बाजपुर। राजकीय पॉलिटेक्निक बाजपुर में आयोजित राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के कैंप से जो तस्वीरें सामने आई हैं, उन्होंने शिक्षा जगत और समाज दोनों के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एनएसएस का उद्देश्य विद्यार्थियों में सेवा भावना, समाज के प्रति संवेदनशीलता और जागरूकता जगाना होता है, वहीं यहां छात्रों से जो कार्य कराए जा रहे हैं, उन्होंने पूरे कार्यक्रम की नीयत पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। बताया जा रहा है कि इस कैंप के दौरान छात्र-छात्राओं से भांग के पौधे उखाड़ने का कार्य करवाया गया। जिन पौधों को राज्य सरकार नशा मुक्ति अभियान के तहत नष्ट करने की मुहिम चला रही है, वही पौधे अब एक राजकीय शिक्षण संस्थान की सीमा में उगते दिखाई दिए। तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि छात्र-छात्राओं को समाज सेवा के नाम पर उन्हीं पौधों को जड़ से उखाड़ते हुए लगाया गया है, जो स्वयं कानून के तहत अवैध श्रेणी में आते हैं। यह न केवल संस्था की छवि पर प्रश्न उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि शिक्षण संस्थानों में जिम्मेदारी और निगरानी का स्तर कितना कमजोर हो चुका है।

बाजपुर के सुल्तानपुर पट्टी क्षेत्र में स्थित इस राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज के परिसर से यह पूरा मामला सामने आया है। जहां एक ओर माता-पिता अपने बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने और एक उज्जवल भविष्य की उम्मीद में कॉलेज भेजते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हीं बच्चों को ऐसे कार्यों में लगाया जा रहा है जो शिक्षा और समाज सेवा के नाम पर बिल्कुल अनुचित प्रतीत होते हैं। राष्ट्रीय सेवा योजना का मकसद समाज में जागरूकता, स्वच्छता और सेवा की भावना को बढ़ावा देना है, लेकिन यहां छात्रों से ऐसे कार्य करवाना यह बताता है कि जिम्मेदार अधिकारी खुद इस योजना की वास्तविकता से कितने दूर हैं। एनएसएस के बैनर तले यह सब होना केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि युवाओं की छवि और उनके भविष्य से खिलवाड़ भी है। कॉलेज के चारों ओर सुरक्षा के नाम पर कोई पुख्ता बाउंड्री तक नहीं है, जिससे किसी भी बाहरी तत्व का प्रवेश आसान हो जाता है। ऐसे में कॉलेज परिसर में इस तरह के पौधों का उगना और छात्रों द्वारा उन्हें हटाना, दोनों ही एक गंभीर शिक्षा संकट को दर्शाते हैं।

उत्तराखंड सरकार लंबे समय से नशा मुक्ति अभियान को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है। पुलिस प्रशासन लगातार पहाड़ी इलाकों में जाकर नशीली खेती को नष्ट कर रहा है और इसके विरुद्ध जागरूकता कार्यक्रम चला रहा है। लेकिन जिस तरह बाजपुर के इस सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज में भांग के पौधे खुलेआम उगते पाए गए, वह इस अभियान की सफलता पर सवाल उठाता है। हैरानी की बात यह है कि जब यह संस्थान स्वयं सरकारी नियंत्रण में है, तब इस प्रकार की अनदेखी कैसे हो सकती है? और उससे भी बड़ी बात यह है कि छात्रों को भांग के पौधे उखाड़ने के लिए कहा गया, जबकि इस प्रकार का कार्य किसी पेशेवर एजेंसी या प्रशासनिक दल द्वारा किया जाना चाहिए था। शिक्षा मंत्री और शिक्षा विभाग को इस पूरे मामले का संज्ञान लेना चाहिए, क्योंकि ये तस्वीरें केवल एक कॉलेज की नहीं, बल्कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत बयां कर रही हैं।
इसी तरह का मामला कुछ दिन पहले देहरादून के एक अन्य सरकारी विद्यालय से भी सामने आया था, जहां छात्रों को रातों में मजदूरी जैसे कार्यों में लगाया गया था। यह घटनाएं केवल पेवसंजमक घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह बताती हैं कि राज्य के कई शिक्षण संस्थानों में “सेवा” और “शिक्षा” की परिभाषा को कितनी गलत दिशा में मोड़ा जा रहा है। बाजपुर पॉलिटेक्निक की यह तस्वीरें भी उसी मानसिकता की उपज हैं, जहां छात्र-छात्राओं को समाज सेवा के नाम पर ऐसे कार्यों में धकेला जा रहा है जो उनके सम्मान और शिक्षा दोनों के विरुद्ध हैं। कॉलेज प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वह छात्रों के लिए सुरक्षित और शिक्षणोन्मुख वातावरण तैयार करे, न कि उन्हें नालियां साफ करने और नशीले पौधे उखाड़ने जैसे कामों में लगाए।

वास्तविकता यह है कि इस पूरे प्रकरण ने उत्तराखंड की शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गहरा असर डाला है। जब विद्यार्थी सेवा शिविर में जाते हैं तो उनके मन में यह भावना होती है कि वे समाज के लिए कुछ सार्थक करेंगे। लेकिन जब उनके हाथों से ऐसे कार्य करवाए जाते हैं, जिनसे वे स्वयं असहज महसूस करें, तो यह उनके आत्मविश्वास और नैतिकता दोनों को चोट पहुंचाता है। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को सोचने, समझने और बदलाव लाने के लिए तैयार करना है, न कि उन्हें श्रम और लापरवाही के प्रतीक बना देना। राजकीय पॉलिटेक्निक बाजपुर की यह घटना अब केवल एक कॉलेज का मुद्दा नहीं रही, बल्कि यह इस बात की चेतावनी है कि शिक्षा के नाम पर लापरवाही अब सीमा पार कर चुकी है। यह मामला न केवल जांच का विषय है, बल्कि शिक्षा मंत्री को इस पर तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी संस्थान में इस तरह की गतिविधियां दोहराई न जा सकें।
राजकीय पॉलिटेक्निक बाजपुर की इन तस्वीरों ने यह साबित कर दिया है कि शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता अब केवल नीति स्तर पर नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर है। यदि शिक्षा विभाग और संबंधित अधिकारी अब भी आंख मूंदकर बैठे रहे तो आने वाले वर्षों में ऐसे कई और मामले सामने आएंगे, जो छात्रों के भविष्य और समाज की सोच दोनों को प्रभावित करेंगे। सरकार को चाहिए कि एनएसएस कार्यक्रमों की सख्त निगरानी की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि सेवा के नाम पर छात्र-छात्राओं का शोषण या अनुचित कार्य न हो। शिक्षा के मंदिरों में अगर ऐसी गतिविधियां होती रहेंगी तो आने वाली पीढ़ी का भरोसा संस्थानों से उठ जाएगा। इसलिए यह समय है जब उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था खुद से सवाल पूछे कृ क्या यह वही समाज सेवा है, जिसकी कल्पना गांधीजी और राजीव गांधी जैसे नेताओं ने की थी?



