उत्तराखण्ड(सुनील कोठारी)।गंगोत्री को सदियों से हिंदू आस्था का सर्वाेच्च तीर्थ माना जाता रहा है, जहां से न सिर्फ गंगा का उद्गम होता है बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना भी जुड़ी हुई है। आज यही पवित्र गंगोत्री घाटी एक ऐसे निर्णय के मुहाने पर खड़ी है, जो केवल एक सड़क परियोजना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। गंगोत्री हाईवे के चौड़ीकरण की प्रक्रिया शीघ्र आरंभ होने जा रही है और इसके लिए घाटी से लगभग छह हजार देवदार के वृक्षों को हटाने की तैयारी की जा रही है। सरकार का दावा है कि इससे यात्रा सुगम होगी, यातायात जाम कम होंगे और देश की सामरिक आवश्यकताओं को मजबूती मिलेगी, किंतु पर्यावरण वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला प्रकृति के साथ एक खतरनाक टकराव साबित हो सकता है, जिसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी।
सरकारी तर्कों के विपरीत, वैज्ञानिक समुदाय इस परियोजना को लेकर गहरी चिंता जता रहा है और इसे हिमालय के लिए एक गंभीर चेतावनी के रूप में देख रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि विकास के नाम पर अगर वैज्ञानिक चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया, तो इसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। सवाल यह नहीं है कि लोगों को बेहतर सड़कें मिलनी चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि हिमालय जैसे अति संवेदनशील क्षेत्र में किस प्रकार का विकास उपयुक्त है। गंगोत्री घाटी में रहने वाले लोगों की भी यही दुविधा है कि उन्हें सुरक्षित और टिकाऊ सड़कें चाहिए, न कि ऐसी परियोजनाएं जो भविष्य में भूस्खलन, आपदाओं और जान-माल के नुकसान का कारण बनें। जब कभी किसी बड़े हादसे की जिम्मेदारी तय करने का समय आएगा, तब यह सवाल भी उठेगा कि चेतावनियों के बावजूद जोखिम क्यों उठाया गया।
उत्तरकाशी से गंगोत्री तक फैला 102 किलोमीटर लंबा राष्ट्रीय राजमार्ग इस विवाद का केंद्र बिंदु है। इस मार्ग के लगभग आधे हिस्से में पहले ही चौड़ीकरण का कार्य चल रहा है, लेकिन झाला से भैरोंघाटी के बीच करीब 20 किलोमीटर का क्षेत्र ऐसा है जो इको-सेंसिटिव जोन के अंतर्गत आता है। यही वह हिस्सा है जहां सबसे अधिक विरोध दर्ज किया गया है। इस इलाके की संवेदनशीलता को देखते हुए कई पर्यावरणविदों और जनप्रतिनिधियों ने आपत्ति जताई है। छत्तीसगढ़ की सांसद रंजीत रंजन ने भी इस विषय को संसद में उठाया था, जिससे यह मामला राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया। अब सवाल यह उठता है कि जब उद्देश्य सभी का बेहतर भविष्य है, तो फिर यह टकराव क्यों उत्पन्न हो रहा है। असल में विवाद सड़क निर्माण से नहीं, बल्कि उसकी अत्यधिक चौड़ाई से जुड़ा हुआ है, जिसे वैज्ञानिक अनावश्यक और खतरनाक मान रहे हैं।
हर्षिल घाटी के दोनों ओर फैले पहाड़ी ढलान सामान्य नहीं हैं, बल्कि ये भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत नाजुक संरचनाएं हैं। इन ढलानों पर खड़े हजारों देवदार के पेड़ केवल वनस्पति नहीं, बल्कि प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम कर रहे हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि ये पेड़ हजारों वर्षों से ग्लेशियरों द्वारा लाई गई ढीली मिट्टी और मलबे को अपनी जड़ों से थामे हुए हैं। यही जड़ें ढलानों को स्थिर बनाए रखती हैं और बड़े भूस्खलनों को रोकती हैं। यदि इन पेड़ों को हटाया गया, तो ढलान सक्रिय हो जाएंगे और भविष्य में बड़े पैमाने पर भूस्खलन लगभग तय हो जाएगा। उत्तराखंड पहले ही इस तरह की घटनाओं का दर्दनाक अनुभव कर चुका है, जहां नई-नई जगहों पर लैंडस्लाइड जोन बन गए हैं और हाईवे पहले से अधिक असुरक्षित हो गए हैं।
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ नवीन जोयाल, डॉ हेमंत ध्यानी और अन्य विशेषज्ञों ने सरकार के सामने एक व्यावहारिक और वैज्ञानिक विकल्प रखा है। उनका सुझाव है कि पहाड़ी क्षेत्रों में 5.5 मीटर चौड़ी इंटरमीडिएट रोड बनाई जाए, जो इंडियन रोड कांग्रेस द्वारा भी प्रस्तावित मानक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस चौड़ाई में भी बड़े वाहन आसानी से गुजर सकते हैं और पहाड़ों को न्यूनतम नुकसान होता है। यह कोई नया या मनमाना सुझाव नहीं है, बल्कि स्वयं सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने वर्ष 2018 में एक सर्कुलर जारी कर स्पष्ट किया था कि हिमालयी क्षेत्रों में 5.5 मीटर चौड़ी इंटरमीडिएट सड़क ही उपयुक्त है। इसके बावजूद सीमा सड़क संगठन 11 मीटर चौड़ी सड़क पर अड़ा हुआ है, जबकि पहले मांग 12 मीटर की थी, जिसे धाराली आपदा के बाद घटाया गया।
