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जमीन कब्जा विवाद से हड़कंप, शक्ति अग्रवाल पर आरोपों ने प्रशासनिक भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल

रात के अंधेरे में जेसीबी से चारदीवारी तोड़े जाने, वैध दस्तावेज होने के बावजूद कब्जे की कोशिश, पीड़ितों की शिकायत, प्रशासनिक जांच, राजनीतिक हस्तक्षेप और मुख्यमंत्री तक पहुंचे मामले ने काशीपुर की कानून व्यवस्था पर बड़े प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।

काशीपुर। उत्तराखंड के काशीपुर शहर में इन दिनों एक बहुचर्चित जमीन विवाद ने प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक हलकों में गहरी बेचैनी पैदा कर दी है। शहर की जिस भूमि को लेकर यह पूरा मामला सामने आया है, उसे लेकर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला लगातार तेज होता जा रहा है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि एक चर्चित व्यवसायी एवं प्रॉपर्टी डीलर शक्ति अग्रवाल ने प्रशासन की कथित मिलीभगत से उस जमीन पर जबरन कब्जा करने की कोशिश की, जो विधिवत रूप से अन्य लोगों के नाम दर्ज है। इस पूरे प्रकरण को लेकर शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म है और आमजन के बीच यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या प्रभावशाली लोगों के आगे कानून और नियम कमजोर पड़ते जा रहे हैं। पीड़ित पक्ष ने न केवल पुलिस को तहरीर दी है, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी इस मामले को उठाया गया है। जमीन से जुड़ा यह विवाद अब सिर्फ निजी मामला न रहकर सार्वजनिक बहस का विषय बन गया है, जिसमें पारदर्शिता, निष्पक्षता और कानून के राज को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

शहर के कई प्रमुख नागरिकों ने इस प्रकरण को लेकर पूर्व विधायक हरभजन सिंह चीमा से मुलाकात कर अपनी पीड़ा साझा की। इस मुलाकात में सुनील छाबड़ा, पूर्व पालिकाध्यक्ष शमशुद्दीन समेत अन्य लोग मौजूद रहे, जिन्होंने पूरे घटनाक्रम की जानकारी विस्तार से दी। उनका कहना था कि ग्राम चांदपुर स्थित जिस भूमि को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह उन्होंने पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनाते हुए खरीदी थी। संबंधित जमीन की रजिस्ट्री कराई गई, दाखिल-खारिज भी पूरा हुआ और सभी दस्तावेज राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हैं। इसके बावजूद अब एक पक्ष द्वारा जमीन पर जबरन कब्जा करने की कोशिश की जा रही है, जो न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों पर सीधा हमला भी है। पीड़ितों ने यह भी बताया कि उन्होंने पहले ही पुलिस को शिकायत देकर सुरक्षा और न्याय की मांग की है, लेकिन इसके बावजूद कथित दबाव के चलते हालात बिगड़ते चले गए।

बीती रात की घटना ने इस विवाद को और भी गंभीर मोड़ पर ला खड़ा किया। पीड़ितों के अनुसार बुधवार देर रात करीब दो बजे अचानक जेसीबी मशीन और भारी वाहनों के साथ कुछ लोग मौके पर पहुंचे और प्लॉट की चारदीवारी को तोड़ दिया गया। आरोप है कि इस पूरी कार्रवाई का उद्देश्य जमीन पर कब्जा करना था। रात के अंधेरे में की गई इस कार्रवाई ने न केवल जमीन मालिकों को दहशत में डाल दिया, बल्कि आसपास के लोगों में भी भय का माहौल बना दिया। पीड़ितों का कहना है कि यदि जमीन से जुड़े कागजात वैध हैं और विवाद अदालत में विचाराधीन है, तो इस तरह की जबरदस्ती किस कानून के तहत की गई। उनका आरोप है कि यह सब कुछ प्रशासन की शह पर हुआ, क्योंकि बिना किसी रोक-टोक के भारी मशीनें मौके तक पहुंचीं और कार्रवाई को अंजाम दिया गया। इस घटना ने प्रशासन की भूमिका पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं।

