- काशीपुर में आर्चरी का उभरता केंद्र बच्चों को मानसिक और शारीरिक मजबूती प्रदान करता
- बच्चों की तीरंदाजी से बढ़ी एकाग्रता और आत्मविश्वास ने भविष्य की राह आसान बनाई
- आर्मी रिटायर्ड मेजर हेमचंद्र हरबोला के नेतृत्व में कुमाऊँ क्षेत्र में आर्चरी का विकास
- दौणासागर तालाब के किनारे आर्चरी सीखते बच्चों ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर हासिल किए पदक
- माता-पिता का समर्थन और केडीएफ का सहयोग बच्चों को खेल और करियर दोनों में आगे बढ़ाता
काशीपुर। द्रोणासागर की पवित्र धरती पर इन दिनों ऐसा नज़ारा देखने को मिल रहा है जिसने पूरे शहर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। गुरु द्रोणाचार्य की शस्त्र-विद्या परंपरा से जुड़े इस ऐतिहासिक स्थल पर आधुनिक जमाने की तीरंदाजी ने जैसे नई जान फूंक दी हो। जहाँ पहले बच्चे क्रिकेट या फुटबॉल के पीछे दौड़ते दिखाई देते थे, वहीं अब तीर-कमान थामे नन्हें खिलाड़ी अद्भुत एकाग्रता के साथ निशानों को भेदने का अभ्यास करते दिख जाते हैं। इस अनोखी शुरुआत को दिशा दी है काशीपुर डेवलपमेंट फोरम (KDF) ने, और इसकी कमान संभाल रखी है आर्मी से रिटायर्ड सुबेदार मेजर हेमचंद्र हरबोला ने, जो नेशनल लेवल पर मेडल जीत चुके हैं। कुमाऊं में आर्चरी की लगभग न के बराबर मौजूदगी को देखते हुए द्रोणासागर को प्रशिक्षण केंद्र बनाना उनका सपना था, जो अब तेजी से आकार ले रहा है। इसी यात्रा का हिस्सा बनी हैं पाखी और अर्पिता जैसी बालिकाएँ, जो बताती हैं कि तीरंदाजी ने उन्हें न सिर्फ शांति और आत्मविश्वास दिया है, बल्कि उनकी सोच, ऊर्जा और ध्यान को भी नई दिशा दी है।
जब बच्चों से पूछा गया कि उन्होंने आर्चरी क्यों चुना, तो उनकी सरल परंतु प्रेरणादायक बातें सुनकर यह साफ हो गया कि यहां आने वाले खिलाड़ी किसी दबाव में नहीं, बल्कि अपने मन की चाहत से इस खेल को अपनाते हैं। पाखी ने बताया कि जब वह अपने परिवार के साथ यहां घूमने आती थी, तब तीरंदाजी का अभ्यास करते बच्चों को देखकर उसमें भी इसे सीखने की इच्छा पैदा हुई। वहीं इशिका महेश्वरी कहती है कि वह काफी समय से आर्चरी सीख रही है और अब वह प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए खुद को सक्षम महसूस करती है। स्कूल की गतिविधियों में भाग लेने को लेकर इशिका बेहद उत्साहित है और उसका मानना है कि अगर उसे मौका मिला तो वह तीरंदाजी में बेहतरीन प्रदर्शन कर सकती है। इन बच्चों के भीतर खेल के प्रति जागृति साफ दिखाई देती है, और यह समझ में आता है कि शहर का यह छोटा सा प्रशिक्षण केंद्र किस तरह इन नन्हे खिलाड़ियों के सपनों को नया आकार दे रहा है।
बच्चों के माता-पिता भी इस नई दिशा को लेकर बेहद सकारात्मक नजर आते हैं। खासतौर पर पाखी की मम्मी का कहना है कि क्रिकेट जैसे पहले से भरे पड़े खेलों में भीड़ का हिस्सा बनने से बेहतर है कि बच्चे किसी ऐसे खेल को चुनें जिसमें व्यक्तित्व, धैर्य, फोकस और संतुलन जैसे गुणों को मजबूत किया जा सके। उनका कहना है कि आर्चरी प्राचीन कला है लेकिन आधुनिक पीढ़ी में इसकी पहचान कम थी। उन्हें लगता है कि इस खेल से बच्चे न सिर्फ शारीरिक रूप से मजबूत होते हैं बल्कि मानसिक रूप से भी शांत और स्थिर होते हैं। वहीं इशिका की मम्मी ने बताया कि इस खेल से बच्चों का कंसंट्रेशन लेवल कई गुना बढ़ जाता है और यह उनका आत्मविश्वास भी बढ़ाता है। माता-पिता का मानना है कि यदि बच्चों को समय रहते ऐसी गतिविधियों का मौका दिया जाए तो उनका संपूर्ण विकास संभव है चाहे वे आगे प्रतियोगिता खेलें या सिर्फ इसे एक फोकस-बूस्टर एक्टिविटी के तौर पर अपनाएँ।
