देहरादून(सुनील कोठारी)। उत्तराखंड की सियासत एक बार फिर से हलचल में है। कांग्रेस ने आगामी दो हजार सत्ताईस के विधानसभा चुनावों से पहले एक बड़ा दांव खेलते हुए गणेश गोदियाल को दोबारा प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप दी है। इस कदम ने न केवल प्रदेश की राजनीति में नई हलचल मचा दी है, बल्कि पार्टी के भीतर भी नई ऊर्जा का संचार कर दिया है। माना जा रहा है कि कांग्रेस इस बार संगठन को नई दिशा और धार देने के लिए अपने भरोसेमंद और जनसंवादी नेता पर दांव लगा चुकी है। जिस चेहरे ने हार के बावजूद कभी हार नहीं मानी, वही अब फिर से पार्टी की बागडोर संभालने जा रहा है। गणेश गोदियाल की वापसी कांग्रेस के लिए एक प्रयोग नहीं बल्कि एक सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है, जो संगठन की खोई हुई चमक लौटाने की कोशिश का हिस्सा है।
राजनीतिक गलियारों में इस फैसले को कांग्रेस का “मास्टरस्ट्रोक” कहा जा रहा है। दो हजार इक्कीस में जब गणेश गोदियाल को पहली बार प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था, तब समय बहुत कम और संगठन बिखरा हुआ था। चुनाव सर पर थे और आंतरिक असंतोष अपनी चरम सीमा पर था। दो हजार बाईस की हार के बाद गोदियाल ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। कांग्रेस ने एक बार फिर उन्हीं पर भरोसा जताते हुए उन्हें दोबारा कमान सौंपी है। पार्टी का मानना है कि गोदियाल की सादगी, जमीनी जुड़ाव और आक्रामक संवाद शैली ही वह ताकत है, जो कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक सकती है। जनता के बीच उनकी छवि एक ऐसे नेता की है जो हारकर भी मैदान नहीं छोड़ता।
उत्तराखंड की राजनीति में गणेश गोदियाल कोई नया नाम नहीं हैं। दो हजार दो के चुनावों में जब राज्य की राजनीति अपने शुरुआती दौर में थी, तब उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस को मजबूत आधार दिया था। हालांकि दो हजार सत्रह और दो हजार बाईस में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। जनता से उनका जुड़ाव और कार्यकर्ताओं के बीच उनका सम्मान, यही वजह रही कि हार के बावजूद वह कभी हाशिए पर नहीं गए। कांग्रेस आलाकमान ने उनकी इसी जुझारू छवि पर भरोसा जताते हुए उन्हें फिर से प्रदेश की कमान सौंपी है।
कांग्रेस के इस पुनर्गठन में केवल गणेश गोदियाल ही नहीं, बल्कि दो और बड़े नामों को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। प्रीतम सिंह को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष और हरक सिंह रावत को चुनाव संचालन से जुड़ी अहम भूमिका सौंपी गई है। यह तिकड़ी कांग्रेस की नई रणनीति का केंद्र बिंदु मानी जा रही है। पार्टी की कोशिश है कि अनुभव, ऊर्जा और संगठनात्मक कौशल के इस संतुलन से वह भाजपा के सामने एक मज़बूत चुनौती पेश कर सके। सवाल यह है कि क्या यह नई टीम कांग्रेस की तकदीर बदल पाएगी या फिर यह भी एक और प्रयोग बनकर रह जाएगी।
गणेश गोदियाल का अंदाज़ उत्तराखंड की धरती की तरह सादा और पारदर्शी है। उनका बोलचाल का तरीका गढ़वाली संस्कृति की मिठास लिए हुए होता है, और यही जनता के बीच उनकी सबसे बड़ी ताकत है। वह सिर्फ नेता नहीं, बल्कि एक संवादक के रूप में जाने जाते हैं कृ जो जनता की भाषा में बात करता है, उनके सवालों का जवाब तथ्यों से देता है, और विपक्ष पर तीखे सवाल भी दागता है। 2024 के लोकसभा चुनावों में भले ही वह भाजपा प्रत्याशी अनिल बलूनी से हार गए हों, लेकिन जिस जज्बे और रणनीति से उन्होंने मुकाबला किया, उसने उन्हें फिर सुर्खियों में ला दिया। कांग्रेस को आज ऐसे ही नेताओं की दरकार है कृ जो हार में भी उम्मीद तलाश सकें और कार्यकर्ताओं में भरोसा जगा सकें।
इस बार चुनौती और भी बड़ी है। कांग्रेस को न केवल जनता के बीच अपनी खोई हुई साख वापस पाना है, बल्कि संगठनात्मक ढांचे को भी फिर से खड़ा करना है। प्रदेश में लगातार बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच पार्टी को एक ऐसी रणनीति की जरूरत है जो जनता तक उसकी बात प्रभावशाली ढंग से पहुंचा सके। भाजपा इस समय संगठनात्मक रूप से बेहद मजबूत स्थिति में है। ऐसे में कांग्रेस को एक सटीक दिशा और टीम भावना की सख्त आवश्यकता है। गणेश गोदियाल के सामने सबसे बड़ी कसौटी यही होगी कि वह न केवल पार्टी को एकजुट रखें, बल्कि असंतोष की लहर को भी थाम सकें।
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से चंचल राज्य में हर कदम सोच-समझकर रखना पड़ता है। कांग्रेस के लिए यह केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि एक ‘नया प्रयोग’ है, जिसकी सफलता या विफलता आने वाले चुनावी परिणाम तय करेंगे। अगर गणेश गोदियाल जनता से जुड़ने और कार्यकर्ताओं को साथ लाने में सफल रहे, तो यह कांग्रेस की राजनीति में निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। पर अगर यह प्रयास भी विफल रहा, तो यह एक और ‘रीशफलिंग’ बनकर रह जाएगा, जैसा पहले कई बार होता आया है।
वर्तमान परिस्थितियों में कांग्रेस के लिए यह लड़ाई केवल चुनावी नहीं बल्कि अस्तित्व की भी है। पार्टी के भीतर जो खामोश असंतोष है, उसे विश्वास में बदलना अब गोदियाल की जिम्मेदारी है। संगठन को एक दिशा देना और जनता के बीच यह भरोसा जगाना कि कांग्रेस ही एक विकल्प है कृ यही मिशन है। जनता अब वादों से ज़्यादा भरोसे पर विश्वास करती है और यह भरोसा केवल कर्मशील नेतृत्व से ही पैदा हो सकता है। फिलहाल कांग्रेस ने पासा फेंक दिया है। अब निगाहें जनता पर हैं कि वह दो हजार सत्ताईस में किसे ताज पहनाती है। उत्तराखंड की राजनीति एक नए अध्याय की ओर बढ़ रही है और उस अध्याय का नाम है कृ गणेश गोदियाल। पार्टी का भविष्य, कार्यकर्ताओं का जोश और संगठन की एकता कृ तीनों का भाग्य अब इसी नाम पर टिका है। अगर यह दांव सफल हुआ, तो कांग्रेस के लिए यह न सिर्फ पुनर्जन्म होगा बल्कि नई दिशा की शुरुआत भी।



