हरिद्वार(सुनील कोठारी)। कुंभ मेला 2027 की तैयारियों के नाम पर गंगा किनारे हो रहे निर्माण कार्यों की असली स्थिति अब लोगों के सामने खुलकर आई है। सिंचाई विभाग द्वारा दशहरे से दीपावली तक गंगनहर किनारे बनाए जा रहे स्नान घाटों के बेसमेंट में दरारें पड़ने लगी हैं और कुछ हिस्से गिरने लगे हैं। यह वही घाट हैं जिनके निर्माण में करोड़ों रुपये खर्च किए गए और अधिकारियों ने दावा किया था कि इसमें “एडवांस टेक्नोलॉजी” का इस्तेमाल किया गया है। लेकिन साइट पर मिली तस्वीरें और वास्तविक हालात कुछ और ही बयान कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जिन घाटों को सुरक्षित और टिकाऊ बताया गया, उनकी नींव इतनी कमजोर निकली कि एक सीजन भी ये संरचनाएं पूरी तरह नहीं झेल पाएंगी। करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी श्रद्धालुओं की जान को खतरा पैदा हो गया है और प्रशासन के दावों पर सवाल उठ रहे हैं।
स्नान घाटों के बेसमेंट में मसाला सरियों से छूटकर गिर रहा है और जहां श्रद्धालुओं को सुरक्षित स्नान करना था, वहां अब टूटी-फूटी संरचनाएं दिखाई दे रही हैं। इंजीनियरिंग विशेषज्ञों का कहना है कि घाटों की नींव में दरारें पड़ना और सरिया का उखड़ना इस बात की ओर इशारा करता है कि निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया या काम को पर्याप्त समय नहीं मिला। सवाल यह उठता है कि अगर यही हाल रहा, तो कुंभ मेला 2027 में श्रद्धालु अधूरे और कमजोर घाटों पर कैसे स्नान करेंगे? क्या यह निर्माण कार्य वास्तव में कुंभ की तैयारी है या करोड़ों रुपये की लागत के बावजूद भ्रष्टाचार और लापरवाही की नींव रखी जा रही है?

दीपावली की रात 12 बजे गंगा नहर में जल प्रवाह बढ़ा दिया गया, जिससे शहर में रौनक लौट आई। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह जल प्रवाह कमजोर घाटों के लिए खतरा बन सकता है। जैसे ही पानी की मात्रा बढ़ेगी, नदी किनारे कटान शुरू हो जाएगा और घाट बह सकते हैं। करोड़ों खर्च होने के बावजूद घाटों की उम्र एक ही सीजन में पूरी नहीं होने की संभावना है। क्या ऐसे निर्माण में श्रद्धालुओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है या केवल दिखावा किया जा रहा है? क्या घाटों के गिरने की स्थिति में प्रशासन जिम्मेदारी उठाएगा?
स्थानीय लोगों और समाजसेवियों ने सवाल उठाए हैं कि अगर इसी तरह काम चलता रहा तो क्या गंगा को दोबारा सुखाना पड़ेगा, या फिर कुंभ मेला 2027 में श्रद्धालु अधूरे और टूटी हुई संरचनाओं पर स्नान करेंगे? लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है और गंगा के पवित्र जल में डुबकी लेने वाले लोग गंभीर जोखिम में होंगे। क्या अधिकारियों ने श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कदम उठाए हैं? क्या घाटों की गुणवत्ता जांचने और उन्हें मजबूत बनाने के लिए समय रहते सुधार किए जाएंगे?

