उत्तराखंड(सुनील कोठारी)।। हिमालय की ऊँचाइयों में फैली शांत हवा इन दिनों कुछ और ही कहानी सुनाने लगी है। यह सिर्फ बर्फ से ढकी चोटियों की फुसफुसाहट नहीं, बल्कि एक ऐसी चेतावनी है जो धीरे-धीरे पूरे उत्तराखंड के माथे पर चिंता की रेखाएँ गहरी करती जा रही है। केदारनाथ, जिसे हिन्दू आस्था का सर्वोच्च धाम माना जाता है, आज बढ़ते प्लास्टिक कचरे के बोझ तले कराह रहा है। यह वह स्थान है जहाँ पहुँचने को लोग तपस्या मानते हैं, लेकिन अब उसी दिव्यता के बीच एक नई लड़ाई शुरू हो चुकी है—प्रकृति को बचाने की जद्दोजहद की लड़ाई। तीर्थयात्रा की संख्या हर साल रिकॉर्ड तोड़ रही है, श्रद्धा का सैलाब चोटी पर है, लेकिन इसके साथ ऐसी गैर-जिम्मेदारी भी बढ़ी है जिसने इस पवित्र धाम की नाज़ुक पर्यावरणीय संरचना को संकट में डाल दिया है। श्रद्धालु प्लास्टिक की थैलियाँ, बोतलें और पैकेट लेकर आते हैं और रास्ते भर इन्हें कहीं भी फेंक कर आगे बढ़ जाते हैं, जिससे आसपास प्लास्टिक की परतें जमने लगी हैं। यह समस्या अब केवल दृश्य गंदगी नहीं रही, बल्कि वैज्ञानिकों के अनुसार एक बड़े पर्यावरणीय खतरे की शुरुआती दस्तक है।
गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के प्रोफेसर एम.एस. नेगी ने साफ शब्दों में चेताया है कि 2013 की त्रासदी को भूल जाना स्वयं को संकट के सुपुर्द करने जैसा है। उन्होंने बताया कि जिस तेजी से प्लास्टिक कचरा जमा हो रहा है, वह जलस्रोतों में रुकावट, मिट्टी की नमी में असंतुलन और भूस्खलन की संभावना को बढ़ा रहा है। केदारनाथ के आसपास के क्षेत्रों में औषधीय पौधों की कई दुर्लभ प्रजातियाँ पहले ही विलुप्ति की कगार पर पहुँच चुकी हैं। यदि यह प्रक्रिया ऐसे ही जारी रही तो हिमालयी पारिस्थितिकी की रीढ़ टूटने में देर नहीं लगेगी। तीर्थयात्रियों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि का सीधा असर कचरे की मात्रा पर देखने को मिल रहा है, जो पिछले वर्षों की तुलना में दोगुनी गति से इकट्ठा हुआ है। प्राकृतिक वनस्पतियों और हिमालय के संवेदनशील इलाके पर इसका गंभीर असर है। शोधकर्ताओं का कहना है कि प्लास्टिक मिट्टी में नमी को खत्म कर रही है, जिससे क्षेत्रीय जैव विविधता खतरे में पड़ गई है।
कहानी का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा उन आँकड़ों से सामने आता है जो एक आरटीआई के माध्यम से उजागर हुए हैं। नोएडा के पर्यावरण कार्यकर्ता अमित गुप्ता द्वारा दायर इस आरटीआई में खुलासा हुआ कि केदारनाथ धाम के पास मौजूद गड्ढों में लगातार कचरा दबाया जा रहा है। हिमालय के ऊपरी इलाकों में जहां जमीन बर्फीली होती है और ढलान बेहद नाज़ुक, वहाँ कचरे को दफनाना पर्यावरणीय अपराध जैसा है। इन बर्फीले क्षेत्रों में दफन प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट धीरे-धीरे पिघलते ग्लेशियरों के साथ नीचे की तरफ बहकर जलस्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं। यह दीर्घकालिक खतरा है जिसकी मार आने वाले वर्षों में पीढ़ियाँ झेल सकती हैं। आरटीआई के अनुसार वर्ष 2023 में 18.48 टन कचरा जमा हुआ, जबकि 2024 में