रामनगर। विधि जगत से जुड़े लोगों के लिए आगामी सप्ताह विशेष महत्व लेकर आ रहा है, क्योंकि टैक्स बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित दो दिवसीय “विधि महोत्सव” की तैयारियाँ पूरे जोर-शोर से चल रही हैं। 26 और 27 नवंबर को होने वाला यह महोत्सव न केवल कानून के विद्यार्थियों, अधिवक्ताओं और शोधार्थियों को एक साझा मंच प्रदान करेगा, बल्कि आम नागरिकों को भी संविधान और न्यायिक संरचना की गहराई को समझने का अवसर उपलब्ध कराएगा। महोत्सव की घोषणा होते ही विधि समुदाय में उत्साह का माहौल बन गया है, क्योंकि लंबे समय बाद ऐसा कार्यक्रम आयोजित हो रहा है जिसमें न्याय, संविधान और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर गंभीरतापूर्वक चर्चा होगी। इस आयोजन की जानकारी टैक्स बार के उपसचिव अधिवक्ता मनु अग्रवाल ने साझा की, जिन्होंने बताया कि यह महोत्सव समाज और न्याय व्यवस्था के बीच समझ की दूरी को कम करने का सशक्त माध्यम बन सकता है।
टैक्स बार एसोसिएशन के अध्यक्ष पूरन पांडे ने भी इस कार्यक्रम को लेकर विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि इस आयोजन का मकसद केवल औपचारिक चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों तक संवैधानिक विचारों का प्रसार करना, नागरिकों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति अधिक सजग बनाना और विधि के क्षेत्र में हो रहे बदलावों से अवगत कराना इसका व्यापक उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में समाज तेजी से परिवर्तित हो रहा है, ऐसे में न्याय व्यवस्था की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। इसलिए यह आवश्यक है कि आम नागरिक संविधान के मूलभूत सिद्धांतों से परिचित हों और समझ सकें कि कानून किस प्रकार सामाजिक ताने-बाने को सुदृढ़ बनाए रखता है। पूरन पांडे के अनुसार, विधि महोत्सव एक ऐसा मंच है जहां नए और अनुभवी कानूनविद एक साथ बैठकर विचार साझा कर सकेंगे और युवा पीढ़ी को न्यायिक कार्यप्रणाली के प्रति प्रेरित कर पाएंगे।
महोत्सव के पहले दिन, यानी 26 नवंबर को, संविधान दिवस के उपलक्ष्य में एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा। इस दिन को महोत्सव की आत्मा कहा जा रहा है, क्योंकि संविधान से जुड़े विविध पहलुओं, इसकी प्रासंगिकता, लोकतंत्र की नींव पर आधारित मूल्यों, नागरिक अधिकारों और जिम्मेदारियों पर विस्तृत विमर्श होगा। कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता, कानून विशेषज्ञ, शोधार्थी और न्यायिक अनुभव रखने वाले कई गणमान्य उपस्थित रहेंगे, जो वर्तमान समय में संविधान के समक्ष उपस्थित चुनौतियों, न्यायिक प्रणाली की सीमाओं और भविष्य की संभावनाओं पर रोशनी डालेंगे। संगोष्ठी का मुख्य आकर्षण यह होगा कि इसमें संविधान के उन मूल भावों पर विशेष चर्चा होगी, जो आज भी समाज के हर वर्ग को जोड़ने और समानता का भाव स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। महोत्सव का आयोजन समिति मानती है कि ऐसे संवाद न केवल समझ को गहरा करते हैं, बल्कि युवाओं में कानून के प्रति रुचि और ज़िम्मेदारी की भावना को भी पल्लवित करते हैं।

दूसरे दिन, यानी 27 नवंबर को, महोत्सव में “उत्तराखंड गौरव सम्मान” का आयोजन किया जाएगा, जो इस कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण और आकर्षक हिस्सा होने वाला है। इस सम्मान समारोह में समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाली व्यक्तिगत और सामूहिक उपलब्धियों को मंच पर लाकर सम्मानित किया जाएगा। चाहे सामाजिक सेवा का क्षेत्र हो, शिक्षा, न्याय, महिला सशक्तिकरण, सांस्कृतिक संरक्षण या पर्यावरण संरक्षणकृइन सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों को नागरिक अभिनंदन के रूप में सम्मान दिया जाएगा। आयोजकों का मानना है कि समाज में उत्कृष्ट कार्य करने वाले लोगों को सम्मानित करना न केवल उनके मनोबल को बढ़ाता है, बल्कि अन्य लोगों को भी समाज हित में आगे आने के लिए प्रेरित करता है। इस दिन कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, प्रबुद्ध नागरिकों, अधिवक्ताओं तथा सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति इसे और अधिक गरिमामय बनाएगी।
अधिवक्ता मनु अग्रवाल ने बताया कि यह पूरा आयोजन किसी विशेष वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर उस व्यक्ति के लिए है जो न्याय, कानून और संविधान से जुड़ी बातों को समझने में रुचि रखता है। उन्होंने कहा कि महोत्सव केवल कानून के पेशे से जुड़े लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर है जो यह जानना चाहते हैं कि न्याय व्यवस्था किस प्रकार उनके जीवन को प्रभावित करती है और संविधान किस रूप में उन्हें अधिकार प्रदान करता है। उन्होंने लोगों से इस कार्यक्रम में अधिक से अधिक भागीदारी की अपील करते हुए कहा कि जनहित में आयोजित यह आयोजन तभी सार्थक होगा जब अधिक से अधिक लोग इसमें शामिल होकर अपने विचार साझा करें और नई सीख प्राप्त करें।
महोत्सव को लेकर पहले ही विधि समुदाय के बीच व्यापक उत्साह देखा जा रहा है। अधिवक्ताओं का कहना है कि इस तरह के आयोजन न केवल ज्ञान का आदान-प्रदान बढ़ाते हैं, बल्कि आपसी संवाद और अनुभव साझा करने के माध्यम से कानूनी समुदाय को और अधिक सुदृढ़ करते हैं। न्यायिक व्यवस्था की महत्ता को समझने के लिए ऐसे कार्यक्रम अनिवार्य हैं, क्योंकि ये संविधान के महत्व को व्यावहारिक रूप से जन-जन तक पहुँचाते हैं।



