काशीपुर। राधे हरि महाविद्यालय सोमवार की सुबह अचानक सुर्खियों में आ गया, जब परिसर के भीतर पहुंचते ही विद्यार्थियों ने देखा कि मुख्य द्वार पर ताले लटक चुके हैं और छात्र नेता मौके पर खड़े होकर कड़े तेवर दिखा रहे हैं। वातावरण में तनाव ऐसा था कि दूर से ही माहौल गंभीर नज़र आ रहा था। छात्र संघ के प्रतिनिधियों ने यह कदम उस समय उठाया जब मात्र एक दिन बाद दो दिसंबर से विश्वविद्यालय की सेमेस्टर परीक्षाएं प्रस्तावित हैं, परंतु अब भी थर्ड और फिफ्थ सेमेस्टर के करीब 350 से 500 छात्र ऐसे हैं जिनकी परीक्षा आवेदन प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। आरोप है कि दो अलग-अलग अवसर मिलने के बावजूद अनेक विद्यार्थी फॉर्म भरने से वंचित रह गए और यदि परीक्षा नियत तिथि पर होती है तो लगभग 1000 छात्रों का भविष्य अधर में लटक सकता है। इस आशंका के चलते छात्र संघ ने महाविद्यालय प्रबंधन पर गंभीर लापरवाही का ठीकरा फोड़ते हुए कहा कि छात्रों को अनदेखा कर कोई भी परीक्षा आयोजित नहीं होने दी जाएगी।
इसी उथल-पुथल के बीच महाविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष जतिन शर्मा ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि कई सप्ताह पहले उन्होंने महाविद्यालय की प्राचार्य और प्रशासनिक स्टाफ को स्पष्ट रूप से अवगत करा दिया था कि बड़ी संख्या में विद्यार्थी अब भी फॉर्म नहीं भर पाए हैं, परंतु इसके बावजूद कोई ठोस पहल नहीं की गई। जतिन शर्मा ने कहा कि थर्ड और फिफ्थ सेमेस्टर के कई छात्र न केवल फॉर्म भरने से वंचित हैं, बल्कि ऐसे भी अनेक विद्यार्थी हैं जिनकी एडमिशन फीस तक अभी बकाया है। उनका कहना था कि हर छात्र आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होता और अचानक फीस जमा कर पाना सभी के लिए संभव नहीं। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्होंने स्वयं अपने स्तर पर 45 छात्रों की फीस जमा कराकर उनके भविष्य को बचाया है, और निर्धन छात्रों की सहायता के लिए महाविद्यालय में मौजूद संस्था भी इस बार पूरी तरह उदासीन दिखाई दे रही है।
घटनास्थल पर जुटे छात्रों ने कॉलेज परिसर की बदहाली भी कैमरे के सामने खुलकर दिखायी। जतिन शर्मा ने कैमरा घुमाते हुए कहा कि महाविद्यालय प्रशासन छात्रों की सुविधाओं को लेकर दावा तो बहुत करता है लेकिन जमीन पर स्थिति बिल्कुल विपरीत है। लड़कों का शौचालय और प्रसाधन कक्ष महीनों से खराब है, जहां पानी की सप्लाई तक ठीक नहीं और बदबू के साथ कीड़ों का जमावड़ा बना रहता है। बाहर लगे पानी का कूलर की हालत तो और भी भयावह बताई गई, जिसके भीतर से छिपकलियां निकलने तक की बातें सामने आईं। छात्रों का कहना था कि जिस जगह से स्वच्छ पानी मिलना चाहिए, वह खुद संक्रमित दिखाई दे रहा है। ऐसे प्रबंध में पढ़ने आने वाले छात्र को वे “विद्यालय का पागल” कहकर व्यंग्य करने लगे, जिससे छात्रों का आक्रोश साफ झलकता था।
जतिन शर्मा ने आगे कहा कि उन्होंने कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति, परीक्षा नियंत्रण अधिकारी और महाविद्यालय की प्राचार्य को लिखित रूप से अवगत करा दिया है कि यदि एक भी छात्र परीक्षा से बाहर हुआ तो उसकी जिम्मेदारी पूर्णत: विश्वविद्यालय और महाविद्यालय प्रशासन की होगी। उन्होंने बताया कि 20 तारीख के अगले दिन, यानी 31 तारीख, को ही वह प्राचार्य को चेतावनी दे चुके थे कि बड़ी संख्या में छात्र फॉर्म नहीं भर पाए हैं, मगर मामला टालमटोल में डाल दिया गया। संघ अध्यक्ष के अनुसार, यही लापरवाही आज की तालाबंदी का कारण बनी है। उनका कहना था कि परिसर में चल रही परीक्षा से जुड़े विभाग को छात्रों ने नहीं छुआ, ताकि पहले से तय अकादमिक प्रक्रिया बाधित न हो, लेकिन मुख्य भवन को तब तक नहीं खोला जाएगा जब तक सभी छात्रों के फॉर्म स्वीकार करने का स्पष्ट मार्ग न निकले।
