- बेकाबू अतिक्रमण से पस्त शहर, प्रशासन की खामोशी ने सड़कों को संकट में धकेला
- सड़कों पर कब्जा जमाए दुकानदार, व्यवस्था ठप और प्रशासन मौन बना तमाशा देखता रहा
- जाम में घुटते नागरिक, बढ़ते अतिक्रमण के आगे शासन–प्रशासन पूरी तरह बेअसर साबित
- अवैध कारोबार ने सड़कों को बंधक बनाया, जिम्मेदारों की आंखों के सामने अराजकता चरम पर
- संकरी होती सड़कें और अनियंत्रित कब्जे, प्रशासन की उदासीनता से शहर बेहाल
- ठेलों का साम्राज्य सड़कों पर हावी, जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी ने संकट बढ़ाया
काशीपुर(सुनील कोठारी)। महानगर की सड़कों की जो छवि कभी लोगों के मन में स्वच्छ, व्यवस्थित और बेधड़क यातायात वाली बसती थी, आज वही सूरत पूरी तरह बिखर चुकी है। शहर के मुख्य मार्गों पर बढ़ते अव्यवस्थित ठेले, पक्के झालरनुमा ढांचे और अनियंत्रित दुकानों ने रास्तों को इस कदर घेर लिया है कि सड़कें पहचान तक खो चुकी हैं। जहां पहले वाहन बिना किसी रुकावट के गुजरते थे, अब उसी जगह दिन के हर पहर घोर जाम और तनाव का माहौल बना रहता है। इतना बिगड़ा हुआ परिवेश देखकर नागरिक घर से निकलने से पहले ही सोच में पड़ जाते हैं कि बाज़ार जाने का फैसला सही होगा या नहीं। बढ़ते अतिक्रमण पर प्रशासन की खामोशी ने इस असंतुलन को और गहरा कर दिया है। लोग यह सवाल उठाने लगे हैं कि प्रशासनिक नियम केवल फाइलों तक ही सिमटकर क्यों रह गए हैं जबकि जमीनी धरातल पर इनका अस्तित्व ढूँढे नहीं मिलता।
इसी गंभीर स्थिति को उजागर करने के लिए काशीपुर निवासी मनोज कौशिक ने जनहित याचिका दाखिल कर अदालत के सामने वास्तविकता रखने का साहसिक कदम उठाया था। अदालत ने याचिका की गंभीरता को समझते हुए शासन और प्रशासन को स्पष्ट निर्देश जारी किए कि इस मार्ग को तत्काल अतिक्रमण मुक्त कराया जाए। आदेश के बाद प्रशासन ने तहसील चौक से बांस फोड़ान तक पीली पट्टी खींचकर सड़क की सीमा निर्धारित की थी, लेकिन यह व्यवस्था कुछ दिनों से अधिक टिक नहीं सकी। दुकानदारों ने धीरे-धीरे उस पट्टी को ढकते हुए फिर से अपने ठेले और स्थायी ढांचे सड़क के भीतर बढ़ा दिए, जिसके चलते यातायात पुनः चरमराने लगा। लगभग एक किलोमीटर लंबा यह मार्ग आज दोनों ओर से फलों-सब्जियों की असंगठित कतारों से जकड़ा हुआ है। कभी यह मार्ग 25 फीट तक खुला हुआ करता था, लेकिन अब जगह-जगह यह केवल 10 फीट की संकरी पट्टी में सिमट गया है। और तो और, इस रास्ते से रोजाना गुजरने वाले काशीपुर मेयर भी इस अव्यवस्था का सामना तो करते हैं, परंतु मानो इस समस्या पर आंख मूंदकर निकल जाना ही रोजमर्रा का हिस्सा बन चुका है।

अतिक्रमण की ये परतें सिर्फ दुकानों तक सीमित नहीं रही हैं; इन्होंने नगरपालिका के आदेशों, चेतावनियों और वर्षों से चली आ रही व्यवस्थाओं की असलियत उजागर कर दी है। पूरे प्रदेश में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अगुवाई में अतिक्रमण विरोधी अभियान को सख्ती से लागू किया जा रहा है, वहीं काशीपुर का रवैया बिलकुल उल्टा दिखाई देता है। यहां स्थिति यह है कि लोग नियमों को चुनौती की तरह लेते हैं और सड़क के बीचों-बीच स्थायी कब्जे जमा कर उन्हें अपनी निजी संपत्ति मान बैठते हैं। स्थानीय निवासी बताते हैं कि इस इलाके में न कोई रोक-टोक होती है, न ही किसी प्रकार की नियमित निगरानी। सड़कें संकरी होती जा रही हैं और अतिक्रमण की परतें हर दिन और मोटी।
