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उर्वशी दत्त बाली के स्नेह से काशीपुर के नन्हे सितारों को मिली नई उड़ान

पचास अनाथ बच्चों के जीवन में उम्मीद की नई किरण, उर्वशी दत्त बाली के नेतृत्व में शहर के लोग बन रहे सहारा, शिक्षा, स्किल और स्नेह से सज रहा मासूम भविष्य।

काशीपुर। शहर का माहौल इन दिनों मानो किसी भावनात्मक बदलाव का साक्षी बन गया है, क्योंकि समाजसेवी उर्वशी दत्त बाली ने अपनी जिंदगी का केंद्र उन 50 बच्चों को बना दिया है, जिन्हें जीवन की शुरुआत ही संघर्षों के बीच करनी पड़ी। कोई माता-पिता दोनों से वंचित है, किसी के पास पिता नहीं हैं, तो कोई अपनी माँ की कमी से जूझ रहा है। काशीपुर के इस हॉस्टल में यह बच्चे बिल्कुल नई राह पर कदम रख रहे हैं और उर्वशी दत्त बाली ने अपने क्लब, किटी पार्टियों और सामाजिक आयोजनों से स्वयं को दूर करते हुए पूरी निष्ठा से इन बच्चों को संभालने, संवारने और उनका भविष्य सुरक्षित बनाने का दायित्व अपने कंधों पर ले लिया है। बच्चों की दिनचर्या, उनका मनोबल, उनकी शिक्षा और उनके कौशल—हर पहलू को वह मातृत्व जैसी संवेदना के साथ दिशा दे रही हैं, जिससे इन बच्चों का मन धीरे-धीरे उस खालीपन से बाहर निकल रहा है, जो अब तक उनके जीवन पर भारी था।

इसी अनुक्रम में आज पापा बेकर्स की ओर से बच्चों के लिए एक विशेष कुकिंग क्लास आयोजित की गई। जब प्रशिक्षकों ने बच्चों से पूछा कि क्या उन्होंने पहले कभी खाना बनाया है, तो उनकी मासूम परन्तु अनुभवी आवाज़ों ने सभी को हैरान कर दिया। बच्चों ने कहा कि मजबूरी में घर पर कई बार अपने छोटे भाई-बहनों के लिए खाना बनाना पड़ा, क्योंकि अक्सर माता-पिता काम पर चले जाते थे या घर में कोई बड़ा नहीं होता था। कुछ बच्चे जो बिल्कुल अकेले हैं, उन्हें तो बहुत छोटी उम्र में ही खाना बनाना, अपने कपड़े संभालना और खुद को सुरक्षित रखना सीखना पड़ा। बच्चों ने दिल छू लेने वाली सच्चाई कहते हुए कहा— “हम यहाँ लड़ाई करने नहीं आए हैं, हम यहाँ अपना जीवन बनाने आए हैं।” इस一वाक्य ने पूरे आयोजन को भावुक कर दिया और यह अहसास कराया कि ये छोटे-छोटे चेहरे कितनी बड़ी कहानियां अपने भीतर छिपाए हुए हैं।

इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए रोटरी क्लब ऑफ कार्बेट काशीपुर के प्रेसिडेंट डॉ. रवि सहोता और अमन सहोता ने बच्चों के स्किल डेवलपमेंट के लिए ₹1 लाख का आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई और आश्वासन दिया कि वे इन बच्चों के साथ आज नहीं बल्कि हर दिन खड़े रहेंगे। दोनों ने कहा कि समाज की ताकत तभी सार्थक है जब वह अपने सबसे कमजोर बच्चों के साथ खड़ा हो, और ये 50 बच्चे भविष्य में किसी भी बच्चे से कम नहीं रहेंगे यदि शहर उन्हें स्नेह के साथ आगे बढ़ने का मौका देता रहे। संवेदना और सहयोग की यह कड़ी तब और मजबूत हुई जब ब्रिगेडियर सुखबीर सिंह की धर्मपत्नी ममता सिंह जब अपनी चार फौजी बहनों के साथ हॉस्टल पहुंचीं। उन्होंने बच्चों के साथ समय बिताते हुए भरोसा दिलाया कि वे अपनी पूरी क्षमता और सामर्थ्य के साथ इन बच्चों की मदद करती रहेंगी। उन्होंने कहा कि फौजी परिवार सिर्फ देश की रक्षा के लिए नहीं जाने जाते, वे समाज के लिए भी उतने ही समर्पित होते हैं और ये बच्चे भी उतने ही सम्मान और अधिकार से भरे हैं जितना किसी सैनिक का परिवार होता है। यह संवेदनशील दृश्य बच्चों के जीवन में विश्वास के नए रंग भरता दिखा।