इस मामले में राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई है। पूर्व विधायक हरभजन सिंह चीमा ने पीड़ितों की बात सुनने के बाद उन्हें भरोसा दिलाया कि वह इस पूरे प्रकरण में उचित कार्रवाई के लिए प्रयास करेंगे। उन्होंने कहा कि यदि किसी के साथ अन्याय हुआ है तो उसे न्याय मिलना चाहिए और कानून को अपने हाथ में लेने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाने चाहिए। दूसरी ओर, प्रशासनिक स्तर पर भी बयान सामने आया है। तहसीलदार पंकज चंदोला ने कहा कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एक टीम गठित कर दी गई है और जमीन की पैमाइश कर रिपोर्ट मांगी गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह निजी भूमि विवाद है और किसी भी तरह के निर्माण या कार्य को रोकने अथवा जारी रखने के लिए संबंधित पक्ष सिविल कोर्ट की शरण ले सकता है। हालांकि, प्रशासन के इस बयान के बाद भी लोगों के मन में कई सवाल बने हुए हैं।

जमीन विवाद को लेकर सामाजिक स्तर पर भी विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। समाजसेवी गगन कांबोज ने इस प्रकरण को लेकर एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर व्यवसायी शक्ति अग्रवाल पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि यह मामला अब सिर्फ काशीपुर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे जिले और उत्तराखंड में चर्चा का विषय बन चुका है। गगन कांबोज का दावा है कि इस विवाद ने आम व्यापारियों और निवेशकों में भय का माहौल पैदा कर दिया है। उनका कहना है कि यदि इस तरह खुलेआम जमीनों पर कब्जे की कोशिशें होती रहीं, तो शहर की छवि को भारी नुकसान पहुंचेगा और लोग यहां निवेश करने से कतराने लगेंगे। उन्होंने प्रशासन पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है।

प्रेस कांफ्रेंस के दौरान गगन कांबोज ने कई दस्तावेज भी मीडिया के सामने रखे। उन्होंने बताया कि संबंधित जमीन की रजिस्ट्री 28 अक्टूबर 2022 को सुनील छाबड़ा और नमन गुप्ता के नाम से कराई गई थी। इसके बाद नियमानुसार दाखिल-खारिज की प्रक्रिया पूरी हुई और रिकॉर्ड में उनके नाम दर्ज हो गए। बाद में मई 2023 में यह भूमि अन्य लोगों को बेची गई, जिनके नाम भी राजस्व अभिलेखों में दर्ज हैं। उनका आरोप है कि इतने स्पष्ट दस्तावेजों के बावजूद हाल ही में रात के अंधेरे में जेसीबी और डंपरों के जरिए जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की गई। गगन कांबोज ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि यह सीधे-सीधे कानून और न्याय व्यवस्था की अवहेलना है।

व्यापारी वर्ग की चिंता को भी इस मामले में प्रमुखता से उठाया गया है। गगन कांबोज का कहना है कि इस तरह की घटनाओं से शहर के व्यापारी भयभीत हैं और उन्हें अपने निवेश की सुरक्षा को लेकर चिंता सताने लगी है। यदि समय रहते इस मामले में सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में और भी पीड़ित सामने आ सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि जमीन कब्जा जैसे मामलों पर यदि प्रशासन ने आंखें मूंदे रखीं, तो इससे अराजकता को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और लोगों का भरोसा कानून व्यवस्था पर बना रहे।

