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काशीपुर कांग्रेस में मचा सियासी भूचाल, अल्का पाल की ताजपोशी से फूटा विरोध का लावा

काशीपुर। कभी एकजुटता का प्रतीक मानी जाने वाली काशीपुर कांग्रेस अब भारी उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। महानगर अध्यक्ष के रूप में ’’अल्का पाल’’ की नियुक्ति के बाद कांग्रेस परिवार में अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पदाधिकारी इस फैसले से खासे नाराज़ नज़र आ रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, दर्जनों नेता और कार्यकर्ता इस्तीफे की तैयारी में हैं। यह विवाद अब इतना बढ़ गया है कि पार्टी के भीतर एक नया मोर्चा बनता दिख रहा है। सवाल यह नहीं कि महिला अध्यक्ष बनाई गईं, बल्कि यह है कि क्या संगठन की भावनाओं को दरकिनार कर यह निर्णय लिया गया? इस फैसले के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं में असंतोष की लहर दौड़ गई है और कई नेता इसे संगठन को कमजोर करने की साजिश तक बता रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए ’’कांग्रेस नेता मनोज अग्रवाल’’ ने कहा कि यह नाराज़गी किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई कारणों का परिणाम है। उन्होंने बताया कि राहुल गांधी के निर्देशन में संगठन सज्जन अभियान के तहत काशीपुर में एक नए सशक्त नेतृत्व के चयन की प्रक्रिया चल रही थी। इसी क्रम में ’’शक्ति सिंह गोविल’’ को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा गया था, जिन्होंने स्पष्ट कहा था कि यहां के कार्यकर्ताओं की आकांक्षाओं को ध्यान में रखकर निर्णय होगा। लेकिन, इसी बीच एक बाहरी व्यक्ति ने राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया। मनोज अग्रवाल के अनुसार, इस बाहरी दबाव के चलते स्थानीय नेताओं की अनदेखी कर एकतरफा फैसला लिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह का कदम कांग्रेस को भीतर से कमजोर करने की नीति का हिस्सा है, जिसे किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

वहीं, कांग्रेस के वरिष्ठ अधिवक्ता ’’अख़तर अली एडवोकेट’’ ने भी इस नियुक्ति पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब पहले से ही ’’पूजा सिंह’’ महिला अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रही हैं, तो दोबारा किसी महिला को अध्यक्ष बनाना संगठनात्मक दृष्टि से उचित नहीं है। उन्होंने जोड़ा कि यहां के वरिष्ठ नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं के सम्मान को ठेस पहुंचाई गई है। ख़तर अली ने कहा कि रामनगर से आई एक नई नेता को जबरन अध्यक्ष बनाना स्थानीय नेतृत्व के साथ अन्याय है। उन्होंने कहा कि यह फैसला न तो राजनीतिक दृष्टि से ठीक है, न सामाजिक दृष्टि से। उनका कहना था कि पार्टी में ऐसे कई वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं जिनके योगदान को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया, जिससे संगठन में भ्रम और असंतोष फैल रहा है।

इसी क्रम में ’’कांग्रेस नेत्री इंदु मान’’ ने भी अपनी नाराज़गी जाहिर की। उन्होंने बताया कि इस नियुक्ति से पहले सभी को उम्मीद थी कि संगठन वैश्य समाज से आने वाले नेता ’’मनोज अग्रवाल’’ को अध्यक्ष बनाएगा, जिनके समर्थन में 95 प्रतिशत कार्यकर्ता थे। लेकिन इसके बावजूद जिस व्यक्ति को चुना गया, उसके नाम की किसी को उम्मीद नहीं थी। उन्होंने आरोप लगाया कि अल्का पाल ने पूर्व में हुए मेयर चुनाव के दौरान कांग्रेस उम्मीदवार ’’संदीप सहगल’’ का विरोध किया था, और अब उसी व्यक्ति को अध्यक्ष बना देना पार्टी की विचारधारा के खिलाफ है। इंदु मान ने कहा कि वे स्वयं एक ओबीसी महिला हैं, लेकिन पार्टी को ऐसे व्यक्ति को चुनना चाहिए था जिसने कांग्रेस के लिए निष्ठा से काम किया हो, न कि उसका विरोध किया हो।

