रामनगर। कारगिल युद्ध में भारत की विजय को समर्पित ‘कारगिल विजय दिवस’ के अवसर पर रामनगर स्थित पीएनजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में शनिवार को एक भावपूर्ण और प्रेरणादायक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर 79 यूके बटालियन एनसीसी इकाई के कैडेट्स ने सबसे पहले वीर शहीदों की स्मृति में परिसर में पौधारोपण कर इस दिन की शुरुआत की। कार्यक्रम की गरिमा और भावनात्मक ऊर्जा उस समय और भी ऊंचाई पर पहुंच गई जब सभी मौजूद छात्र-छात्राओं, महाविद्यालय के प्राध्यापकों, शिक्षणेत्तर कर्मचारियों और एनसीसी अधिकारियों ने शौर्य दीवार पर शहीदों के छविचित्रों पर पुष्पांजलि अर्पित की और उनकी वीरता को नमन करते हुए मौन धारण किया। यह क्षण न केवल सन्नाटा था, बल्कि आत्मगौरव और सम्मान का एक सजीव प्रतीक बन गया, जिसने छात्रों के दिलों में देशभक्ति की एक स्थायी छाप छोड़ दी।
कार्यक्रम में विशेष आमंत्रित अतिथि के रूप में पहुंचे सूबेदार मेजर नवीन चन्द्र पोखरियाल (सेवानिवृत्त) ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में कारगिल युद्ध की संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण झलकियां साझा करते हुए सभी छात्र-छात्राओं को न केवल युद्ध के इतिहास से अवगत कराया, बल्कि राष्ट्रभक्ति की भावना को और प्रगाढ़ किया। उन्होंने बताया कि फरवरी 1999 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच लाहौर घोषणापत्र पर बातचीत चल रही थी, उसी समय पाकिस्तान छद्म युद्ध की तैयारी में जुटा हुआ था और कारगिल की चोटियों पर घुसपैठ करने की साजिश रच रहा था। पाकिस्तान ने इस सैन्य चाल को श्ऑपरेशन बद्रश् नाम दिया, जबकि भारत ने जवाब में श्ऑपरेशन विजयश् शुरू कर साहस और पराक्रम का ऐसा परिचय दिया कि पूरी दुनिया ने भारतीय सेना की क्षमता को सलाम किया। उन्होंने विस्तार से बताया कि किस प्रकार भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों को करारा जवाब दिया और उनकी कमर तोड़ दी, जिससे मजबूर होकर तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को यह स्वीकार करना पड़ा कि यदि युद्ध लंबा चला तो उनके पास केवल छह दिनों का तेल भंडार शेष रहेगा।

देश की रक्षा में भारतीय सैनिकों की वीरता को रेखांकित करते हुए सूबेदार मेजर नवीन चन्द्र पोखरियाल ने बताया कि इस युद्ध में भारत के 527 वीर सैनिक शहीद हुए, 1363 जवान घायल हुए और एक वीर सैनिक पाकिस्तान द्वारा युद्धबंदी बनाया गया। उन्होंने यह भी बताया कि उत्तराखंड की पवित्र भूमि ने 75 वीर जवान इस युद्ध में खोए, जिनमें नैनीताल जिले के मेजर राजेश अधिकारी (महावीर चक्र), नायक मोहन सिंह (सेना मेडल), लांसनायक चंदन सिंह (सेना मेडल), लांसनायक रामप्रसाद ध्यानी और सिपाही मोहन चन्द्र जोशी शामिल हैं, जिन्होंने देश की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी और अमर हो गए। उनकी शौर्यगाथा छात्रों को भावुक भी कर गई और प्रेरित भी। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे सेना में शामिल होकर अपने जीवन को राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित करें, क्योंकि यह जीवन की सर्वाेच्च तपस्या है।
इस ऐतिहासिक दिवस पर महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य प्रोफेसर एस.एस. मौर्य ने अपने उद्बोधन में विद्यार्थियों से भारतीय सेना को अपना करियर विकल्प चुनने की अपील करते हुए कहा कि देश की रक्षा करना केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सबसे बड़ा गौरव है। उन्होंने कहा कि आज के युवा अगर अपने जीवन में अनुशासन, समर्पण और सेवा का भाव अपनाते हैं तो वे न केवल अपने लिए, बल्कि देश के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकते हैं। डॉ. पुनीता कुशवाहा ने भी इस अवसर पर छात्रों को राष्ट्रीय एकता और अखंडता की भावना से ओत-प्रोत होने का संदेश दिया और कहा कि कारगिल युद्ध हमारे लिए केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि हमारी संप्रभुता, एकता और दृढ़ता की गाथा है।

एनसीसी इकाई के लेफ्टिनेंट डी.एन. जोशी ने भी अपने संबोधन में एनसीसी कैडेट्स की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों में देशभक्ति और अनुशासन की भावना को मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय सेना में सेवा करना केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि एक यज्ञ है, जिसमें आहुति के रूप में राष्ट्रसेवा सर्वाेपरि होती है। कार्यक्रम में लेफ्टिनेंट कृष्णा भारती, डॉ. लवकुश कुमार, डॉ. सुमन कुमार और डॉ. मूलचंद शुक्ला सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे, जिन्होंने अपने पूरे मनोयोग से कार्यक्रम में भाग लिया और इसे सफलता की ऊंचाई तक पहुंचाया।
पीएनजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय का यह आयोजन केवल एक दिन की स्मृति नहीं रहा, बल्कि यह छात्रों के हृदय में राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध, सैन्य बलों के प्रति सम्मान और अपने उत्तराखंडी वीर सपूतों के बलिदान की गर्वगाथा के रूप में सदा अंकित रहेगा। यह आयोजन एक बार फिर यह सिद्ध कर गया कि जब शिक्षा संस्थान राष्ट्र निर्माण की भावना से ओतप्रोत हो जाते हैं, तब समाज में चेतना की नई लहर दौड़ती है।



