काशीपुर। लगातार बढ़ते असंतोष और गहराते संकट के बीच काशीपुर में किसानों का आंदोलन तीसरे दिन भी पूरे उबाल पर नजर आया, जहां सहकारी क्रय विक्रय समिति लिमिटेड के बाहर बीते लगभग पचास घंटों से डटे किसान अपनी मांगों को लेकर अडिग दिखाई दिए। समय के साथ यह धरना केवल एक स्थानीय विरोध नहीं, बल्कि किसानों की आर्थिक पीड़ा, प्रशासनिक उदासीनता और व्यवस्था पर उठते सवालों का प्रतीक बनता चला गया। आंदोलनरत किसानों का कहना है कि उन्होंने सरकार की तय प्रक्रिया के तहत अपना धान समय पर दिया, लेकिन महीनों बाद भी भुगतान नहीं मिलना उनके लिए असहनीय हो गया है। घरों में खर्च चलाना मुश्किल हो गया है, कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है और पारिवारिक जिम्मेदारियों ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया है। ऐसे में यह धरना उनके लिए आखिरी विकल्प बनकर सामने आया है, क्योंकि कई बार शिकायत और अनुरोध करने के बाद भी समाधान की कोई ठोस दिशा दिखाई नहीं दी।
तीसरे दिन की सुबह से ही धरनास्थल पर हलचल तेज रही, जब राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर की मौजूदगी ने किसानों में एक बार फिर उम्मीद जगाई। काशीपुर विधायक त्रिलोक सिंह चीमा और पूर्व विधायक हरभजन सिंह चीमा किसानों से बातचीत के लिए मौके पर पहुंचे। उनके साथ प्रशासनिक अधिकारी भी उपस्थित रहे, जिससे यह संकेत मिला कि शायद इस लंबे चले आ रहे विवाद का कोई रास्ता निकलेगा। किसानों ने दोनों जनप्रतिनिधियों को घेरकर अपनी समस्याएं रखीं और बताया कि किस तरह धान बेचने के बाद मिलने वाला पैसा उनके लिए पूरे साल की जीवनरेखा होता है। किसानों ने भावुक होते हुए कहा कि यह रकम न मिलने से उनके बच्चों की पढ़ाई, घर की जरूरतें और खेती की अगली तैयारी तक सब कुछ प्रभावित हो रहा है। वे किसी तरह की रियायत या दान नहीं, बल्कि अपने अधिकार की मांग कर रहे हैं, जिसे अब तक टाल दिया गया है।
धरनास्थल पर मौजूद प्रशासनिक अधिकारियों में आईएफसी की आरएमओ लता मिश्रा, डिप्टी आरएमओ डी सी आर्य और एसएमआई अतुल चतुर्वेदी सहित सोसाइटी के कई अन्य अधिकारी भी शामिल रहे। लगभग एक घंटे से अधिक समय तक चली बातचीत में माहौल कई बार तीखा हो गया और बहस की स्थिति बनती रही। किसानों ने अधिकारियों से सीधे सवाल पूछे कि जब सरकार ने धान खरीद के लिए पर्याप्त बजट जारी किया है, तो फिर भुगतान में देरी क्यों हो रही है। किसानों का आरोप था कि व्यवस्था के भीतर गंभीर खामियां हैं और कहीं न कहीं मिलीभगत या लापरवाही के कारण उनका पैसा अटका हुआ है। हालांकि अधिकारियों ने नियमों और प्रक्रियाओं का हवाला दिया, लेकिन किसान उनके जवाबों से संतुष्ट नजर नहीं आए। बातचीत लंबी जरूर चली, परंतु अंत तक किसी ठोस और स्पष्ट समाधान पर सहमति नहीं बन सकी, जिससे किसानों की नाराजगी और अधिक गहरी हो गई।
वार्ता के बाद आंदोलनरत किसानों के बीच बेचौनी और आक्रोश साफ दिखाई दिया। किसान यूनियन के पदाधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया कि अब केवल बातचीत से काम नहीं चलेगा और आंदोलन को और तेज किया जाएगा। उत्तराखंड युवा भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष जितेन्द्र जितू ने सरकार और प्रशासन पर तीखे सवाल खड़े करते हुए कहा कि यदि सब कुछ पारदर्शी और ईमानदार है, तो धान की तौल और भुगतान में इस तरह की अव्यवस्था क्यों सामने आ रही है। उन्होंने कहा कि काशीपुर कोई बहुत बड़ा इलाका नहीं है और यहां मौजूद सभी क्रय केंद्रों की एसआईटी जांच कुछ ही दिनों में पूरी की जा सकती है। यदि अधिकारी और सरकार साफ नीयत से काम कर रहे हैं, तो एक तय समय-सीमा के भीतर जांच कर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, ताकि दोषियों पर कार्रवाई हो सके और किसानों का विश्वास बहाल हो।
जितेन्द्र जितू ने आगे यह भी आरोप लगाया कि काशीपुर और आसपास के क्षेत्रों में लाखों कुंतल धान की खरीद हुई है, लेकिन उसका सही हिसाब-किताब और निपटान अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। उन्होंने कहा कि किसानों का धान या तो तुरंत तौला जाए और उसका भुगतान किया जाए, या फिर पूरे मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जाए। किसान नेता ने साफ शब्दों में कहा कि किसी भी तरह की कटौती, समझौते या आधे-अधूरे समाधान को किसान स्वीकार नहीं करेंगे। यदि जरूरत पड़ी, तो वे अपने टेंट उठाकर जांच समिति के कार्यालय के सामने भी धरना देने को तैयार हैं। उनका कहना था कि धान खरीद के लिए भेजा गया पैसा किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि देश की जनता के टैक्स का है और उसका सही उपयोग होना चाहिए।