इसी दौरान जतिन शर्मा ने वह पत्र भी दिखाया, जिस पर हस्ताक्षर कर उन्होंने महाविद्यालय प्रशासन को सूचित किया था कि यदि छात्रों के मुद्दे अनदेखे रहे तो आंदोलन को उग्र रूप दिया जाएगा। पत्र में यह भी उल्लेख था कि छात्र संघ किसी भी परिस्थिति में विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं होने देगा और यदि आवश्यकता पड़ी तो प्रदर्शन को और तेज किया जाएगा। उनका कहना था कि यह कदम प्रशासन के लिए चेतावनी है, ताकि वे किसी भी सुविधा या प्रक्रिया में कमी को नज़रअंदाज़ न करें। तालाबंदी रोककर परिसर खोलने की अनुमति तभी दी जाएगी, जब सभी विद्यार्थियों को परीक्षा फॉर्म भरने का अंतिम अवसर उपलब्ध कराया जाएगा और उनकी समस्याओं का समाधान सुनिश्चित किया जाएगा।
मामले का सबसे तीखा पक्ष तब सामने आया जब जतिन शर्मा ने कहा कि दो दिन पहले प्रशासन की ओर से उन्हें यह कहते हुए अपमानित करने की कोशिश की गई कि वह “सिर्फ छात्र नेता हैं, अध्यापकों के प्रतिनिधि नहीं।” इस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कैमरे पर ही चेतावनी दी कि वह केवल छात्र हित में लड़ते हैं और यदि किसी ने महाविद्यालय के किसी छात्र-छात्रा पर उंगली भी उठाई तो वह उसका “इलाज कर देंगे।” उनके इस बयान ने माहौल को और भी तनावपूर्ण बना दिया, हालांकि उन्होंने साफ कहा कि किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी वह नहीं बल्कि महाविद्यालय प्रशासन ही वहन करेगा, क्योंकि छात्रों को मजबूर होकर आंदोलन की राह चुननी पड़ी है।
काशीपुर का यह मामला अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का केंद्र बन चुका है। विद्यार्थियों का आरोप है कि महाविद्यालय न केवल अकादमिक प्रबंधन में कमजोर साबित हो रहा है, बल्कि बुनियादी सुविधाओं से लेकर फॉर्म भरने जैसी आवश्यक प्रक्रिया तक को लेकर पूर्णत: उदासीन दिखाई दे रहा है। दूसरी ओर, छात्र संघ यह वादा कर रहा है कि जब तक हर विद्यार्थी को परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं मिलेगा, तब तक आंदोलन समाप्त नहीं होगा। अब निगाहें महाविद्यालय प्रबंधन और विश्वविद्यालय प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं, क्योंकि कुछ ही घंटों में परीक्षा शुरू होनी है और सैकड़ों छात्रों का भविष्य इसी निर्णय पर निर्भर करता है।
महाविद्यालय प्रभारी प्राचार्य डॉ. अनुराग अग्रवाल ने मीडिया से बातचीत में स्पष्ट किया कि परीक्षा फॉर्म भरने में पीछे रह गए विद्यार्थियों की स्थिति उतनी बड़ी नहीं है जितनी प्रस्तुत की जा रही है। उन्होंने बताया कि कुमाऊँ विश्वविद्यालय ने पोर्टल कई बार खोला, अंतिम तिथि भी बार–बार बढ़ाई गई, यहाँ तक कि विलंब शुल्क भी वापस ले लिया गया, ताकि प्रत्येक छात्र को पूरा अवसर मिल सके। बावजूद इसके, कुछ छात्रों ने अपनी इच्छा या लापरवाही के कारण फॉर्म जमा नहीं किया। डॉ. अग्रवाल ने कहा कि महाविद्यालय में वर्तमान में 7000 से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं और पोर्टल से प्राप्त आँकड़ों के अनुसार केवल तीन से चार प्रतिशत छात्र ही ऐसे हैं जिनके फॉर्म अब तक लंबित हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इनमें भी कई छात्र संभवतः उपस्थित नहीं थे, किसी व्यक्तिगत कठिनाई में थे, या उन्हें तकनीकी जानकारी सही समय पर नहीं मिल सकी।
डॉ. अग्रवाल ने ऑनलाइन प्रणाली के लाभों को रेखांकित करते हुए कहा कि सरकार की नई डिजिटल व्यवस्था ने छात्रों को अभूतपूर्व सुविधा दी है—जहाँ पहले 10 बजे से 4 बजे के बीच ही फॉर्म भरने का मौका मिलता था, वहीं अब छात्र रात 12 बजे या 2 बजे तक भी अपने फॉर्म भर सकते हैं। पोर्टल 24 घंटे उपलब्ध रहता है, जिसमें छात्र जितनी बार चाहें लॉग-इन कर सकते हैं और फॉर्म भर सकते हैं। पूर्व की मैनुअल पद्धति की तुलना में यह प्रक्रिया कई गुना सरल और सुविधाजनक है। प्रभारी प्राचार्य ने कहा कि यदि कुछ ‘कतिपय छात्र’ इस व्यापक सुविधा का उपयोग नहीं कर पाए, तो उसके कारणों की खोज उन्हें खुद करनी होगी, क्योंकि विश्वविद्यालय और महाविद्यालय—दोनों ने अपनी ओर से प्रक्रिया को हर स्तर पर सुगम और सुलभ बनाया है।