सिंचाई विभाग के अधिकारी पहले दावा कर चुके थे कि निर्माण में नवीन तकनीक का इस्तेमाल किया गया और “कुछ नहीं होगा।” लेकिन साइट पर तस्वीरें और वास्तविक हालात इस दावे को पूरी तरह झुठला रहे हैं। बेसमेंट में दरारें, सरिया उखड़ना और मसाला टूटना यह साफ दर्शाता है कि या तो घटिया सामग्री लगाई गई या काम को पर्याप्त समय नहीं मिला। क्या यह तकनीकी नवाचार वास्तव में प्रभावी है या सिर्फ दिखावा? क्या अधिकारियों की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय होगी, या फिर हर बार की तरह फाइलों में लीपापोती कर मामले को दबा दिया जाएगा?
स्थानीय इंजीनियरिंग विशेषज्ञों का कहना है कि घाटों की नींव कमजोर होने के कारण ये संरचनाएं भारी भार नहीं झेल पाएंगी। क्या करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी श्रद्धालुओं की जान खतरे में डालना उचित है? क्या कुंभ मेला 2027 के नाम पर हो रहे यह निर्माण कार्य धार्मिक भावनाओं का मज़ाक है? क्या भ्रष्टाचार और लापरवाही की जड़ें इतनी गहरी हैं कि प्रशासन की निगरानी के बावजूद निर्माण कार्य असुरक्षित बना दिया गया?

सवाल यह भी उठता है कि क्या ठेकेदार और संबंधित अधिकारी अपने काम में ईमानदार रहे या केवल समय पूरा करने के लिए घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया गया? क्या कुंभ मेला 2027 के आयोजन तक घाटों को सुरक्षित और मजबूत किया जाएगा, या फिर यह एक बार फिर श्रद्धालुओं की जान पर जोखिम डालने वाला साबित होगा? क्या घाटों की मरम्मत और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कार्रवाई होगी?
स्थानीय लोगों का कहना है कि गंगा की पवित्र धारा के नाम पर धन की बर्बादी और भ्रष्टाचार अब साफ दिख रहा है। क्या प्रशासन और सिंचाई विभाग इस मामले में जवाबदेही निभाएंगे? क्या कुंभ मेला 2027 के नाम पर करोड़ों रुपये का यह खर्च वास्तव में विकास का प्रतीक है या भ्रष्टाचार का संगम? क्या घाटों की नींव मजबूत करके श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी या फिर यह सिर्फ दिखावा साबित होगा?
गंगा की आवाज़ मानो कह रही हो कृ “नींव ईमान की रखो, तभी घाट टिकेंगे।” जो लोग गंगा के नाम पर धन की बर्बादी कर रहे हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि आस्था और जीवन की सुरक्षा दोनों जुड़ी हैं। क्या अधिकारियों ने इस बात को गंभीरता से लिया है? क्या श्रद्धालुओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी या फिर यह मामला भी फाइलों की लीपापोती में दब जाएगा? क्या कुंभ मेला 2027 से पहले घाटों की मरम्मत और मजबूती सुनिश्चित की जाएगी?

इस पूरे मामले में कई प्रश्न खड़े हो रहे हैंरू क्या घाटों की नींव मजबूत है? क्या श्रद्धालुओं की सुरक्षा को खतरा है? क्या भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं? क्या ठेकेदार ईमानदार हैं? क्या प्रशासन समय रहते कार्रवाई करेगा? क्या कुंभ मेला 2027 सुरक्षित रहेगा? क्या निर्माण सामग्री सही और टिकाऊ है? क्या फोटो और रिपोर्ट में दिखाई दे रही स्थिति पर ध्यान दिया गया? क्या गंगा का पवित्र जल सुरक्षित रहेगा? क्या धार्मिक भावनाओं का सम्मान किया जाएगा?
हरिद्वार में कुंभ मेला 2027 की तैयारियों के नाम पर हो रहे निर्माण कार्य अब केवल एक मेला नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और लापरवाही की पोल खोल रहे हैं। श्रद्धालुओं की जान और गंगा की पवित्रता पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। प्रशासन को अब स्पष्ट निर्णय लेना होगा कि कुंभ से पहले घाटों को सुरक्षित किया जाए या फिर यह भ्रष्टाचार की धारा में बहकर श्रद्धालुओं की आस्था और जीवन को खतरे में डाल दे।



