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काशीपुर पीजी कॉलेज में छात्र संघ और प्रशासन आमने सामने, प्राचार्या व छात्र संघ अध्यक्ष के तीखे तर्क उजागर

नियमों की दीवार और छात्रों की आवाज के बीच फंसा काशीपुर पीजी कॉलेज, संवाद की कमी ने विवाद को आंदोलन में बदला, जहां प्रशासन अनुशासन की बात कर रहा है तो छात्र संघ अधिकार, प्रतिनिधित्व और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मुखर नजर आया।

काशीपुर। राधे हरि राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में इन दिनों छात्र संघ और कॉलेज प्रशासन के बीच चला आ रहा तनाव लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। छात्र संघ अध्यक्ष जतीन शर्मा और महाविद्यालय प्रशासन के बीच कई मुद्दों को लेकर टकराव की स्थिति सामने आ रही है, जिसने न केवल परिसर का माहौल प्रभावित किया है बल्कि कॉलेज की सार्वजनिक छवि पर भी प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं। इसी पृष्ठभूमि में हिन्दी दैनिक सहर प्रजातंत्र ने महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. सुमिता श्रीवास्तव और छात्र संघ अध्यक्ष जतीन शर्मा से अलग-अलग बातचीत कर दोनों पक्षों के विचार जानने का प्रयास किया। बातचीत के दौरान यह साफ दिखाई दिया कि जहां एक ओर प्रशासन शासकीय नियमों और विश्वविद्यालयीय निर्देशों के पालन को सर्वाेपरि बता रहा है, वहीं दूसरी ओर छात्र संघ अपनी मांगों को छात्रों के हित और संवैधानिक अधिकारों से जोड़कर देख रहा है। दोनों के तर्कों में तीखापन होने के बावजूद यह सवाल लगातार उठता रहा कि आखिर ऐसा क्या कारण है कि संवाद की जगह टकराव बढ़ता जा रहा है और छोटी-छोटी बातें आंदोलन और विवाद का रूप ले लेती हैं।

महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. सुमिता श्रीवास्तव ने बातचीत में स्पष्ट शब्दों में कहा कि छात्र संघ और प्रशासन के बीच लगातार हो रहा टकराव किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। उनके अनुसार यह स्थिति न केवल राधे हरि राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय की छवि को नुकसान पहुंचा रही है बल्कि उत्तराखंड प्रदेश की साख पर भी नकारात्मक असर डाल रही है। उन्होंने बताया कि यह महाविद्यालय कुमाऊं विश्वविद्यालय के अधीन है और उच्च शिक्षा निदेशालय, उत्तराखंड शासन के दिशा-निर्देशों के अनुसार संचालित होता है। ऐसे में प्रशासन का यह परम दायित्व बनता है कि वह शासन और विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित नियमों का अक्षरशः पालन करे। डॉ. सुमिता श्रीवास्तव का कहना था कि कई बार छात्र संघ पदाधिकारियों को सभी शासकीय नियमों की विस्तृत जानकारी नहीं होती, जिसके कारण कुछ मांगें ऐसी रख दी जाती हैं जिन्हें नियमों के अंतर्गत पूरा करना संभव नहीं होता। इसी गलतफहमी से विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है और बात टकराव तक पहुंच जाती है।

अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए प्राचार्या ने कहा कि छात्र संघ पदाधिकारी छात्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए उनका दायित्व और भी बढ़ जाता है कि वे नियमों को भली-भांति समझें। महाविद्यालय प्रशासन समय-समय पर नोटिस जारी कर नियमों की जानकारी देता है और जब भी छात्र या पदाधिकारी संपर्क में आते हैं तो उन्हें नियमों से अवगत कराया जाता है। इसके बावजूद यदि कोई व्यक्ति नियमों को पढ़ने या समझने का प्रयास नहीं करता तो बाद में उत्पन्न होने वाली समस्याओं के लिए प्रशासन को दोषी ठहराना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि महाविद्यालय किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है, बल्कि यह एक शैक्षणिक संस्थान है जिसकी प्रतिष्ठा से हजारों छात्रों और पूरे प्रदेश की छवि जुड़ी होती है। यदि परिसर में कोई नकारात्मक गतिविधि होती है तो उसका प्रभाव किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे संस्थान की साख को ठेस पहुंचती है। इसी दृष्टिकोण से छात्रों और उनके प्रतिनिधियों को भी जिम्मेदारी के साथ कदम उठाने चाहिए।

