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कांग्रेस कार्यालय की तस्वीर पर मचा सियासी बवाल जाति की राजनीति ने बढ़ाई गर्मी

सामूहिक निर्णय से हुई तस्वीर हटाने की प्रक्रिया ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचाई, विवाद को जाति और धर्म से जोड़ने की कोशिश पूरी तरह गलत साबित हुई

काशीपुर। दो अक्टूबर को कांग्रेस कार्यालय में लगी तस्वीर को लेकर मचा बवाल अब राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में गर्म चर्चा का विषय बन गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल कांग्रेस संगठन के भीतर मतभेदों को उजागर किया बल्कि स्थानीय राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी। कांग्रेस नेता ने बताया कि जब आदरणीय मुक्ता सिंह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुई थीं, उस समय ही उनके नाम और तस्वीर को कार्यालय से हटाया गया था। हालांकि, संभव है कि बाद में दोबारा पुताई या मरम्मत के दौरान तस्वीर फिर से लग गई हो। यह निर्णय व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामूहिक था, जिसमें गांधी जयंती और शास्त्री जयंती के अवसर पर उपस्थित वरिष्ठ कांग्रेसी जैसे श्री अरुण चौहान, जयसिंह गौतम, विमल गुड़िया, मंसूर आलम, नौशाद पार्षद, मुशर्रफ हुसैन, पूजा सिंह, जितेंद्र, अलका और अनुपम शर्मा शामिल थे। उस दौरान वातावरण श्रद्धा और सम्मान का था, किसी व्यक्ति विशेष के अपमान की भावना बिल्कुल नहीं थी।

राजनीतिक पृष्ठभूमि में यह मामला अचानक तब बढ़ गया जब इसे जाति और धर्म के चश्मे से देखा जाने लगा। कांग्रेस नेता का कहना था कि जिन लोगों ने इस पूरे विवाद को जातिगत रंग देने की कोशिश की, उन्होंने एक गंभीर भूल की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मामला न तो किसी समुदाय से जुड़ा था और न ही किसी धार्मिक भावना से, बल्कि यह केवल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच का एक आंतरिक राजनीतिक विवाद था। उन्होंने यह भी कहा कि स्वर्गीय तिवारी जी जैसे वरिष्ठ नेता सभी के लिए सम्माननीय हैं, और उनका राजनीतिक चरित्र इतना ऊंचा है कि किसी पार्टी के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। उनका कहना था कि जिस प्रकार भाजपा अपने कार्यालय में तिवारी जी की तस्वीर नहीं लगा सकती, उसी प्रकार कांग्रेस को भी अपने कार्यालय में अपनी नीतियों और निर्णयों के अनुरूप कदम उठाने का अधिकार है।

महापौर प्रत्याशी संदीप सेहगल ने इस मामले पर अपने विचार साझा किए और इसे केवल राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में ही देखने की अपील की। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस घटना ने हाल में सुर्खियां बटोरीं, वह केवल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच का आंतरिक मामला था और इसमें किसी जाति या धर्म का कोई हस्तक्षेप नहीं था। उन्होंने कहा कि समर पाल सिंह चौधरी की फोटो, जो पहले कांग्रेस कार्यालय में लगी थी, मुक्ता सिंह के भाजपा में शामिल होने से पहले लगी हुई थी और 2 अक्टूबर को वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में लिए गए सामूहिक निर्णय के तहत हटाई गई। संदीप सेहगल ने जोर देकर कहा कि यह उनके व्यक्तिगत निर्णय का हिस्सा नहीं था, बल्कि इस बारे में वरिष्ठ नेताओं जैसे अरुण चौहान, जयसिंह गौतम, विमल गुड़िया, विकल गुड़िया, मंसूर आलम, नौशाद पार्षद, मुशर्रफ हुसैन, पूजा सिंह, जितेंद्र, अलका और अनूप शर्मा की उपस्थिति में एक संयुक्त बैठक में फैसला लिया गया।

उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति का पूरा परिवार भाजपा के समर्थन में सक्रिय था और जिसने हाल ही में नगर निगम चुनाव के माहौल को प्रभावित करने का प्रयास किया था, उसकी गतिविधियों के कारण फोटो हटाने का निर्णय लिया गया। संदीप सेहगल ने स्पष्ट किया कि यह मामला पूरी तरह राजनीतिक था और इसमें किसी भी जाति या धर्म का हस्तक्षेप नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि जिन्होंने इस घटना को जातिगत रंग देने की कोशिश की, उन्होंने पूरी तरह गलत किया। उन्होंने विशेष रूप से याद दिलाया कि स्वर्गीय तिवारी जी का राजनीतिक कद और चरित्र अत्यंत उच्च स्तर का था और भाजपा कार्यालय में उनकी फोटो लगाना असंभव था। यह मामला केवल कांग्रेस और भाजपा के आंतरिक मुद्दों तक सीमित था और इसे किसी सामाजिक या धार्मिक दृष्टि से जोड़ना अनुचित है।

संदीप सेहगल ने इस विवाद के बढ़ते स्वरूप पर चिंता जताई और कहा कि जिस प्रकार से यह मामला हवा में उछला, वह आवश्यक नहीं था। उन्होंने कहा कि इस विवाद से विमल अंकल सहित कई वरिष्ठ नेता मानसिक रूप से परेशान और आहत हुए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि ऐसे घटनाक्रम स्वस्थ राजनीतिक मानसिकता का परिचायक नहीं हैं और इससे न केवल नेताओं का मनोबल प्रभावित होता है, बल्कि राजनीतिक माहौल भी प्रभावित होता है। संदीप ने जनता से अपील की कि राजनीतिक घटनाओं को लेकर जल्दबाजी में निष्कर्ष न निकालें और आंतरिक मामलों को भीतर ही सुलझाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

महापौर प्रत्याशी ने यह भी कहा कि इस विवाद में जाट महासभा को शामिल करना और इसे जातिगत या धार्मिक रंग देना पूरी तरह अनुचित था। उन्होंने स्पष्ट किया कि चौधरी साहब किसी जाति या धर्म विशेष से जुड़े नहीं थे और यदि उन्होंने समाज के लिए अच्छे कार्य किए, तो यह केवल समाज के हित में थे, किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं। उन्होंने कहा कि किसी भी नेता को जातिगत रूप में सीमित करना उनके राजनीतिक कद को छोटा करना है और उनके योगदान का महत्व कम करना है। संदीप ने यह भी जोर देकर कहा कि नेताओं के काम और समाज के प्रति योगदान को ही प्राथमिकता देनी चाहिए, न कि किसी जाति या धर्म के आधार पर उनका मूल्यांकन करना चाहिए।

अंत में, संदीप सेहगल ने सभी से अपील की कि इस प्रकार की घटनाओं को राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में ही समझा जाए और इसे किसी भी सामाजिक या धार्मिक दृष्टि से न देखा जाए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक कार्यों का मूल्यांकन केवल उनके वास्तविक योगदान और समाज की भलाई के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आंतरिक विवादों को अनुचित तरीके से हवा दी गई, तो यह नेताओं और जनता के बीच गलतफहमियां पैदा कर सकता है। संदीप ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक समझदारी और संयम के साथ कार्य करना आवश्यक है और नेताओं को भी अपने योगदान और छवि को सही दृष्टिकोण से जनता के सामने प्रस्तुत करना चाहिए।

संदीप सेहगल के इस बयान ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक विवादों में तटस्थ दृष्टिकोण अपनाना ही सही है और किसी भी मामले को जाति या धर्म के आधार पर फैलाना अनुचित है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस और भाजपा के आंतरिक मामलों को सार्वजनिक स्तर पर बड़ा बनाने की आवश्यकता नहीं थी। इस पूरे घटनाक्रम से यह संदेश मिलता है कि राजनीतिक समझदारी, संयम और सही निर्णय ही नेताओं की साख और लोकतांत्रिक मूल्य को सुरक्षित रख सकते हैं।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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