धरनास्थल पर मौजूद किसान नेता ने मीडिया से बातचीत के दौरान अपनी पीड़ा खुलकर बयां की। किसानों का कहना था कि वे बीते कई महीनों से लगातार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिला है। अब आश्वासनों पर भरोसा करना उनके लिए संभव नहीं रह गया है। उन्होंने कहा कि साल का आखिरी समय चल रहा है और कोई भी किसान खुशी से अपने परिवार को छोड़कर सड़क पर बैठना नहीं चाहता, लेकिन हालात ने उन्हें मजबूर कर दिया है। भुगतान न मिलने के कारण वे कर्ज में डूबते जा रहे हैं, साहूकारों का दबाव बढ़ रहा है और घरों की आर्थिक स्थिति दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही है।
आंदोलन के दौरान किसान यूनियन के नेताओं ने यह चेतावनी भी दी कि यदि जल्द ही कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो यह विरोध केवल काशीपुर तक सीमित नहीं रहेगा। उन्होंने कहा कि पूरे कुमाऊं क्षेत्र में धान खरीद से जुड़ी गड़बड़ियों की एसआईटी जांच की मांग को लेकर बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा। किसानों का दावा है कि कुमाऊं मंडल में करीब सत्तर लाख कुंतल धान की खरीद हुई है, जिसकी कीमत हजारों करोड़ रुपये में आंकी जा सकती है। ऐसे में यदि इस प्रक्रिया में कहीं भी घोटाला या अनियमितता हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। किसान नेताओं ने यह भी संकेत दिए कि आने वाले दिनों में सड़कों को जाम करने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं, जिससे प्रशासन पर दबाव बनाया जा सके।
धरने के माहौल को देखते हुए यह भी स्पष्ट किया गया कि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रखा जा रहा है। किसानों ने कहा कि वे किसी तरह की हिंसा या अव्यवस्था नहीं चाहते, बल्कि केवल अपनी मांगों का समाधान चाहते हैं। धरनास्थल पर किसानों के लिए अस्थायी टेंट, भोजन और पानी की व्यवस्थाएं की गई हैं, ताकि वे दिन-रात वहां टिके रह सकें। आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में किसान पहुंच रहे हैं, जिससे आंदोलन का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। किसानों का कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होंगी, वे पीछे हटने वाले नहीं हैं, चाहे इसके लिए उन्हें कितने ही दिन सड़क पर क्यों न बिताने पड़ें।
प्रशासन की ओर से अब तक केवल बातचीत और आश्वासन ही सामने आए हैं, जिससे किसानों का गुस्सा और अधिक बढ़ गया है। किसानों का साफ कहना है कि यदि सरकार और अधिकारी वास्तव में उनकी समस्याओं को लेकर गंभीर हैं, तो उन्हें तुरंत भुगतान की व्यवस्था करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि आज या निकट भविष्य में समाधान नहीं निकलता, तो आंदोलन की अगली रणनीति और अधिक सख्त होगी। किसानों ने दो टूक शब्दों में कहा कि उनके लिए यह स्थिति अब “करो या मरो” जैसी बन चुकी है और वे आधे-अधूरे वादों से संतुष्ट नहीं होंगे।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान यह भी देखा गया कि वर्तमान विधायक त्रिलोक सिंह चीमा और पूर्व विधायक हरभजन सिंह चीमा लगातार किसानों की समस्याओं को समझने का प्रयास करते रहे। दोनों नेताओं ने किसानों से उनकी मुख्य मांगों पर विस्तार से चर्चा की और अधिकारियों से संपर्क में रहकर संभावित समाधान तलाशने की कोशिश की। बातचीत के अंत में वे पत्रकारों से यह कहते हुए रवाना हुए कि पूरे मामले को गंभीरता से समझा गया है और यदि कोई समाधान निकलता है, तो उसकी जानकारी दी जाएगी। फिलहाल पूरे क्षेत्र की निगाहें प्रशासन और सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। यह देखना बाकी है कि किसानों की आवाज को समय रहते सुना जाएगा या फिर यह आंदोलन और अधिक उग्र रूप धारण करेगा। लगातार तीसरे दिन भी धरने पर डटे किसानों का बढ़ता आक्रोश यह संकेत दे रहा है कि यदि जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो हालात और भी चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।



