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देवभूमि में बदलते जनसांख्यिकीय समीकरण से बढ़ी हलचल, सरकार सतर्क मोड में

देहरादून के गांवों में जनसंख्या संतुलन का तेजी से बदलना बना चिंता का कारण, सरकारी रजिस्टरों में हेराफेरी ने खोली सियासी और प्रशासनिक पोल

उत्तराखंड(सुनील कोठारी)। कभी देवभूमि के नाम से जानी जाने वाली उत्तराखंड की शांत पहाड़ियां और धार्मिक वातावरण अब नई जनसांख्यिकीय तस्वीर के कारण चर्चा में हैं। जिन गांवों में कभी मंदिरों की घंटियां और आरती की गूंज हर दिशा में सुनाई देती थी, अब वहां की जनसंख्या के ताजे आंकड़ों ने सरकार और स्थानीय प्रशासन दोनों को चिंतित कर दिया है। राजधानी देहरादून के विकासनगर क्षेत्र, जिसे पांचवा दून कहा जाता है, से आई जनगणना रिपोर्ट ने प्रदेश में हड़कंप मचा दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस इलाके के तेईस गांवों में अब मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक हो चुकी है। जिन गांवों में कभी हिंदू समुदाय का अनुपात स्पष्ट रूप से अधिक था, वहां आज तस्वीर पूरी तरह पलट गई है। यह बदलाव केवल संयोग नहीं बल्कि एक दशक से चल रहे योजनाबद्ध जनसांख्यिकीय परिवर्तन का परिणाम बताया जा रहा है।

गांव स्तर पर आंकड़े इस बदलाव की गहराई को उजागर करते हैं। ठकरानी गांव का उदाहरण लें तो 2011 में यहां हिंदू जनसंख्या 60 प्रतिशत और मुस्लिम जनसंख्या 40 प्रतिशत थी, लेकिन अब समीकरण उलट चुके हैं कृ 60 प्रतिशत मुस्लिम और मात्र 40 प्रतिशत हिंदू बचे हैं। धरीपुर गांव में कभी 75 प्रतिशत हिंदू थे, आज वहां हिंदू और मुस्लिम आबादी बराबर यानी 50-50 प्रतिशत पर पहुंच चुकी है। कुशालपुर में 2011 में 90 प्रतिशत मुस्लिम आबादी थी, जो अब बढ़कर 96 प्रतिशत हो गई है। इससे भी चौंकाने वाली स्थिति दिल्ली से सटे इलाकों की है, जहां अब केवल 5 प्रतिशत हिंदू और 95 प्रतिशत मुस्लिम रह गए हैं। यही नहीं, धर्मावाला, जीवनगढ़, कुंजा, माजरी, जाटोंवाला, कल्याणपुर और ढाका जैसे कई गांवों में भी जनसंख्या का संतुलन पूरी तरह बदल चुका है।

केवल पांचवा दून के 28 गांवों में यह डेमोग्राफिक परिवर्तन दर्ज किया गया है, जिससे यह इलाका अब एक “जनसांख्यिकीय हॉटस्पॉट” के रूप में देखा जा रहा है। यह बदलाव केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई स्तरों पर सुनियोजित हेरा-फेरी की बात सामने आई है। जांच में खुलासा हुआ है कि ग्राम प्रधानों और ग्राम सभा के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से परिवार रजिस्टरों में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई। जिन महिलाओं की शादी उत्तराखंड से बाहर हो चुकी थी, उनके नाम रजिस्टर से हटाए ही नहीं गए। उल्टा उनके पति और बच्चों के नाम भी गांव के स्थायी निवासियों के रूप में दर्ज करा दिए गए। पंचायत चुनावों में वोट बैंक बढ़ाने के लिए बाहरी रिश्तेदारों और परिचितों के नाम भी योजनाबद्ध तरीके से जोड़े गए, जिससे वे न केवल वोटर सूची में शामिल हो गए बल्कि सरकारी योजनाओं के लाभार्थी भी बन बैठे।

