काशीपुर। शिक्षा और नवाचार के संगम का अद्भुत दृश्य का एक ओंकार ग्लोबल अकैडमी के प्रांगण में उस समय देखने को मिला जब विद्यालय परिसर में विज्ञान और कला का रंगारंग संगम “ज्ञानोत्सव” के रूप में साकार हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत होते ही चारों ओर उत्साह और जोश का ऐसा माहौल बन गया जिसने न केवल विद्यार्थियों बल्कि अभिभावकों और अतिथियों के मन को भी ऊर्जा से भर दिया। मंच पर बच्चों की प्रतिभा का ऐसा अनोखा प्रदर्शन हुआ जिसने यह साबित कर दिया कि नई पीढ़ी न सिर्फ ज्ञान की प्यास रखती है, बल्कि प्रयोगों और विचारों के माध्यम से नवाचार की राह भी बना रही है। विद्यालय के नन्हे वैज्ञानिकों ने अपनी कल्पनाशीलता से ऐसे मॉडल प्रस्तुत किए जिनमें विज्ञान की गहराई और कला की रचनात्मकता दोनों का सुंदर मेल दिखा, और उपस्थित सभी लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट से बच्चों के उत्साह को दोगुना कर दिया।
दूसरी ओर, कार्यक्रम की भव्यता में चार चांद तब लग गए जब काशीपुर विधायक त्रिलोक सिंह चीमा मुख्य अतिथि के रूप में मंच पर पहुँचे। उनके साथ उत्तराखंड एथलेटिक्स चयन संघ समिति के अध्यक्ष विजेंद्र चौधरी, पीसीयू चेयरमैन राम मेहरोत्रा, अर्पित मेहरोत्रा, प्रदेश कांग्रेस महासचिव अनुपम शर्मा समेत कई सम्मानित अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से समारोह को यादगार बना दिया। अतिथियों ने बच्चों की मेहनत और समर्पण की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन विद्यार्थियों में नवाचार, शोध और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देते हैं।
विधायक त्रिलोक सिंह चीमा ने कहा कि आज के समय में हर बच्चा किसी न किसी क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बना रहा है। उन्होंने बच्चों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि शिक्षा और स्वस्थ जीवन दोनों ही समाज और राष्ट्र के निर्माण के लिए आवश्यक हैं, और यही विद्यार्थी आगे चलकर देश का भविष्य तय करेंगे। विज्ञान और रचनात्मकता से भरे इस आयोजन में संवाद के दौरान त्रिलोक सिंह चीमा ने कहा कि आज की दुनिया प्रतिस्पर्धा से भरी है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रत्येक बच्चे में अद्भुत क्षमता होती है और प्रतिस्पर्धा के माध्यम से ही वे अपनी योग्यता साबित करते हैं। उन्होंने कहा कि आवश्यक यह है कि यह प्रतिस्पर्धा स्वस्थ हो ताकि कोई भी बच्चा पीछे रह जाने पर हतोत्साहित न हो, बल्कि अपने लिए एक नया मार्ग तलाश सके।
वहीं, एक ओंकार ग्लोबल अकैडमी के चेयरमैन सुखविंदर सिंह ने कार्यक्रम के पीछे की सोच और ब्लूप्रिंट साझा करते हुए बताया कि इस आयोजन का उद्देश्य शिक्षा को पारंपरिक ढांचे से बाहर निकालकर उसे विविधता और प्रयोग के साथ जोड़ना था। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसमें व्यावहारिकता और नवीनता का समावेश जरूरी है। इसी सोच के तहत “ज्ञानोत्सव” का आयोजन किया गया, जिसमें विद्यार्थियों को अपने विचारों को साकार रूप देने का अवसर मिला।
सुखविंदर सिंह ने आगे कहा कि इस पूरी योजना के पीछे सबसे बड़ी भूमिका शिक्षकों की रही, जिन्होंने एक साधारण विचार को मेहनत और समर्पण से वास्तविकता में बदल दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी देश की प्रगति उसके शिक्षकों की लगन और दृष्टि पर निर्भर करती है, क्योंकि वही आने वाली पीढ़ियों को गढ़ते हैं। बच्चों ने भी अपने प्रोजेक्ट्स के माध्यम से यह दिखाया कि वे शिक्षा को केवल अंकों से नहीं, बल्कि अपने प्रयोगों और सोच से समझना चाहते हैं। कुछ विद्यार्थियों ने प्राचीन गुरुकुल पद्धति को आधुनिक शिक्षा से जोड़ते हुए ऐसे मॉडल प्रस्तुत किए जिनमें यह दिखाया गया कि कैसे पुरानी शिक्षा से मिली नैतिकता और नई तकनीक से मिला नवाचार मिलकर शिक्षा को और प्रभावी बना सकते हैं।
सुखविंदर सिंह ने बातचीत में यह भी कहा कि शिक्षा को समय के साथ विकसित होना चाहिए। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम में एक छात्र द्वारा तैयार किया गया विशेष मॉडल “एजुकेशन नीड्स टू बी चेंज्ड” ने सभी का ध्यान आकर्षित किया, जिसमें यह दर्शाया गया था कि गुरुकुल से लेकर औद्योगिक और आधुनिक शिक्षा तक के विकास में क्या-क्या सीखा जा सकता है और किस प्रकार उसे भविष्य के अनुरूप ढाला जा सकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा प्रणाली को स्थिर नहीं रहना चाहिए, बल्कि समाज की आवश्यकताओं और तकनीकी प्रगति के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने चीन की शिक्षा व्यवस्था का उदाहरण देते हुए कहा कि चीन ने शिक्षा को विविधता और कौशल आधारित दृष्टिकोण से जोड़ा है। वहां बच्चों को पहली कक्षा से ही यह समझाया जाता है कि वे किस क्षेत्र में अधिक सक्षम हैं कृ चाहे वह खेल, कला, तकनीक या किसी अन्य विषय में हो। भारत में भी इस सोच को अपनाने की आवश्यकता है ताकि बच्चे अपनी वास्तविक प्रतिभा को पहचान सकें। उन्होंने कहा कि हमारा समाज अभी भी अंकों और परीक्षाओं के आधार पर सफलता को मापता है, जबकि वास्तविक शिक्षा का मूल्यांकन बच्चे की सृजनशीलता और उसकी कौशलता से होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हर बच्चे की क्षमता अलग होती है, इसलिए एक ही मानक पर सभी का मूल्यांकन अनुचित है।
कार्यक्रम के समापन पर सुखविंदर सिंह ने यह आश्वासन दिया कि एक ओंकार ग्लोबल अकैडमी भविष्य में भी शिक्षा के नए प्रयोगों और विचारों को आगे बढ़ाती रहेगी। उन्होंने कहा कि विद्यालय का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल पुस्तक ज्ञान नहीं देना, बल्कि उन्हें ऐसे अनुभव प्रदान करना है जिससे वे वास्तविक जीवन में आत्मनिर्भर बन सकें। उन्होंने यह भी जोड़ा कि शिक्षा एक निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है, इसलिए विद्यालय हर वर्ष कुछ नया और बेहतर प्रस्तुत करने का प्रयास करेगा। अंत में, सभी अतिथियों और अभिभावकों ने इस आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि “ज्ञानोत्सव” ने काशीपुर में शिक्षा के नए आयाम खोले हैं, और इस तरह के आयोजन समाज में शिक्षा के महत्व को नई दिशा देने का कार्य करते हैं।