सरकार और सीमा सड़क संगठन का तर्क है कि चौड़ाई एक मीटर कम करने से पेड़ों की कटाई 75 प्रतिशत तक घट जाएगी, लेकिन इस दावे पर विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। वैज्ञानिक पूछ रहे हैं कि आखिर एक मीटर की कमी से नुकसान इतना कम कैसे हो सकता है। इस सवाल का कोई ठोस और संतोषजनक उत्तर अब तक सामने नहीं आया है। विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविकता यह है कि चौड़ी सड़क बनाने के लिए बड़े पैमाने पर पहाड़ काटने पड़ते हैं, जिससे ढलानों की स्थिरता खत्म हो जाती है। इसका असर तुरंत भले न दिखे, लेकिन कुछ ही वर्षों में यह क्षेत्र बड़े हादसों का गवाह बन सकता है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि निर्णय लेने से पहले वैज्ञानिक तथ्यों और दीर्घकालिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जाए।
इस पूरे विवाद में माननीय सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। गंगोत्री हाईवे चौड़ीकरण के मामले को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरणविद डॉ रवि चोपड़ा की अध्यक्षता में एक हाई पावर कमेटी का गठन किया था। इस समिति में डॉ नवीन जोयाल, डॉ हेमंत ध्यानी, समीर सहित लगभग पैंतीस विशेषज्ञ शामिल थे। समिति ने विस्तृत अध्ययन के बाद अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें एक बहुमत और एक अल्पमत रिपोर्ट सामने आई। सुप्रीम कोर्ट ने अल्पमत रिपोर्ट को सही मानते हुए उसके पक्ष में फैसला दिया। यही वह रिपोर्ट थी, जिसमें सड़क की चौड़ाई 5.5 मीटर रखने की सिफारिश की गई थी। यह फैसला हिमालयी पर्यावरण की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया।
हालांकि, कुछ समय बाद सरकार ने राष्ट्रीय और सामरिक जरूरतों का हवाला देते हुए फिर से 12 मीटर चौड़ी सड़क बनाने की अनुमति सुप्रीम कोर्ट से मांगी। इससे पहले, वर्ष 2019 में इसी हाई पावर कमेटी ने सड़क एवं राजमार्ग मंत्रालय को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें वैज्ञानिक आधार पर बताया गया था कि पहाड़ों को काटकर चौड़ी सड़क बनाना आत्मघाती साबित हो सकता है। इसके बावजूद वर्ष 2023 में समिति ने उत्तरकाशी से गंगोत्री के बीच सड़क चौड़ीकरण को लेकर एक वैज्ञानिक डीपीआर भी प्रस्तुत की, जिसमें स्पष्ट किया गया कि किस तरह सीमित चौड़ाई के साथ भी सुरक्षित और टिकाऊ सड़क बनाई जा सकती है। इसके बाद भी चौड़ी सड़क पर जोर देना कई सवाल खड़े करता है।
समिति की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया था कि झाला से जांगला के बीच अधिकांश हिस्सों में बिना ज्यादा पेड़ काटे लगभग 70 प्रतिशत सड़क पहले ही बन चुकी है। इसके परिणाम अब सामने हैं, जहां जगह-जगह नए लैंडस्लाइड जोन बन गए हैं। सड़क न तो पहले से अधिक सुरक्षित रही और न ही वास्तव में सुगम हो पाई। कई हादसों में लोगों की जान जा चुकी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि चौड़ी सड़क हमेशा बेहतर समाधान नहीं होती। अब उत्तराखंड विभाग ने झाला से भैरोंघाटी के बीच देवदार के पेड़ों की कटाई को लेकर नया प्रस्ताव रखा है, जिसमें कहा जा रहा है कि 4365 देवदार के पेड़ों को सुरक्षित तरीके से उखाड़ा जाएगा।
डॉ नवीन जोयाल जैसे वरिष्ठ वैज्ञानिक इस दावे को भी बेहद जोखिम भरा मानते हैं। उनका कहना है कि संवेदनशील ढलानों से पेड़ों को उखाड़ते ही वे सक्रिय हो जाते हैं और बड़े भूस्खलन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यह केवल सैद्धांतिक चेतावनी नहीं है, बल्कि इसके उदाहरण उत्तराखंड में पहले ही देखे जा चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासन स्थानीय लोगों को पूरी सच्चाई नहीं बता रहा है। लोगों को सिर्फ यह बताया जा रहा है कि चौड़ी सड़क बनने से ट्रैफिक जाम खत्म होंगे और यात्रा आसान होगी, जबकि इसके संभावित खतरों पर चुप्पी साध ली गई है। आधी-अधूरी जानकारी के कारण स्थानीय समुदाय और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के बीच अनावश्यक टकराव की स्थिति बन रही है।
बार-बार यह तर्क दिया जा रहा है कि यह सड़क सुरक्षा और सेना की जरूरतों के लिए अनिवार्य है, लेकिन इसका सीधा और गंभीर सवाल यह है कि अगर हिमालय ही असुरक्षित हो गया, तो सीमा की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी। हालिया हरियाली आपदा के दौरान लगभग एक महीने तक सेना का चीन से संपर्क बाधित रहना इसका ताजा उदाहरण है। यह स्पष्ट करता है कि अस्थिर पहाड़ और बार-बार होने वाले भूस्खलन सामरिक दृष्टि से भी खतरा पैदा करते हैं। अंततः सवाल सड़क के खिलाफ होने का नहीं है, बल्कि इस बात का है कि क्या विकास के नाम पर हम उस आधार को ही कमजोर कर देंगे, जिस पर पूरा हिमालय और उससे जुड़ी करोड़ों लोगों की सुरक्षा टिकी हुई है।