प्राचार्या डॉ. सुमिता श्रीवास्तव ने यह भी स्वीकार किया कि संवाद की प्रक्रिया हमेशा खुली रखी गई है और प्रशासन छात्रों की समस्याओं को सुनने के लिए तत्पर रहता है। उनका कहना था कि जो भी मांगें नियमों के दायरे में आती हैं, उनका समाधान किया जाता रहा है और आगे भी किया जाता रहेगा। किंतु यदि कोई मांग शासकीय या विश्वविद्यालयीय नियमों के विरुद्ध होती है, तो प्रशासन चाहकर भी उसे पूरा नहीं कर सकता। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जागरूकता प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है और नियमों की जानकारी रखना छात्र संघ पदाधिकारियों के लिए अनिवार्य है। यदि सभी पक्ष नियमों के अनुरूप चलें और सकारात्मक सोच के साथ संवाद करें, तो टकराव की स्थिति स्वतः समाप्त हो सकती है। उनका संदेश स्पष्ट था कि ऊर्जा को नकारात्मक आंदोलनों में नहीं, बल्कि रचनात्मक और शैक्षणिक गतिविधियों में लगाया जाना चाहिए।

वहीं दूसरी ओर छात्र संघ अध्यक्ष जतीन शर्मा ने बातचीत में बेहद स्पष्ट और आक्रामक अंदाज में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि महाविद्यालय में टकराव की स्थिति आज की नहीं बल्कि लंबे समय से चली आ रही है और यह उनके अध्यक्ष बनने से पहले भी मौजूद थी। जतीन शर्मा का कहना था कि यह मान लेना कि हर बार गलती केवल छात्रों की होती है, वास्तविकता से आंखें मूंदने जैसा है। उन्होंने पुरानी कहावत का हवाला देते हुए कहा कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती, विवाद के लिए दोनों पक्ष जिम्मेदार होते हैं। उनके अनुसार महाविद्यालय में लगभग 8850 छात्र पढ़ते हैं और हर छात्र की समस्या को सुनना प्रशासन और छात्र संघ दोनों का दायित्व है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि छात्र संघ द्वारा रखी गई मांगें नियमों के अनुसार हैं तो उन्हें स्वीकार क्यों नहीं किया जाता।

छात्र संघ अध्यक्ष ने अपने चुनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि 27 सितंबर को हुए चुनाव के बाद उन्होंने कई पत्र महाविद्यालय प्रशासन को सौंपे, लेकिन आज तक उनकी किसी भी मांग पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उनका दावा था कि उन्होंने कभी भी नियमों के खिलाफ कोई मांग नहीं रखी और यदि कोई मांग गलत है तो प्रशासन को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि वह किस नियम का उल्लंघन करती है। जतीन शर्मा ने यह भी कहा कि महाविद्यालय केवल शिक्षकों से नहीं बल्कि छात्रों से भी चलता है और छात्रों की आवाज उठाने के लिए ही छात्र संघ का गठन किया जाता है। यदि छात्रों की छोटी-छोटी समस्याओं को नजरअंदाज किया जाएगा तो स्वाभाविक रूप से असंतोष बढ़ेगा और वही असंतोष आगे चलकर आंदोलन का रूप ले लेता है।

अपनी बात को और विस्तार देते हुए जतीन शर्मा ने हाल ही में प्रस्तावित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि 31 दिसंबर जैसे अवसर पर, जब परीक्षाएं दिन में समाप्त हो जाती हैं, उसके बाद एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने का प्रस्ताव रखा गया था। उनका तर्क था कि इस तरह के कार्यक्रम से न केवल छात्रों का मनोबल बढ़ता है बल्कि महाविद्यालय का नाम भी पूरे उत्तराखंड में रोशन होता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि बड़े कलाकार कुमाऊं और गढ़वाल से आकर कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं तो इससे किसका नाम जुड़ता हैकृमहाविद्यालय, प्राचार्या और छात्र संघ सभी का। इसके बावजूद यदि केवल परीक्षा का हवाला देकर ऐसे प्रस्तावों को खारिज कर दिया जाए, तो यह छात्रों की भावनाओं की अनदेखी है। उनके अनुसार कॉलेज में रहकर छात्र परीक्षा की तैयारी नहीं करते, बल्कि तैयारी तो घर पर ही होती है, इसलिए कार्यक्रम से पढ़ाई पर असर पड़ने का तर्क उन्हें तर्कसंगत नहीं लगता।

