से जुड़े कुछ लोगों ने प्रति कुंतल ढाई सौ से तीन सौ रुपये तक की अवैध वसूली की है। किसानों की मांग है कि निष्पक्ष जांच हो और सच्चाई सामने आए, ताकि दोषियों पर कार्रवाई हो सके।
प्रदेश अध्यक्ष जितेन्द्र जितू का कहना है कि वे कोई अतिरिक्त सुविधा या विशेष लाभ नहीं मांग रहे हैं, बल्कि केवल अपना हक और मेहनत की कमाई चाहते हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति मानसिक उत्पीड़न जैसी बन गई है, जहां किसानों को अपने ही पैसे के लिए महीनों तक धरना देना पड़ रहा है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति अपनी छह महीने की कमाई किसी को दे दे और फिर उसे वापस पाने के लिए दिन-रात संघर्ष करना पड़े। इस दौरान कई किसानों के घरों पर बिजली विभाग द्वारा बकाया बिलों को लेकर कनेक्शन काटे जा रहे हैं, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ गई है। किसानों का सवाल है कि जब सरकार उनका पैसा नहीं दे रही, तो वे विभागों को भुगतान कैसे करें।
प्रदेश अध्यक्ष जितेन्द्र जितू ने कहा कि ठंड के इस मौसम में सड़क किनारे बैठना आसान नहीं है। दिन तो किसी तरह गुजर जाता है, लेकिन रात में ठिठुरन बेहद परेशान करती है। कई किसान सर्दी और जुकाम से पीड़ित हो गए हैं, जिसकी आवाज मीडिया से बातचीत में भी साफ सुनाई दे रही थी। इसके बावजूद किसान धरना छोड़ने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि उनके अनुसार यदि वे पीछे हटे तो उनकी सुनवाई कौन करेगा। उन्होंने कहा कि यह स्थिति दिल्ली में हुए बड़े किसान आंदोलनों की याद दिलाती है, जहां किसानों को अपने अधिकारों के लिए लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ा था। यहां भी हालात कुछ ऐसे ही बनते जा रहे हैं।
आरोपों की गंभीरता और बढ़ जाती है जब किसान नेता यह कहते हैं कि काशीपुर क्षेत्र को सरकार ने लगभग नौ लाख कुंतल धान खरीद का लक्ष्य दिया था, जबकि उनके अनुसार इस क्षेत्र की कुल उपज तीन से चार लाख कुंतल से अधिक हो ही नहीं सकती। किसानों का सवाल है कि जब इतनी जमीन और उत्पादन है ही नहीं, तो कागजों में चार गुना अधिक धान कैसे दिखाया जा सकता है। उनका कहना है कि यही वजह है कि वे धरने पर बैठे हैं और जांच की मांग कर रहे हैं। यदि सब कुछ सही होता, तो अब तक जांच शुरू हो चुकी होती, लेकिन चुप्पी यह संकेत देती है कि मामला काफी आगे तक पहुंच चुका है।
मीडिया के सवालों के जवाब में प्रदेश अध्यक्ष जितेन्द्र जितू ने बताया कि प्रशासन की ओर से केवल आश्वासन ही मिल रहे हैं। उनका कहना है कि कुछ अधिकारियों ने यह कहा कि व्यवस्था की जा रही है और जांच भी होगी, लेकिन अभी तक धरातल पर कुछ भी दिखाई नहीं दिया है। किसानों का कहना है कि केवल यह कह देना कि काम चल रहा है, उनके लिए पर्याप्त नहीं है। वे लिखित और ठोस कार्रवाई चाहते हैं, ताकि उन्हें भरोसा हो सके कि उनके साथ न्याय होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आज उनकी मांगों पर कोई निर्णय नहीं हुआ, तो वे आगे और कड़े कदम उठाने को मजबूर होंगे।
धरने को लेकर प्रदेश अध्यक्ष जितेन्द्र जितू ने यह भी बताया कि उन्होंने फिलहाल शहर को जाम करने जैसे कदम से परहेज किया है, क्योंकि नववर्ष का समय है और वे नहीं चाहते कि उनकी वजह से आम नागरिकों, खासकर बच्चों और परिवारों को किसी प्रकार की परेशानी हो। किसानों का कहना है कि उनके भी परिवार हैं और वे समझते हैं कि त्योहार के समय शहर की छवि खराब होना उचित नहीं है। इसी कारण उन्होंने फिलहाल कुछ निर्णयों को स्थगित रखा है, लेकिन यदि समस्या का समाधान नहीं हुआ तो उन्हें मजबूरी में आगे का रास्ता चुनना पड़ेगा, चाहे इसके लिए उन्हें शहरवासियों से सहयोग मांगना ही क्यों न पड़े।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच शाम के समय तहसीलदार पकंज चंदोला और एसडीएम अभय प्रताप सिंह किसानों को समझाने और मनाने के लिए मौके पर पहुंचे। उन्होंने किसानों से बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनीं और समाधान का आश्वासन देने का प्रयास किया। हालांकि, किसानों का आक्रोश और अविश्वास इतना गहरा था कि वे किसी भी तरह के मौखिक आश्वासन से संतुष्ट नहीं हुए। किसानों ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस और लिखित कार्रवाई नहीं होती, तब तक वे अपना धरना और प्रदर्शन समाप्त नहीं करेंगे। प्रशासनिक अधिकारियों के लौट जाने के बाद भी किसान उसी तरह मुख्य द्वार पर डटे रहे, जिससे साफ है कि यह आंदोलन अभी और लंबा खिंच सकता है।