पूर्व महिला अध्यक्ष ’’पूजा सिंह’’ ने भी दैनिक सहर प्रजातंत्र से बात करते हुए स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी महिला के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि नाराज़गी सिर्फ इस बात की है कि कार्यकर्ताओं की राय को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। उन्होंने बताया कि काशीपुर में जब ’’राजकुमारी मीटिंग’’ हुई थी, तब 95 प्रतिशत कार्यकर्ताओं ने मनोज अग्रवाल के समर्थन में मतदान किया था। इसके बावजूद परिणाम उल्टा आया, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या किसी बाहरी दबाव ने यह निर्णय करवाया? पूजा सिंह ने कहा कि यदि पहले से ही किसी एक नाम को आगे बढ़ाना था तो यह प्रक्रिया केवल दिखावा साबित हुई। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यदि ओबीसी महिला ही बनानी थी, तो काशीपुर में कई योग्य महिलाएं मौजूद थीं जो वर्षों से पार्टी के लिए समर्पित हैं।

इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम बयान पूर्व महानगर अध्यक्ष और मेयर प्रत्याशी ’’संदीप सहगल’’ का रहा। उन्होंने कहा कि आज काशीपुर कांग्रेस कार्यकर्ता खुद को नेता-विहीन महसूस कर रहे हैं। राहुल गांधी के संगठन अभियान से सभी को उम्मीद थी कि जनता की राय से अध्यक्ष चुना जाएगा, लेकिन जो निर्णय हुआ, वह पार्टी कार्यकर्ताओं की इच्छा के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि इस फैसले से कांग्रेस परिवार विचलित है और यदि निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो कई ब्लॉक अध्यक्ष, महिला पदाधिकारी और पार्षद इस्तीफा देने को तैयार हैं। सहगल ने कहा कि विरोध महिला का नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का है जिसमें एक व्यक्ति को कई पदों से नवाजा गया और समर्पित कार्यकर्ताओं को नज़रअंदाज़ किया गया।

मेयर प्रत्याशी ’’संदीप सहगल’’ का आरोप है कि ’’अल्का पाल’’ पहले से ही कई पदों पर हैं-प्रदेश महिला कांग्रेस की वरिष्ठ उपाध्यक्ष, पीसीसी सदस्य, और राष्ट्रीय स्तर पर भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। ऐसे में उन्हें महानगर अध्यक्ष बनाना संगठन के भीतर असंतुलन पैदा करेगा। कार्यकर्ताओं का कहना है कि पार्टी में कई वरिष्ठ महिलाएं थीं जो इस जिम्मेदारी को संभाल सकती थीं, जैसे ’’दीपिका गुड़िया, रौशनी बेगम, मीनू गुप्ता, अनीता यादव, संगीता यादव’’ और ’’लता शर्मा’’। लेकिन एक ही व्यक्ति को कई जिम्मेदारियां देना अन्याय है।

’’संदीप सहगल’’ का यह भी कहना है कि इस निर्णय ने भाजपा को लाभ पहुंचाने का रास्ता खोल दिया है। संगठन के भीतर कलह से विपक्ष खुश है, क्योंकि इससे 2027 के चुनाव में कांग्रेस की स्थिति कमजोर पड़ सकती है। ’’संदीप सहगल’’ ने कहा कि यह पदों की लड़ाई नहीं है, बल्कि पार्टी की आत्मा और एकता का सवाल है। उन्होंने मांग की कि हाईकमान इस पर जल्द से जल्द पुनर्विचार करे, क्योंकि काशीपुर की जनता और कार्यकर्ता खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।

काशीपुर कांग्रेस में मचा यह घमासान केवल एक नियुक्ति का विरोध नहीं, बल्कि संगठन की गहराती टूट का संकेत है। एक ओर जहां कांग्रेस आलाकमान महिला सशक्तिकरण का संदेश देना चाहता है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय नेता इसे नजरअंदाजी और पक्षपात का उदाहरण बता रहे हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आलाकमान इस असंतोष को कैसे शांत करता है और क्या ’’अल्का पाल’’ अपने विरोधियों को साथ लेकर चलने में सफल हो पाती हैं या नहीं। फिलहाल, काशीपुर की सियासी फिज़ा में गर्मी चरम पर है और कांग्रेस का अंदरूनी संघर्ष शहर की गलियों में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन चुका है।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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