काशीपुर। बारिश की बूंदों के साथ जब काशीपुर के वार्ड नंबर 11 किया ढकिया गुलाबो की गलियों में पानी उतरता है, तब यह किसी प्राकृतिक सौंदर्य का दृश्य नहीं बल्कि त्रासदी का रूप ले लेता है। मंगलवार को आई तेज बारिश ने एक बार फिर इस क्षेत्र को जलमग्न कर दिया और लोगों की पीड़ा को सार्वजनिक मंचों तक पहुंचा दिया। स्थिति इतनी भयावह हो गई कि पानी की गहराई में एक युवक को एक छोटे बच्चे को गोद में लेकर सुरक्षित स्थान तक ले जाते देखा गया, वह भी इस डर के साथ कि कहीं दोनों डूब न जाएं। ये दृश्य न केवल प्रशासन को कटघरे में खड़ा करता है, बल्कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवालिया निशान खड़े करता है। तस्वीरें ऐसी हैं जो मानवता को झकझोर दें और यह सोचने पर मजबूर करें कि क्या विकास का मतलब केवल वादों तक सीमित रह गया है?
वर्षों से एक ही दर्द को झेल रही जनता की आवाजें जब जिम्मेदारों तक पहुंचती हैं, तो उन्हें सुनने वाला कोई नहीं होता। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जब वे अपनी समस्याओं को लेकर पार्षद के पास पहुंचे, तो उन्हें यह जवाब मिला कि मोटर लगाओ और पानी निकालो-जैसे जलभराव से जूझना जनता की ही जिम्मेदारी हो। यह वही वार्ड है जहां चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे होते हैं, लेकिन जब बारिश आती है तो घर, दुकानें और जीवन – सब कुछ जल में डूब जाता है। जनप्रतिनिधियों का यह बेरुखी भरा रवैया आम जनता को मायूस करता है। उन्होंने कहा कि यह पहली बार है जब हालात इतने चिंताजनक बने हैं कि अब डर लगने लगा है कि कहीं कोई बड़ा हादसा न हो जाए। सड़कों पर भरा पानी अब गलियों से होते हुए घरों में घुसने लगा है, लेकिन जिम्मेदार आंख मूंदे बैठे हैं।
काशीपुर नगर निगम द्वारा बनाए गए उस तालाब की भी भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं, जिसमें पूरे क्षेत्र का पानी इकट्ठा किया जाता है, लेकिन उस तालाब से जलनिकासी का कोई स्थायी प्रबंध नहीं किया गया है। यही कारण है कि बरसात के मौसम में यह क्षेत्र बार-बार जलमग्न हो जाता है और लोगों को घर से बाहर निकलना तक मुश्किल हो जाता है। जब पत्रकारों की टीम ने मौके पर पहुंचकर वहां की जनता से बात की, तो उन्होंने बताया कि पहले वर्षों से एक जलनिकासी नाला काम कर रहा था, जिससे पानी आसानी से बाहर निकल जाता था। परंतु अब उस पुराने जलनिकासी मार्ग को बंद कर दिया गया है और स्थानीय जनता का आरोप है कि यह काम पार्षद के ही रिश्तेदार द्वारा किया गया है। लोगों ने कहा कि वह व्यक्ति पार्षद का भाई लगता है और अब वहां पर तानाशाही रवैया अपनाते हुए न केवल पानी निकालने से मना करता है बल्कि जब कोई वहां जाकर बात करता है तो उन्हें अपशब्द कहे जाते हैं।
जगह-जगह भरे गंदे पानी के बीच रहने को मजबूर जनता का कहना है कि यह जल निकासी का मार्ग सालों से अस्तित्व में था, और इसी से समस्या का समाधान भी निकलता था। मगर अब यह मार्ग एक पार्षद के रिश्तेदार द्वारा अवरुद्ध कर दिया गया है। बताया गया कि यह व्यक्ति पार्षद का भाई लगता है और इसी रिश्ते के आधार पर जल निकासी को जानबूझकर रोका जा रहा है। लोगों का आरोप है कि जब वे इस व्यक्ति से बात करने जाते हैं तो वह न सिर्फ अपशब्दों का प्रयोग करता है बल्कि गाली-गलौज कर हाथापाई पर भी उतारू हो जाता है। ऐसे हालात में कोई भी सामान्य नागरिक किस तरह अपनी आवाज उठाए? और जब बात पार्षद तक पहुंचाई जाती है तो वह भी औपचारिकता निभाकर लौट जाते हैं, समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाते। यह रवैया लोकतंत्र की भावना को चोट पहुंचाता है, जहां प्रतिनिधि समस्याओं को सुलझाने की जगह सिर्फ ‘देखने’ और ‘सुनने’ तक सीमित रह गया है।

स्थानीय लोगों ने मीडिया से बातचीत के दौरान बेहद चौंकाने वाले खुलासे किए। उन्होंने बताया कि जब कोई जागरूक नागरिक जलभराव की समस्या को लेकर समाधान की पहल करता है या आवाज उठाने की कोशिश करता है, तो उसे सीधे तौर पर ‘फसल खराब’ कर देने की धमकी देकर डराया जाता है, ताकि वह चुप रह जाए। यह वही रास्ता है जिससे वर्षों से बारिश का पानी निकाला जाता रहा है, परंतु अब उस सार्वजनिक मार्ग को निजी स्वार्थों के तहत अवरुद्ध कर दिया गया है। जनता का आरोप है कि इस पूरे मामले में पार्षद और उनके परिजन अब तानाशाही रवैया अपना चुके हैं। न सिर्फ लोगों की समस्याओं को अनसुना किया जा रहा है, बल्कि आवाज उठाने वालों को अपमानित किया जाता है और डराया धमकाया जाता है। इस तरह का व्यवहार न केवल एक जनप्रतिनिधि की मर्यादा को लांघता है, बल्कि लोकतंत्र की मूल आत्मा को भी ठेस पहुंचाता है। ऐसे में नगर निगम और क्षेत्रीय प्रशासन की चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े करती है – क्या आज एक लोकतांत्रिक देश में जनता की आवाज इतनी कमजोर हो गई है कि वह अपने ही प्रतिनिधियों के सामने बेबस और असहाय नजर आए?
