हरिद्वार। तीर्थनगरी इन दिनों एक ऐसे विडंबना के दौर से गुजर रही है, जहां आस्था की सबसे पवित्र धारा गंगा स्वयं गंदगी के बोझ तले कराह रही है। लोकनाथ घाट, जो कभी श्रद्धा और शुद्धता का प्रतीक माना जाता था, अब गंगा की पवित्रता पर सबसे बड़ा सवाल बन चुका है। इस घाट से होकर एक नाले के ज़रिए लगातार गंदा पानी गंगा में समा रहा है, जिससे पूरे क्षेत्र में सड़ांध और प्रदूषण फैल गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह पानी किसी साधारण नाले का नहीं बल्कि एक बड़े होटल निर्माण स्थल का है, जहां निर्माण कार्य के दौरान निकला अंडरग्राउंड पानी सीधे नाले में बहा दिया जा रहा है। नतीजा यह कि श्रद्धालु जिस जल को पवित्र मानकर स्नान करते हैं, वह अब जहरीले कचरे से भर चुका है।
इसी गंभीर मामले पर अधिशासी अभियंता (गंगा) हरीश बंसल ने “ऑल न्यूज़ भारत” से बातचीत में साफ चेतावनी दी है कि “अब नहीं चलेगी मनमानी।” उन्होंने बताया कि होटल ठेकेदार को बार-बार निर्देश दिए गए हैं कि निर्माण स्थल का पानी खुले नाले में ना छोड़ा जाए बल्कि पाइपलाइन से सुरक्षित निकासी सुनिश्चित की जाए। हरीश बंसल ने कहा कि अब नोटिस जारी कर दिया गया है और यदि ठेकेदार ने चेतावनी के बावजूद गंदा पानी नाले में बहाना जारी रखा, तो गंगा प्रदूषण अधिनियम के तहत सीधी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उनके अनुसार यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि गंगा की पवित्रता के साथ खुला अपराध है, जिसे अब किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

लोकनाथ घाट से बहता यह नाला अब गंगा की धारा में एक ‘छोटी गंदी नदी’ के रूप में जुड़ चुका है। इस नाले से निकलने वाला दूषित पानी शमशान घाट, जयराम आश्रम और फिर हर की पौड़ी के ब्रह्मकुंड तक पहुंच रहा है, जहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु पवित्र स्नान करते हैं। भक्ति और शुद्धता की उस डुबकी के साथ लोग अनजाने में गंदे पानी के संपर्क में आ रहे हैं, जो न केवल आस्था का अपमान है बल्कि जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा भी बन चुका है। यह दृश्य इस बात का साक्षी है कि हरिद्वार की प्रशासनिक मशीनरी ने पवित्र गंगा को बचाने की जिम्मेदारी से जैसे मुंह मोड़ लिया है।
भूपतवाला क्षेत्र के समाजसेवियों ने इस प्रदूषण पर कड़ा रोष व्यक्त करते हुए साफ कहा है कि यदि प्रशासन ने अब भी कार्रवाई नहीं की, तो वे न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे। समाजसेवी विपिन शर्मा सहित कई स्थानीय नागरिकों ने चेताया है कि “गंगा की धाराओं में मुकदमा” दायर किया जाएगा, ताकि जिम्मेदारों को सजा मिले। उनका कहना है कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि हमारी माँ हैं, और माँ के अपमान को कोई भी सच्चा भक्त सहन नहीं करेगा। समाजसेवियों का यह स्वर इस बात का संकेत है कि जनता अब चुप नहीं रहेगी, बल्कि गंगा की रक्षा को आंदोलन का रूप देगी।

हरिद्वार में यह घटना कोई पहली नहीं है। इससे पहले भी अनेक बार चेतावनियाँ दी गईं, बैठकें हुईं, लेकिन नाले अब भी गंगा की गोद में गिरते हैं और प्रशासन हर बार किसी नए बहाने के साथ खुद को बचा लेता है। नगर निगम की निष्क्रियता और विभागीय ढिलाई ने गंगा की धाराओं को नालों में तब्दील कर दिया है। अब यह प्रश्न उठ रहा है कि आखिर कब तक शासन-प्रशासन आंखें मूंदे रहेगा और गंगा के नाम पर इस प्रदूषण का व्यापार चलता रहेगा। क्या यह वही गंगा है, जिसके नाम पर स्वच्छता मिशन और अरबों रुपये खर्च किए गए थे?
गंगा की लहरें मानो आज स्वयं पुकार रही हैं – “मुझे नाला मत बनाओ।” यह केवल एक नदी की नहीं, बल्कि पूरी भारतीय सभ्यता की पुकार है। जब गंगा का जल गंदगी से भरा होता है, तब वह सिर्फ पानी नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, हमारी आस्था और हमारी पहचान की आत्मा को अपवित्र करता है। लोकनाथ घाट का यह दृश्य केवल एक स्थान की त्रासदी नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है कि अगर हमने अब भी आंखें नहीं खोलीं, तो आने वाली पीढ़ियों को गंगा नहीं, सिर्फ गंदा पानी विरासत में मिलेगा। गंगा हमारी जीवनरेखा हैं, और अब समय है कि हम उन्हें बचाने के लिए केवल बातें नहीं, ठोस कदम उठाएं। प्रशासन से लेकर आम नागरिक तक, हर किसी को यह समझना होगा कि गंगा का अपमान हमारे अस्तित्व का अपमान है। हरिद्वार से उठती यह सड़ांध अब सिर्फ एक घाट की कहानी नहीं रही, यह पूरे देश के विवेक की परीक्षा बन गई है।