भी 17.50 टन से अधिक कचरा इकट्ठा हुआ। साथ ही 23.30 नॉन-बायोडिग्रेडेबल वेस्ट भी इस दौरान पैदा हुआ। नगर पंचायत के अनुसार इस कचरे को रीसाइकिल करने का दावा किया गया था, लेकिन अमित गुप्ता का कहना है कि आँकड़े स्पष्ट बताते हैं कि वास्तविकता बिलकुल उलट है। दोनों कचरा गड्ढे लगभग भर चुके हैं और न कोई प्रभावी कार्रवाई हुई, न कोई मॉनिटरिंग, न किसी पर जुर्माना। उनकी शिकायतों पर प्रशासन ने आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
इस खुलासे का सबसे भयावह हिस्सा तब सामने आया जब पता चला कि केदारनाथ में अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र (STP) तक मौजूद नहीं है। इसका अर्थ है कि धाम के आसपास पैदा होने वाला गंदा पानी, नहाने-धोने का अपशिष्ट और प्लास्टिक के अवशेष सीधे मंदाकिनी नदी में बह रहे हैं। यह वही नदी है जो आगे चलकर अलकनंदा में मिलती है और फिर गंगा का रूप ले लेती है। यानी केदारनाथ का असंगठित कचरा प्रबंधन पूरे उत्तर भारत के करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़े नदी तंत्र को प्रदूषित कर रहा है। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने इस पर चिंता जताते हुए रुद्रप्रयाग प्रशासन को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए थे, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी जमीनी स्तर पर स्थितियों में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम मन की बात में केदारनाथ में बढ़ते कचरे पर गहरी चिंता जताई थी। उन्होंने प्लास्टिक के प्रयोग को कम करने, जिम्मेदार यात्रा संस्कृति अपनाने और सफाई व्यवस्था को मजबूत करने की खुली अपील की थी। मगर एक साल बीत जाने के बाद भी जमीनी स्तर पर स्थितियाँ बदलती नजर नहीं आतीं। न तो कचरा नीचे लाने की व्यवस्था में कोई ठोस सुधार हुआ, न प्लास्टिक पर वह सख्त रोक लग पाई जिसकी उम्मीद थी, और न सफाई प्रबंधन को लेकर दंडात्मक नियम प्रभावी हो सके। हालात यह हैं कि शीर्ष नेतृत्व से लेकर स्थानीय प्रशासन तक इस मुद्दे पर चर्चा जरूर होती रही है, लेकिन वास्तविक कार्रवाई कहीं दिखाई नहीं देती। परिणामस्वरूप केदारनाथ की पवित्र धरती अब भी प्लास्टिक और कचरे की बढ़ती मार झेल रही है, जो आगे चलकर एक गंभीर पर्यावरणीय संकट का रूप ले सकती है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही खड़ा होता है कि क्या हम 12,000 फीट की ऊँचाई पर बसे इस पवित्र धाम को अपनी लापरवाही से कचरे के विशाल डंपिंग ज़ोन में बदलते देख रहे हैं? क्या 2013 की विनाशकारी बाढ़ और उस भयावह त्रासदी की यादें इतनी जल्दी धुंधली हो गई हैं कि हम उसी गलती को फिर अपनी आँखों के सामने दोहराने की कगार पर पहुँच गए हैं? हिमालय की पर्यावरणीय बनावट अत्यंत संवेदनशील है, जहाँ छोटी-सी मानवजनित चूक भी बड़े भू-वैज्ञानिक खतरे का कारण बन सकती है। ऐसी ऊँचाइयों पर प्लास्टिक, ठोस कचरा और अव्यवस्थित पर्यटन न सिर्फ मिट्टी की स्थिरता को कमजोर करते हैं, बल्कि जलस्रोतों, वनस्पतियों और ग्लेशियरों के प्राकृतिक संतुलन को भी तोड़ देते हैं। केदारनाथ में बढ़ रहा प्लास्टिक ठीक उसी तरह के खतरनाक बीज बो रहा है, जो आने वाले वर्षों में आपदा, भूस्खलन और जल प्रदूषण के रूप में पनप सकता है। यह समय है कि हम सच स्वीकारें और कार्रवाई करें। यह भी सोचने वाली बात है कि तीर्थयात्रियों में बढ़ती संख्या आस्था का प्रतीक है, लेकिन क्या श्रद्धा के नाम पर ज़िम्मेदारी भूल जाना उचित है? क्या यात्रियों से प्रवेश पर कचरा जमा शुल्क लिया जाना चाहिए जिसे वापसी पर साफ-सुथरा कचरा जमा करने के बाद ही वापस किया जाए? क्या केदारनाथ में तत्काल प्रभाव से STP, आधुनिक वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम और प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लागू नहीं होना चाहिए? प्रशासन, नगर पंचायत और धाम की व्यवस्था से जुड़े विभागों पर कार्रवाई क्यों न की जाए, जब गड्ढों में कचरा दफनाने जैसी लापरवाही को खुली छूट दी गई?
केदारनाथ केवल पूजा और आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि प्रकृति की ओर से दी गई एक गंभीर चेतावनी भी है कि यदि हम उसके नियमों की अवहेलना करते हैं, तो उसका प्रतिकार कई गुना बढ़कर सामने आता है। हिमालय की यह पवित्र धरा हमें बार-बार संकेत दे रही है कि अनियंत्रित पर्यटन, बढ़ता प्लास्टिक और लापरवाह व्यवहार भविष्य में भयावह संकट का कारण बन सकता है। ऐसे में क्या श्रद्धालु होने के नाते यह हमारी मूल ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि हम अपने द्वारा पैदा किया गया कचरा खुद नीचे लाएँ और इस पवित्र धाम को बोझिल होने से बचाएँ? क्या हम यह नहीं समझते कि हिमालय की नाज़ुक पारिस्थितिकी किसी भी तरह के प्रदूषण को सहने में सक्षम नहीं है? और क्या यह उचित नहीं कि हर यात्री, हर संस्था और हर प्रशासनिक इकाई मिलकर यह संकल्प ले कि केदारनाथ को स्वच्छ, सुरक्षित और संरक्षित रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है? आज आवश्यकता पहले से अधिक है कि हम इस आस्था-स्थल को केवल दर्शन का स्थल न मानकर, पृथ्वी के एक अत्यंत संवेदनशील पर्यावरण क्षेत्र के रूप में भी देखें और उसके संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाएँ।
प्रकृति की सुरक्षा केवल सरकार, प्रशासन या किसी एक संस्था का दायित्व नहीं है, बल्कि यह उन सभी लोगों की साझा जिम्मेदारी है जो केदारनाथ की पवित्रता और हिमालय की महानता को अपने जीवन में विशेष स्थान देते हैं। तीर्थयात्री हों, स्थानीय नागरिक हों या पर्यावरण के प्रति सजग लोग—सभी को यह समझना होगा कि यदि हम प्राकृतिक धरोहर को बचाने के लिए आगे नहीं आए, तो आने वाली पीढ़ियाँ इसकी कीमत चुकाएँगी। हिमालय सदियों से हमारी रक्षा करता आया है—कभी बर्फ की ढाल बनकर, कभी शुद्ध जल का स्रोत बनकर, तो कभी हरे जंगलों की छाया के रूप में। अब समय आ गया है कि हम इस संरक्षण के ऋण को उतारें और उसके प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएँ। यदि हम आज से ही जागरूक होकर कदम उठाएँ, कचरे को नियंत्रित करें और पर्यावरण का सम्मान करें, तभी हम इस महान पर्वतीय विरासत को भविष्य के लिए सुरक्षित रख पाएँगे।