छात्र संघ अध्यक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव के बाद होने वाली आवश्यक बैठकों का आयोजन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि छात्र संघ और शिक्षकों के बीच बैठक होना संविधान में निर्धारित है, ताकि दोनों पक्ष एक-दूसरे से परिचित हों और समस्याओं पर खुलकर चर्चा कर सकें। लेकिन चुनाव के चार महीने बीत जाने के बाद भी ऐसी कोई बैठक नहीं हुई। उन्होंने इसे गंभीर लापरवाही बताया और कहा कि जब छात्र अपनी आवाज उठाते हैं तो उन्हें नियमों का उल्लंघन करने वाला बता दिया जाता है, जबकि गलतियां प्रशासनिक स्तर पर भी हो सकती हैं। जतीन शर्मा का यह भी कहना था कि छात्र प्रभारी द्वारा कई बार बैठकों से संबंधित सूचनाएं छिपा ली जाती हैं, जिससे संवाद की प्रक्रिया बाधित होती है।

अपने तर्क को मजबूती देने के लिए जतीन शर्मा ने छात्र संघ कार्यालय का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने बताया कि उन्होंने छात्र संघ के सभी पदाधिकारियों के साथ मिलकर एक पत्र के माध्यम से छात्र कार्यालय की मांग रखी थी। उनका कहना था कि यह कार्यालय किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि छात्रों की समस्याओं को सुनने और समाधान करने के लिए आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि इस कार्यालय के निर्माण या सुधार के लिए उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर भी प्रयास किए, सफाई करवाई और व्यवस्था सुधारी, ताकि छात्र और पदाधिकारी वहां बैठ सकें। उनके अनुसार यदि छात्र संघ कार्यालय सही ढंग से संचालित होगा तो प्रशासन पर अनावश्यक दबाव भी कम होगा और कई समस्याएं वहीं सुलझ सकती हैं।

इसके साथ ही जतीन शर्मा ने परिसर की सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए तेंदुए की मौजूदगी की बात कही। उन्होंने बताया कि हाल ही में महाविद्यालय परिसर के आसपास तेंदुए की आहट सुनाई दी, जिसके बाद उन्होंने स्वयं निरीक्षण किया और वीडियो बनाकर इसे सार्वजनिक किया। उनका दावा था कि वीडियो वायरल होने के बाद भी प्रशासन की ओर से अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई गई। उन्होंने कहा कि जब महाविद्यालय में छात्रावास मौजूद है और बच्चे वहां रहते हैं, तो उनकी सुरक्षा सर्वाेपरि होनी चाहिए। ऐसे मामलों में सबसे पहले प्राचार्या को कदम उठाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उन्हें पर्याप्त अधिकार दिए जाएं तो वे एक महीने के भीतर कई समस्याओं का समाधान कर सकते हैं, अन्यथा वे अपने पद से इस्तीफा देने को भी तैयार हैं।

बातचीत के अंत में छात्र संघ अध्यक्ष ने लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रतिनिधित्व की बात पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि छात्र संघ के पदाधिकारी छात्रों के वोट से चुने जाते हैं और इसलिए छात्रों की समस्याओं को उठाना उनका नैतिक और संवैधानिक दायित्व है। जब छात्र उनके पास आकर अपनी परेशानी बताते हैं तो वह उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि प्रतिनिधियों से सीधे बात करने से इनकार किया जाएगा तो फिर छात्र संघ की भूमिका का क्या औचित्य रह जाएगा। जतीन शर्मा का कहना था कि यदि बड़े अधिकारियों या प्रभावशाली लोगों के मामलों में नियमों में लचीलापन दिखाया जा सकता है, तो सामान्य छात्रों के हित में भी उसी संवेदनशीलता की अपेक्षा की जानी चाहिए। उनके अनुसार आवाज उठाना गलत नहीं है, गलत तब होता है जब समस्याओं को दबा दिया जाता है।

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