आर्चरी सीखने आये वेदांत देवनाथ के दादा गणेश चन्द्र देवनाथ ने कहा कि वर्तमान समय में आर्चरी जैसे खेलों में करियर की संभावनाएँ तेजी से बढ़ी हैं। उनका मानना है कि यदि बच्चे किसी भी क्षेत्र में रुचि दिखाते हैं तो अभिभावकों का कर्तव्य है कि वह उन्हें आगे बढ़ने के लिए आवश्यक माहौल उपलब्ध कराएं। उनके अनुसार, यह दौर प्रतिस्पर्धा का है लेकिन तीरंदाजी वह कला है जिसमें अभ्यास और धैर्य के साथ-साथ मानसिक संतुलन भी जरूरी है। वे बताते हैं कि यदि बच्चे में रुचि हो तो वह राज्य स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक आसानी से पहुँच सकता है। उन्हें इस बात की खुशी भी है कि काशीपुर जैसे शहर में इस खेल की शुरुआत ने अभिभावकों पर से बड़े शहरों में बच्चों को भेजने का बोझ कम कर दिया है।
इस पूरे अभियान के मुख्य प्रेरक हैं आर्मी से रिटायर्ड सुबेदार मेजर हेमचंद्र हरबोला, जो खुद राष्ट्रीय स्तर के पदक विजेता रहे हैं और उत्तराखंड के लिए पहला नेशनल मेडल लाने का गौरव भी उनके नाम दर्ज है। उनका कहना है कि उन्होंने आर्चरी प्रशिक्षण शुरू करने का सपना इसलिए देखा ताकि कुमाऊँ क्षेत्र के बच्चों को भी वही अवसर मिल सके जो गढ़वाल क्षेत्र में पहले से उपलब्ध थे। उनका मानना है कि दौणासागर का ऐतिहासिक महत्व भी इस खेल के लिए बेहद प्रतीकात्मक है क्योंकि गुरु द्रोणाचार्य का संबंध भी तीरंदाजी से ही रहा है। हेमचंद्र हरबोला बताते हैं कि काशीपुर डेवलपमेंट फोरम (केडीएफ) ने इस पहल को पूरा करने में महत्वपूर्ण सहयोग दिया और इसी कारण आज यह केंद्र सफलतापूर्वक संचालित हो पा रहा है।
प्रशिक्षक हरबोला बताते हैं कि पिछले एक वर्ष में इस केंद्र में 50 से अधिक बच्चों का पंजीकरण हुआ है, जिनमें से 30-32 बच्चे नियमित रूप से अभ्यास कर रहे हैं। इन बच्चों ने अभी तक राज्य स्तर की चौंपियनशिप में ब्रॉन्ज और गोल्ड मेडल जीतकर यह साबित कर दिया है कि समर्पित प्रशिक्षण कितना कारगर सिद्ध हो सकता है। हाल ही में स्टेट नेशनल ट्रायल भी इसी क्षेत्र के एक स्कूल में कराया गया, जिसमें स्थानीय बच्चों ने हिस्सा लिया। इस प्रशिक्षण केंद्र में प्रवेश प्रक्रिया सरल है एक फॉर्म भरने के बाद बच्चे की शारीरिक बनावट, दृष्टि और मानसिक संतुलन की जांच की जाती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह इस खेल के लिए उपयुक्त है। हरबोला का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा और सही तकनीक सिखाने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
इस खेल के फायदों को लेकर प्रशिक्षक का स्पष्ट मत है कि तीरंदाजी व्यक्ति को एक अलग स्तर का मानसिक संतुलन प्रदान करती है। उनके अनुसार यह खेल आक्रामकता नहीं बल्कि धैर्य, सटीकता और शांत मन की मांग करता है। चाहे बच्चा प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले या न ले, उसके भीतर विकसित होने वाली एकाग्रता उसे जीवन के हर क्षेत्र में फायदा पहुंचाती है। यही कारण है कि वे अभिभावकों से आग्रह करते हैं कि खासकर लड़कियों को इस खेल की ओर प्रेरित करें, क्योंकि तीरंदाजी में करियर की संभावनाएँ और अवसर लड़कियों के लिए भी समान हैं। बच्चों के लिए निर्धारित शुल्क 1000 रुपये मासिक है और शाम 4 से 7 बजे तक प्रशिक्षण दिया जाता है, जिसमें शारीरिक फिटनेस से लेकर अनुशासन तक की शिक्षा शामिल है।
आर्चरी को लेकर बढ़ती दिलचस्पी का एक बड़ा कारण यह भी है कि इस खेल को अब अग्निवीर भर्ती से भी जोड़ा गया है। प्रशिक्षक हरबोला बताते हैं कि भारतीय सेना अब स्पोर्ट्स कोटे को काफी महत्व देती है और तीरंदाजी में नेशनल मेडल जीतने वाले युवाओं को भर्ती में प्राथमिकता दी जाती है। इससे बच्चों के करियर के नए रास्ते खुलते हैं। अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर भारत के आर्चर लगातार शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं और विश्व रैंकिंग में भी भारत शीर्ष चार देशों में शामिल है। यही कारण है कि काशीपुर जैसे छोटे शहर में शुरू हुआ यह केंद्र आज बड़े बदलाव की उम्मीद जगाता है। हरबोला कहते हैं कि जब शुरुआत में दो बच्चे ही यहां आते थे, तब भी उन्हें विश्वास था कि एक दिन यह आंदोलन आकार लेगा और आज 50 बच्चे उनके भरोसे को सच साबित कर रहे हैं।