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब पार्षद से शिकायत करने के बावजूद कोई समाधान नहीं निकलता। स्थानीय लोगों ने बताया कि पार्षद हर बार मौके पर आकर सिर्फ हालात का जायजा लेते हैं लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाते। जब कार्यवाही की बात होती है तो पार्षद यही कहते हैं कि उसे फसल के पैसे दे दो, वह पानी निकाल देगा। सवाल यह है कि जनता आखिर कब तक अपने मूलभूत अधिकारों के लिए कीमत चुकाती रहेगी? क्या यह लोकतंत्र में जनता की हैसियत का माखौल नहीं है? ऐसे समय में जब नागरिक छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर अपने प्रतिनिधियों के पास जाते हैं, तो उन्हें जवाब देने के बजाय टालने का रवैया अपनाया जाता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वार्ड नंबर 11 जैसे क्षेत्रों में जनता को हर साल एक ही जलजमाव की समस्या से जूझना पड़ता है और फिर हर बार नई बहानेबाजी शुरू हो जाती है।
संकट की घड़ी में जब स्थानीय प्रशासन की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब वार्ड 11 के पार्षद घनश्याम सैनी की भूमिका सिर्फ एक दर्शक की बनकर रह जाती है। लोगों का यह भी कहना है कि यदि शुरू में ही उस तालाब की संरचना में जल निकासी की स्थायी व्यवस्था बनाई गई होती तो आज यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती। मगर अफसोस की बात है कि योजना बनाने वालों ने कभी इस दिशा में गंभीरता नहीं दिखाई। अब जब पूरा क्षेत्र जलमग्न हो चुका है, तब भी किसी प्रकार की तकनीकी या संरचनात्मक योजना की बात नहीं की जा रही। स्थानीय निवासियों ने चेताया है कि यदि जल्द ही स्थायी समाधान नहीं किया गयाए तो वे बड़े स्तर पर प्रदर्शन करेंगे। उनका यह कहना भी है कि जब बात पार्षद तक पहुंचती है, तब वह वही पुराना जवाब दोहराते हैं – ‘पैसे दो पानी निकलवा दो।’ यह उत्तर एक प्रतिनिधि का नहीं, बल्कि एक व्यापारिक सौदेबाज का लगता है।
स्थानीय निवासियों ने इस बात पर भी नाराज़गी जताई कि इतनी बड़ी समस्या के बावजूद आज तक उस तालाब से स्थायी जलनिकासी की योजना नहीं बनाई गई। यदि समय रहते एक स्थायी नाला बना दिया जाता, तो शायद इस क्षेत्र को इस तरह की समस्या से बार-बार नहीं जूझना पड़ता। यहां की जनता अब सवाल कर रही है कि क्या उनका जीवन केवल चुनावी वादों तक ही सीमित है? क्या हर मानसून में उनकी परेशानियों का समाधान केवल मोटर से पानी निकालना ही है? वार्ड नंबर 11 के नागरिक अब इस उम्मीद में हैं कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस बार चुप न रहें, बल्कि स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाएं।
वार्ड नंबर 11 ढकिया गुलाबो में उत्पन्न स्थिति अब केवल एक स्थानीय समस्या नहीं रही, बल्कि यह एक गंभीर प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बन चुकी है। जिस तरह से जल निकासी मार्ग को निजी स्वार्थों के चलते बंद किया गया है, वह न केवल क्षेत्र की आमजनता के प्रति अन्याय है, बल्कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम नागरिकों की उपेक्षा का भी उदाहरण है। ऐसे में यह आवश्यक हो गया है कि नगर निगम इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करवाए, ताकि दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई की जा सके। साथ ही तत्काल प्रभाव से बंद किए गए जलनिकासी मार्ग को खुलवाया जाए, जिससे क्षेत्र को राहत मिल सके। इसके साथ ही भविष्य की दृष्टि से एक स्थायी नाले का निर्माण कराया जाए, ताकि हर साल आने वाली यह जलभराव की त्रासदी दोहराई न जाए। ढकिया गुलाबो की जनता आज कुछ अतिरिक्त नहीं, बस अपना मूलभूत हक मांग रही है दृ एक स्वच्छ, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन। अब यह प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है कि वे इस पीड़ा को समझें और निर्णय लें।



