काशीपुर। शहर में उत्साह का माहौल तब बन गया जब गुरु तेग बहादुर साहिब और उनके साथ शहीद हुए भाई मती दास जी, भाई सती दास जी तथा भाई दयाला जी के 350वें शहीदी दिवस को समर्पित शहीदी नगर कीर्तन गुरुद्वारा श्री ननकाना साहिब पहुंचा। यह पावन यात्रा श्री हरमिंदर साहिब जी पटना साहिब से आरम्भ होकर देश के विभिन्न हिस्सों से गुज़रती हुई उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले तक पहुँची और देर रात करीब दस बजे नगर कीर्तन ने काशीपुर के मार्गों को गरिमा और श्रद्धा से भर दिया। नगर कीर्तन के आने पर गुरुद्वारे में उपस्थित साध संगत ने पुष्प वर्षा के साथ सतनाम वाहेगुरु के जोशपूर्ण जाप से स्वागत किया, जिससे हर नेत्र आंसुओं से भर गया और श्रद्धालुओं ने अपने-अपने ढंग से श्रद्धांजलि अर्पित की। यात्रा के आयोजनों और श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने यह संदेश दिया कि तीन सौ पचास साल बाद भी उन शहादतों की गूँज अभी तक जन-जन के दिलों में उतनी ही ताज़ा है जितनी कभी थी, और यह मानवता, धर्मनिरपेक्षता तथा एक दूसरे के अधिकारों की रक्षा की स्मृति बनकर जीवित है।
रात्रि के समय जब नगर कीर्तन शहर के संकरे मार्गों से गुज़र रहा था, तब हर उम्र के लोग, महिलाएं, पुरुष और बच्चे हाथ में ध्वज लिए, भजन-कीर्तन और बाणी का क्रम बनाए हुए आगे-आगे चल रहे थे। गुरुद्वारे के प्रांगण में पहुंचकर साध संगत ने गुरु तेग बहादुर साहिब की शहादत और उनके साथ शहीद हुए भाई मती दास जी, भाई सती दास जी, भाई दयाला जी की कुर्बानियों को आदर के साथ याद किया। इस पवित्र अवसर पर उपस्थित लोगों में भावभीनी करुणा के साथ-साथ ऐतिहासिक सत्य के प्रति दृढ़ निश्चय की भी झलक थी कि धर्म को मज़बूत रखने हेतु जो बलिदान दिए गए वे व्यर्थ नहीं गए। नगर कीर्तन के माध्यम से यह भी स्पष्ट हुआ कि आज का समाज भी उन मूल्यों को बनाए रखने हेतु चिंतित है कृ चाहे वह धर्म की स्वतंत्रता हो, मानवाधिकार हों या राष्ट्रहित में की गई कुर्बानियाँ कृ और यह यात्रा उन्हीं सिद्धांतों को जन-जन तक पहुँचाने का महत्त्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरी।
तख्त श्री हरमंदिर साहिब पटना के आयोजकों ने इस लंबी यात्रा को धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बताया। तख्त श्री हरमंदिर साहिब पटना द्वारा आयोजित यह शहीदी नगर कीर्तन पटना से आरम्भ होकर कई राज्यों के महत्वपूर्ण पड़ावों से होकर गुज़री और इसका अंतिम गंतव्य श्री आनंदपुर साहिब रखा गया है, जो लंबे अरसे के संघर्ष और सच्चाई की विजय का प्रतीक है। नगर कीर्तन के इंचार्ज हरजीत सिंह ने मीडिया से रूबरू होते हुए विस्तार से बताया कि इस यात्रा का उददेश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों में उन महान व्यक्तित्वों की शहादत की स्मृति को जागृत रखना है, ताकि इतिहास की यह सीखकृकि किसी भी व्यक्ति को अपने धर्म या मान्यताओं के अनुसार जीने का अधिकार हैकृहमारे समाज से कभी मिटे नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि यह यात्रा बिहार सरकार और संबंधित संस्थाओं के सहयोग से संभव हुई है और इसी सहयोग ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर विशेष महत्व दिया है।
हरजीत सिंह ने कहा कि गुरु तेग बहादुर साहिब ने सत्ताधारियों के अत्याचार के विरुद्ध जो साहस और सत्य का प्रतिकार किया, वह आज भी उदाहरण है। उन्होंने उपस्थित जनमानस को बताया कि उस समय के शासक ने धर्म परिवर्तन का दबाव बनाकर लोगों की आस्था पर हमला किया, किन्तु गुरु तेग बहादुर साहिब और उनके साथियों ने अपने विश्वास पर अडिग रहते हुए मानवता के लिये बलिदान दिया। यह संदेश हरजीत सिंह ने जोर देकर कहा कि इतिहास में ऐसे उदाहरण बार-बार सामने आते हैं जहाँ सत्ता सत्य को दबाने की कोशिश करती है, परन्तु सत्य की शक्ति समय के साथ सभी बाधाओं को पार कर जाती है। इसलिए यह यात्रा हर उस व्यक्ति के लिये प्रेरणा है जो आज भी अपने धर्म, अपनी पहचान और अपने अधिकारों की रक्षा के लिये आवाज़ उठाता है।
गौरतलब है कि गुरु तेग बहादुर साहिब की शहादत सन एक हजार छह सौ पिचहत्तर की है और उस समय से आज तक उनकी याद मानवता को न्याय व स्वतंत्रता के महत्व की सीख देती आ रही है। गुरुद्वारा शीश गंज जैसी ऐतिहासिक स्थलों पर उनकी दी गई कुर्बानी की यादें बसी हुई हैं, और तीन सौ पचास साल पूरे होते हुए यह शहीदी दिवस न केवल पुरानी यादों का जश्न है बल्कि वर्तमान पीढ़ी को भी यह स्मरण कराता है कि यदि किसी के धर्म पर, पहचान पर या मानवाधिकारों पर हमला होता है तो उसके विरुद्ध खड़े होना प्रत्येक सज्जन का नैतिक दायित्व है। नगर कीर्तन में शामिल लोगों ने यही संकल्प लिया कि वह गुरु तेग बहादुर साहिब और उनके सहयोधाओं के आदर्शों को जिन्दा रखेंगे और भाई मती दास जी, भाई सती दास जी व भाई दयाला जी जैसी कुर्बानियों को कभी भुलने नहीं देंगे।
यहाँ उपस्थित संगठनकर्ताओं और साध संगत ने पैगाम दिया कि विविधता में एकता ही राष्ट्र की शान है और धार्मिक स्वतंत्रता प्रत्येक नागरिक का अजस्र अधिकार है। नगर कीर्तन का समापन गुरुद्वारा श्री ननकाना साहिब में हुआ, जहाँ श्रद्धालुओं ने सामूहिक दक्षिणा, भजन-कीर्तन और आखिरी अरदास कर के इस ऐतिहासिक यात्रा को सफलतापूर्वक सम्पन्न किया। इस अवसर पर बार-बार वही उद्घोष बजता रहाकृवाहेगुरु जी का खालसा वा मेरा नामकृजो न केवल धार्मिक नारा है बल्कि एकता, समानता और न्याय का प्रतीक भी है। अंततः यह आयोजन एक चेतावनी और प्रेरणा दोनों बनारू चेतावनी उन ताकतों के लिये जो मानवीय अधिकारों का हनन चाहती हैं, और प्रेरणा उन सभी के लिये जो सत्य और धार्मिक स्वतंत्रता के लिये डटे रहते हैं।