इस प्रकरण को लेकर एक और बड़ा दावा भी सामने आया है, जिसने मामले को और गंभीर बना दिया है। प्रेस कांफ्रेंस में यह कहा गया कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्वयं इस पूरे मामले का संज्ञान लिया है और जांच के आदेश दिए हैं। गगन कांबोज ने कहा कि मुख्यमंत्री स्तर से हस्तक्षेप के बाद अब प्रशासनिक जांच और पैमाइश रिपोर्ट के आधार पर सच्चाई सामने आएगी। इस दावे के बाद लोगों की उम्मीदें बढ़ गई हैं कि शायद अब इस विवाद का निष्पक्ष समाधान निकल सकेगा। हालांकि, अभी तक आधिकारिक रूप से इस संबंध में विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन मुख्यमंत्री का नाम जुड़ने से मामला राज्य स्तर पर चर्चा में आ गया है।

फिलहाल, जमीन कब्जा प्रकरण को लेकर काशीपुर का माहौल पूरी तरह गरमाया हुआ है। राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों तक, हर कोई इस मामले में निष्पक्ष जांच और न्याय की मांग कर रहा है। लोगों की नजरें अब प्रशासनिक जांच, पैमाइश रिपोर्ट और आगे होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं। यह मामला सिर्फ एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि कानून के राज, प्रशासनिक निष्पक्षता और आम नागरिकों के अधिकारों की परीक्षा बन गया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि जांच के बाद क्या सच सामने आता है और दोषियों पर किस तरह की कार्रवाई होती है।

शक्ति अग्रवाल के खिलाफ उठ रहे सवाल अब केवल सामान्य जिज्ञासा नहीं रह गए हैं, बल्कि वे सीधे तौर पर कानून, प्रशासनिक निष्पक्षता और आम नागरिकों के अधिकारों से जुड़े गंभीर प्रश्न बन चुके हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब संबंधित जमीन की रजिस्ट्री और दाखिल-खारिज स्पष्ट रूप से अन्य लोगों के नाम दर्ज हैं, तो फिर किस वैधानिक आधार पर उस भूमि पर कब्जा करने की कोशिश की गई। इसके साथ ही यह भी रहस्यमय बना हुआ है कि पूरी कार्रवाई रात के अंधेरे में क्यों की गई और जेसीबी व डंपरों जैसी भारी मशीनरी का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया, क्या यह सब किसी योजनाबद्ध रणनीति का हिस्सा था। इस घटनाक्रम ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या इस कार्रवाई से पहले किसी न्यायालय या प्रशासनिक अधिकारी से अनुमति ली गई थी, या फिर नियम-कानून को ताक पर रखकर एकतरफा कदम उठाया गया।

इन सवालों के बीच प्रशासन की कथित भूमिका भी संदेह के घेरे में है। यदि यह विवाद निजी भूमि से जुड़ा है, तो फिर जबरन कार्रवाई करने की आवश्यकता क्यों पड़ी और कानूनी प्रक्रिया का सहारा क्यों नहीं लिया गया। यह भी सोचने वाली बात है कि जमीन से जुड़े दस्तावेजों की वैधता पर आपत्ति पहले क्यों नहीं उठाई गई और अचानक रातों-रात कार्रवाई का फैसला कैसे लिया गया। इस पूरे घटनाक्रम से शहर में जो भय और असुरक्षा का माहौल बना है, उसने व्यापारियों और निवेशकों को गहरी चिंता में डाल दिया है, ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि उनकी सुरक्षा और भरोसे की जिम्मेदारी आखिर किसकी बनती है।

सबसे अहम बात यह है कि क्या इस पूरे मामले से कानून व्यवस्था की छवि को नुकसान नहीं पहुंचा है और क्या आम जनता में यह संदेश नहीं गया कि प्रभावशाली लोगों के आगे नियम-कायदे बौने पड़ जाते हैं। अब जबकि निष्पक्ष जांच की बात कही जा रही है, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इस जांच में सहयोग देने के लिए शक्ति अग्रवाल क्या ठोस कदम उठाने को तैयार हैं। इन तमाम सवालों के जवाब केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पूरे सिस्टम की पारदर्शिता, जवाबदेही और न्यायप्रियता की कसौटी बन चुके हैं।

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