रामनगर। जिला नैनीताल की अपर सत्र न्यायालय में कथित गोवंश व छोई मांस प्रकरण को लेकर मंगलवार को एक बार फिर कानूनी हलचल तेज़ दिखाई दी, जब इस संवेदनशील मामले में नामजद अभियुक्तों की जमानत अर्जी पर विस्तार से सुनवाई हुई। माननीय अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत में अभियुक्त सागर मनराल उर्फ गौरव, पंकज धसमाना तथा करण आर्य की ओर से दाखिल जमानत प्रार्थना पत्रों पर लंबी बहस हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क मजबूती से प्रस्तुत किए। न्यायालय परिसर में इस दौरान सुरक्षा के भी पुख्ता इंतज़ाम किए गए थे, क्योंकि मामला सामाजिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने घटना की पृष्ठभूमि, आरोपों की गंभीरता तथा इससे जुड़े साक्ष्यों की विस्तार से जानकारी अदालत के समक्ष रखी। अदालत ने भी पूरे मामले को गहराई से समझते हुए सभी पक्षों की दलीलों को धैर्यपूर्वक सुना, जिससे यह साफ संकेत मिला कि न्यायालय इस प्रकरण को सामान्य अपराध के रूप में नहीं बल्कि गंभीर सामाजिक अपराध के रूप में देख रहा है।
इस मामले में वादिनी नूरजहाँ की ओर से पेश हुए अधिवक्ता फैजुल हक व सिद्धार्थ अग्रवाल ने अदालत में अत्यंत सशक्त और ठोस तर्क रखते हुए जमानत का पुरज़ोर विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह प्रकरण केवल कथित गोवंश या छोई मांस से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर मॉब लिंचिंग जैसी घटना से संबंधित है, जिसमें कानून-व्यवस्था और आम नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। अधिवक्ताओं ने न्यायालय को अवगत कराया कि यदि इस तरह के गंभीर अपराध में अभियुक्तों को जमानत प्रदान की जाती है, तो इससे न केवल समाज में गलत संदेश जाएगा, बल्कि अभियुक्तों द्वारा वादिनी नूरजहाँ और अन्य महत्वपूर्ण गवाहों को प्रभावित किए जाने की भी प्रबल आशंका है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अभियुक्त प्रभावशाली हैं और बाहर आने की स्थिति में साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर सकते हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया बाधित हो सकती है। अदालत में रखे गए इन तर्कों को सुनकर माहौल काफी गंभीर हो गया।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने मेडिकल रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें घटना के समय वाहन चालक को गंभीर चोट पहुंचने की पुष्टि की गई है। यह रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह घटना केवल अफवाह या मामूली विवाद तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें शारीरिक हिंसा का प्रयोग किया गया था। अभियोजन ने बताया कि चालक को आई चोटें सामान्य नहीं थीं और डॉक्टरों द्वारा उन्हें गंभीर श्रेणी में रखा गया है। इस तथ्य ने मामले की गंभीरता को और अधिक उजागर कर दिया। अदालत ने मेडिकल साक्ष्य को महत्वपूर्ण मानते हुए यह संकेत दिया कि इस प्रकार की हिंसक घटनाओं में न्यायालय को अत्यंत सावधानी के साथ निर्णय लेना आवश्यक है। अभियोजन पक्ष का कहना था कि ऐसे मामलों में जमानत देना पीड़ित पक्ष के साथ अन्याय होगा और इससे समाज में भय का माहौल भी पैदा हो सकता है। इन तथ्यों के आधार पर जमानत याचिका को खारिज करने की मांग की गई।

अदालत में अभियुक्तों की ओर से भी जमानत के समर्थन में तर्क दिए गए, लेकिन अभियोजन द्वारा रखे गए तथ्यों और मामले की संवेदनशीलता के सामने वे प्रभावी साबित नहीं हो सके। माननीय अपर सत्र न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद यह टिप्पणी की कि प्रथम दृष्टया मामला गंभीर प्रकृति का प्रतीत होता है और इसमें सामाजिक शांति भंग होने के तत्व मौजूद हैं। न्यायालय ने यह भी माना कि यदि इस स्तर पर अभियुक्तों को जमानत दी जाती है, तो इससे जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। विशेष रूप से वादिनी नूरजहाँ और अन्य गवाहों की सुरक्षा को लेकर अदालत ने चिंता व्यक्त की। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि फिलहाल अभियुक्तों को राहत देना न्यायोचित नहीं होगा और कानून के हित में कड़ा रुख अपनाना आवश्यक है।
अंततः माननीय न्यायालय ने विस्तृत सुनवाई और सभी तथ्यों पर विचार करने के उपरांत अभियुक्त सागर मनराल उर्फ गौरव, पंकज धसमाना तथा करण आर्य की जमानत प्रार्थना पत्रों को निरस्त करने का आदेश पारित कर दिया। आदेश सुनाए जाने के बाद न्यायालय परिसर में मौजूद लोगों के बीच यह संदेश गया कि कानून ऐसे मामलों में सख्ती बरतने से पीछे नहीं हटेगा। वादिनी पक्ष ने न्यायालय के इस फैसले को न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया, वहीं अभियोजन ने इसे कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए आवश्यक निर्णय करार दिया। इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि मॉब लिंचिंग और कथित गोवंश से जुड़े मामलों में कानून को कितना सख्त होना चाहिए। फिलहाल, जमानत निरस्त होने के बाद तीनों अभियुक्त न्यायिक हिरासत में रहेंगे और आगे की कानूनी प्रक्रिया के तहत मामले की सुनवाई जारी रहेगी, जिस पर पूरे क्षेत्र की निगाहें टिकी हुई हैं।
अधिवक्ता फैजुल हक ने इस न्यायालय के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह निर्णय न केवल कानून और न्याय की सख्ती को दर्शाता है बल्कि ऐसे गंभीर मॉब लिंचिंग प्रकरणों में समाज में भय और अव्यवस्था फैलाने वाले तत्वों के खिलाफ एक स्पष्ट संदेश भी है। उन्होंने बताया कि वादिनी नूरजहाँ और अन्य गवाहों की सुरक्षा सर्वोपरि है और अदालत ने इसे ध्यान में रखते हुए सही दिशा में कदम उठाया है। फैजुल हक ने कहा कि ऐसे मामलों में जमानत देने से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती थी और अपराधियों को गलत संदेश जाता, इसलिए अदालत का रुख न्यायसंगत और संवेदनशील दोनों ही दृष्टियों से सही है।
सिद्धार्थ अग्रवाल ने इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत ने अपने फैसले में संवेदनशीलता और गंभीरता का परिचय दिया है। उन्होंने बताया कि यह निर्णय न केवल अभियुक्तों के लिए बल्कि समाज के लिए भी चेतावनी है कि कानून के संरक्षण में किसी प्रकार की हिंसा या दबाव सहन नहीं किया जाएगा। अग्रवाल ने कहा कि न्यायालय द्वारा जमानत निरस्त करना यह सुनिश्चित करता है कि गवाह और पीड़ित पक्ष बिना किसी भय के न्यायिक प्रक्रिया में भाग ले सकें, और यह समाज में कानून का आदर बनाए रखने में मदद करेगा।