जांच एजेंसियों को अगस्त महीने में इस फर्जीवाड़े का बड़ा सुराग तब मिला, जब एक कॉमन सर्विस सेंटर पर नकली प्रमाणपत्र बनाने का बड़ा रैकेट पकड़ा गया। पूछताछ में सामने आया कि यह कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य जनसंख्या संतुलन को प्रभावित करना और पंचायत चुनावों में राजनीतिक बढ़त हासिल करना था। पिछले दस वर्षों में धीरे-धीरे किए गए इस बदलाव ने कई गांवों की सामाजिक संरचना को पूरी तरह बदल दिया। पहले जिन गांवों में सत्तर प्रतिशत हिंदू और तीस प्रतिशत मुस्लिम थे, वहां अब अनुपात पूरी तरह पलट चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव प्राकृतिक नहीं बल्कि सुनियोजित प्रयासों का नतीजा है, जिसमें दस्तावेज़ों की हेराफेरी और प्रशासनिक लापरवाही दोनों की भूमिका रही।

विकासनगर क्षेत्र उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश की सीमाओं से सटा हुआ इलाका है, जिससे यहां बाहरी प्रवासियों का आना-जाना आम रहा है। लेकिन इस बार जो तस्वीर सामने आई है, उसने प्रदेश सरकार को भी सतर्क कर दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताते हुए स्पष्ट कहा कि राज्य की डेमोग्राफी में हो रहा परिवर्तन एक गंभीर विषय है और सरकार इसे हल्के में नहीं लेगी। हल्द्वानी में मीडिया से बातचीत में धामी ने कहा कि उत्तराखंड के मूल स्वरूप और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाया जाएगा। उन्होंने यह भी संकेत दिए कि पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में इस बदलाव में जिन अधिकारियों की भूमिका रही है, उनकी पहचान कर कार्रवाई की जाएगी।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस दिशा में ठोस कदम उठाते हुए गृह विभाग को परिवार रजिस्टरों और जनसंख्या डेटा के सत्यापन के लिए एक विशेष डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार करने के निर्देश दिए हैं। सूत्रों के अनुसार, इस विशेष ऐप का ट्रायल शुरू हो चुका है और महीने के अंत तक इसे पूरी तरह कार्यान्वित कर दिया जाएगा। सरकार का मानना है कि डिजिटल सत्यापन के माध्यम से फर्जी नामों की पहचान तेजी से संभव होगी और जनसांख्यिकीय असंतुलन की जांच में पारदर्शिता आएगी। यह ऐप न केवल परिवार रजिस्टरों की जांच करेगा बल्कि आधार, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसी सरकारी सूचनाओं को भी एकीकृत करेगा, ताकि किसी व्यक्ति का दोहरा पंजीकरण न हो सके।

देहरादून के इन गांवों में जो जनसंख्या का परिवर्तन दर्ज हुआ है, वह केवल एक जिले की कहानी नहीं, बल्कि पूरे राज्य के लिए चेतावनी की घंटी है। यह परिवर्तन प्रशासनिक उदासीनता और स्थानीय स्तर पर राजनीति के गठजोड़ का परिणाम प्रतीत होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह प्रवृत्ति यूं ही जारी रही, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड की सामाजिक और राजनीतिक संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। यह केवल जनगणना का मामला नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान और सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उत्तराखंड सरकार इस जनसांख्यिकीय बदलाव को रोकने में सफल हो पाएगी? क्या गांवों के परिवार रजिस्टरों से फर्जी नाम हटाकर वास्तविक जनसंख्या का रिकॉर्ड बहाल किया जाएगा? और क्या उन अधिकारियों पर कार्रवाई होगी जिन्होंने अपने लाभ के लिए पूरे तंत्र को गुमराह किया? फिलहाल, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सक्रियता ने इस मुद्दे को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बना दिया है। देवभूमि की डेमोग्राफी में आए इस बदलाव ने न केवल राजनीतिक हलकों में बल्कि आम जनता के बीच भी गंभीर चिंता पैदा कर दी है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार इस असंतुलन को ठीक कर पाएगी, या फिर आने वाले समय में यह बदलाव उत्तराखंड की सामाजिक संरचना और राजनीति दोनों को नई दिशा दे देगा।

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