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धराली त्रासदी पर फूटा आक्रोश रिटा. कर्नल कोठियाल ने उठाई बड़ी चेतावनी

रामनगर। धराली आपदा के बाद बीते महीनों में जिस गहराई तक पीड़ा, सवाल और प्रशासनिक सुस्ती ने लोगों को झकझोर दिया है, वह अब खुलकर सामने आने लगी है। पांच अगस्त की भीषण त्रासदी के बाद जहां एक ओर गांव की ज़मीन के भीतर 147 लोग अब भी दफन पड़े हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों की उम्मीदें लगातार टूटती जा रही हैं। इस बीच रिटा. कर्नल कोठियाल ने इस पूरे मामले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि धराली की त्रासदी को केवल आंकड़ों में समेटकर छोड़ देना उन परिवारों के साथ अन्याय है, जिनकी दुनिया इस आपदा में पूरी तरह उजड़ चुकी है। उन्होंने बताया कि वे खुद साढ़े 17 हजार फीट की ऊंचाई पर तीन दिनों तक बिना किसी मदद के पैदल फंसे लोगों के बीच रहे और हालात को बेहद करीब से देखा। उनके अनुसार आज ज़रूरत इस बात की नहीं कि केवल “क्या होना चाहिए” कहा जाए, बल्कि इस बात की है कि जब पहाड़ संकट में हों, तब वैज्ञानिक संस्थानों और युवाओं को मौके पर उतरकर वास्तविक रिसर्च करनी चाहिए, न कि सिर्फ रिपोर्ट बनाकर कार्रवाई रोक देने का आधार तैयार किया जाए।

रिटा. कर्नल कोठियाल ने इस बात पर सवाल उठाया कि आपदा के इतने दिनों बाद भी धराली में कोई ठोस पुनर्निर्माण प्रयास नज़र नहीं आता। उनका कहना है कि जिन लोगों के घर, धरोहर, धार्मिक प्रतीक, शादी के गहने, शिक्षा के प्रमाणपत्र और पूरी ज़िंदगी के संसाधन जमीन के नीचे दबे हुए हैं, उन्हें यह कहकर तसल्ली देना कि ‘‘जगह अस्थिर है’’ समाधान नहीं हो सकता। उन्होंने बताया कि उनके पिता का पूजा स्थल भी मलबे के नीचे है और इसे छोड़ देना किसी परिवार के लिए असंभव निर्णय है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन ने वैज्ञानिक रिपोर्टों को ही बहाना बनाकर अपनी ज़िम्मेदारी जहां-तहाँ छोड़ दी है। उनकी शिकायत यह भी है कि कुछ वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने वास्तविक स्थल का विस्तृत अध्ययन किए बिना केवल ऊपरी तस्वीरों के आधार पर रिपोर्ट दे दी, जिससे सरकार को यह कहने का आधार मिल गया कि धराली में निर्माण या पुनर्वास उचित नहीं।

यह भी सामने आया कि आपदा प्रबंधन एजेंसियों के काम में कहीं न कहीं गंभीर कमियां दिखाई दीं। रिटा. कर्नल कोठियाल ने कहा कि NDRF जैसी अत्यंत सक्षम बल को भेजा जरूर गया, लेकिन जिस तरह के तकनीकी उपकरण और प्रशिक्षित कर्मी आवश्यक थे, वे उपलब्ध ही नहीं कराए गए। उन्होंने आरोप लगाया कि जो काम कुशल विशेषज्ञ कर सकते थे, वहां साधारण मजदूर जैसे प्रयास किए जा रहे थे, जबकि इस प्रकार के बचाव अभियानों में हर मिनट की कीमत होती है। उन्होंने यह भी कहा कि Indo-Tibetan Border Police (ITBP) जैसी फोर्सें जहां सरहदों पर सबसे कठिन परिस्थितियों में डटी रहती हैं, वहीं इसी इलाके में सेना के दस जवानों के शव निकाल लिए गए, परंतु आम ग्रामीणों के शवों तक पहुंचने में प्रशासन की गति बेहद धीमी रही। उनके अनुसार यह स्थिति तब और अधिक दुखद हो जाती है जब अधिकारी यह कह दें कि “हम नहीं निकाल सकते”, जबकि परिवार अब भी उम्मीद लगाए बैठे हैं।

रिटा. कर्नल कोठियाल ने यह भी स्पष्ट किया कि धराली को अचानक “असुरक्षित” बताने का जो रुख अपनाया जा रहा है, वह पहाड़ की परंपराओं, इतिहास और लोगों की भावनाओं को समझे बिना लिया गया निर्णय प्रतीत होता है। उनका कहना है कि हिमालय अस्थिर अवश्य है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि सदियों से बसे गांवों को खाली करा दिया जाए। चीन सीमा से सटे क्षेत्रों में Vibrant Village के नाम पर योजनाएं शुरू कर सरकार खुद वहां बसे रहने की आवश्यकता पर जोर देती रही है, लेकिन अब वही इलाका असुरक्षित घोषित किया जा रहा है, जिससे लोगों में भ्रम और असुरक्षा बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि यदि प्रथम गांव का दर्जा देने पर लोगों में उत्साह पैदा किया गया था, तो फिर आपदा के बाद उन्हें वहां से हटाने का प्रस्ताव कैसे उचित ठहराया जा सकता है?

धराली की पहचान, उसकी मेहनत और उसकी उपलब्धियों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि यही गांव वर्षों पहले अपने सेब और राजमा की बदौलत अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका था। यहां के युवा mountaineering और rescue मिशनों में देश का नाम रोशन कर चुके हैं। उन्होंने यह भी बताया कि नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग के दो प्रशिक्षक, जो धराली के ही रहने वाले थे, वे ऊपरी क्षेत्र में पहुंचे थे, लेकिन उनके द्वारा दी गई तस्वीरों को ही वैज्ञानिक रिपोर्ट का आधार बना देना गलत है। यदि इन्हीं सीमित तथ्यों के आधार पर सरकार धराली को “पूरी तरह खाली कराने” की दिशा में निर्णय लेती है तो यह पहाड़ की संस्कृति, आस्था और सामुदायिक संरचना के लिए बड़ा झटका साबित होगा।

अंत में रिटा. कर्नल कोठियाल ने कहा कि आपदा को केवल “एक घटना” की तरह नहीं देखा जा सकता। पहाड़ों के लोग सदियों से प्राकृतिक चुनौतियों के बीच रहते आए हैं। यदि आपदा के नाम पर गांव खाली करवा दिए जाएंगे तो धीरे-धीरे पूरा पर्वतीय क्षेत्र ही खाली हो जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि आज धराली छोड़ दी गई तो कल किसी और गांव को “अस्थिर” कहकर उजाड़ने की तैयारी हो जाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि विज्ञान और वैज्ञानिक प्रगति का उपयोग लोगों को बचाने में होना चाहिए, न कि उन्हें हटाने के आधार तैयार करने में। पहाड़ को छोड़कर नीचे की ओर बढ़ने की मजबूरी बढ़ती जाएगी, और यह पलायन आने वाले वर्षों में पहाड़ों की संस्कृति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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