नई सब्जी मंडी की स्थिति भी इस अव्यवस्था का बड़ा उदाहरण बन चुकी है। कभी अस्थायी व्यापार के लिए तय किया गया यह स्थान अब पूरी तरह स्थायी ढाँचों और अतिक्रमणकारी व्यापारियों के कब्जे में बदल गया है। आधी सड़क पर सब्जी विक्रेताओं की कतारें जमी रहती हैं और बची हुई सड़क उन ग्राहकों की पार्किंग बन चुकी है जो अपने दोपहिया-चौपहिया वाहनों को बिना सोचे-समझे सड़क पर ही खड़ा कर देते हैं। देखने में आता है कि लोग गाड़ी ऐसे छोड़ देते हैं जैसे सड़क पर पार्किंग की अनुमति स्वाभाविक रूप से दी गई हो। न किसी अधिकारी का दबाव, न किसी नियम की चिंता यह दृश्य अब यहां की रोजमर्रा की वास्तविकता बन चुका है। राहगीर भी इस अव्यवस्था के बीच गुजरते हुए स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं, परंतु मजबूरी में इसी हालत को सहना पड़ रहा है।
नगर निगम का पूर्व का प्रयास सड़क के दोनों ओर पीली लाइन खींचकर दुकानों की सीमा तय करना आज कहीं दिखाई नहीं देता। यह पीली पट्टी मिट चुकी है, और उसके साथ-साथ दुकानदारों का अनुशासन भी गायब हो गया है। कई बड़े दुकानदार भी सड़क के मध्य तक अपने काउंटर और कवर्ड शेड फैलाकर ट्रैफिक को बाधित कर रहे हैं। छोटे ठेले, ग्राहक, दुकानों की अव्यवस्थित भीड़ और वाहनों की लाइनें मिलकर सड़क को किसी व्यापार मेले का रूप दे देती हैं, जहां पैदल चलना तक चुनौती में बदल गया है। शहर के निवासी कहते हैं कि यहां सड़क का काम यातायात के लिए कम और कारोबार के लिए अधिक रह गया है। पूरे मार्ग में ऐसी अफरातफरी का माहौल रहता है कि किसी भी समय अप्रिय दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।
सबसे चिंता का विषय यह है कि यह सब कुछ नज़दीकी पुलिस चौकी के सामने ही हो रहा है। पुलिसकर्मियों की प्रतिदिन मौजूदगी के बावजूद भी स्थिति जस की तस बनी रहती है। न तो किसी पर कार्रवाई होती है, न किसी दुकान को हटाया जाता है। ऐसा लगता है जैसे कानून की भूमिका केवल मौजूदगी दिखाने तक ही सीमित है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शासन और प्रशासन दोनों ही इस मार्ग से रोज गुजरते हैं, पर समस्या पर ध्यान देना जैसे उनकी प्राथमिकता ही नहीं रह गई है। आम लोगों के अनुसार, ऐसा प्रतीत होता है कि यहां अनदेखी करना ही परंपरा बन चुकी है और अतिक्रमणकारी इसी ढील का फायदा उठाकर अपनी पकड़ और मजबूत करते जा रहे हैं।

यह भी बेहद हैरान करने वाली बात है कि इसी भीड़भाड़ वाले मार्ग से काशीपुर मेयर दीपक बाली स्वयं भी लगभग प्रतिदिन गुजरते हैं, और हर बार उसी भारी जाम और अव्यवस्थित हालात से दो-चार होने के बावजूद वे मानो इस समस्या को देखकर भी न देखने का विकल्प चुन लेते हैं। सड़क पर पसरा अवैध कब्ज़ा, ठेलों की अव्यवस्थित कतारें, दुकानदारों का सड़क तक फैल चुका कारोबार और उससे उपजा हंगामा यह सब कुछ आम जनता की तरह उनके सामने भी रोज़ खुली किताब की तरह होता है। बावजूद इसके, स्थिति सुधारने की कोई दृश्यमान कोशिश न होना शहरवासियों के बीच सवाल पैदा करता है कि क्या यह प्रशासनिक अनदेखी है या फिर इस अराजकता को सामान्य मान लेने की प्रवृत्ति। नागरिकों का कहना है कि जब पहला नागरिक ही इस समस्या से रोज़ रूबरू होकर भी कदम उठाने से बचता दिखे, तो फिर बाकी तंत्र से उम्मीद कैसी? ऐसे हालात में मेयर का यूं बेपरवाही से निकल जाना शहर के प्रति जिम्मेदारी पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
हमारे द्वारा बनाए गए वीडियो में यह स्थिति और स्पष्ट देखी जा सकती है। वीडियो में दिखता है कि किस तरह व्यापारी खुलेआम सड़क पर स्थायी कब्जा जमाकर बैठ गए हैं, मानो प्रशासन का भय समाप्त हो चुका हो। न कोई रोकने आता है, न कोई कार्रवाई होती है। सड़कें हर दिन और सिकुड़ रही हैं और नियमों की परतें मानो धूल के साथ उड़ती जा रही हैं। इससे सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या नगर निगम अब भी इस मुद्दे पर गंभीर होगा? क्या इस अतिक्रमण को हटाने के लिए कोई कड़ा निर्णय लिया जाएगा या काशीपुर के नागरिकों को इसी अव्यवस्था के बोझ तले जीने के लिए छोड़ दिया जाएगा?