हॉस्टल की प्रिंसिपल ज्योति राणा और पूरा स्टाफ इन बच्चों के लिए सिर्फ शिक्षक की भूमिका नहीं निभा रहे, बल्कि अभिभावक बनकर उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं। सुरक्षा, अनुशासन, प्यार, मनोबल, आत्मविश्वास—हर क्षेत्र में वे बच्चों को सही दिशा दे रहे हैं ताकि वे अपने अतीत की कठिनाइयों से बाहर आकर अपने भविष्य को मजबूती से थाम सकें। इन प्रयासों में उर्वशी दत्त बाली स्वयं स्किल क्लासेस ले रही हैं, शांतनु चिकारा बच्चों को अंग्रेज़ी बोलना सिखा रहे हैं, USR इंदू समिति के दिव्यांग बच्चे उन्हें विभिन्न कौशलों का प्रशिक्षण दे रहे हैं, जगमोहन बंटी डांस सिखा रहे हैं, पापा बेकर्स कुकिंग क्लासेस दे रहे हैं, रजनी ठाकुर सिलाई की क्लास ले रही हैं, और संजीवनी हॉस्पिटल की टीम फर्स्ट एड का प्रशिक्षण दे रही है। स्कूल के सभी शिक्षक मिलकर बच्चों की पढ़ाई से लेकर उनके व्यवहार, आत्मविश्वास और जीवन मूल्यों तक हर पहलू को मज़बूत कर रहे हैं।

कार्यक्रम के समापन पर उर्वशी दत्त बाली ने अत्यंत संवेदनशीलता के साथ कहा कि इन बच्चों के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता भोजन की नहीं, बल्कि मनुष्य के समय और समर्पण की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा इन सभी बच्चों को पर्याप्त भोजन, रहने की सुविधा और शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है, इसलिए खाने पर खर्च करने की जरूरत नहीं है। जरूरत है—उन्हें अतिरिक्त मार्गदर्शन देने की, उनके कौशल को निखारने की और उन्हें ऐसा वातावरण देने की जिसमें वे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकें। उन्होंने कहा कि यदि लोग अपनी शाम का कुछ हिस्सा इन बच्चों के साथ बिताएँ, उन्हें नई चीजें सिखाएँ, छोटे–छोटे स्किल्स और जीवन उपयोगी कला का अभ्यास कराएँ, तो इनका भविष्य कहीं अधिक मजबूत हो सकता है। उनका कहना था कि केवल सहानुभूति पर्याप्त नहीं है, वास्तविक सहयोग वह है जिसमें समाज अपने अनुभव, ज्ञान और समय को इन बच्चों के विकास के लिए समर्पित करे।

उर्वशी दत्त बाली की यह अपील न केवल बच्चों के लिए थी, बल्कि पूरे समाज के मन को झकझोरने वाली पुकार बन गई। उनकी बातों ने यह एहसास दिलाया कि बदलाव सिर्फ सरकार या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति की नैतिक भूमिका है जो मानवता में विश्वास रखता है। काशीपुर में शुरू हुई यह पहल अब एक अभियान में बदलती जा रही है, जिसका दायरा हर बीतते दिन के साथ और विस्तृत होता जा रहा है। शहर के लोग इन 50 मासूमों के भविष्य को सँवारने के लिए जिस गर्मजोशी, अपनापन और निरंतर सहयोग के साथ सामने आ रहे हैं, वह काशीपुर की सामाजिक चेतना को एक नई परिभाषा दे रहा है। यह प्रयास अब केवल इन बच्चों की कहानी नहीं रहा—यह उस शहर की पहचान बन रहा है, जो संवेदना को कर्म में बदलने का हौसला रखता है और मानवता की रोशनी से अंधेरों को चुनौती देने की क्षमता दिखा रहा है।

रोटरी क्लब ऑफ कार्बेट काशीपुर के प्रेसिडेंट डॉ. रवि सहोता ने इस अवसर पर कहा कि इन 50 बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का काम केवल एक व्यक्ति या संस्था का नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने बताया कि ऐसे बच्चे, जिन्हें परिवार की सुरक्षा और मार्गदर्शन नहीं मिलता, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए हमें मिलकर कदम बढ़ाने होंगे। डॉ. रवि सहोता ने यह स्पष्ट किया कि रोटरी क्लब हमेशा इन बच्चों के साथ खड़ा रहेगा, उन्हें शिक्षा, कौशल विकास और आत्मविश्वास हासिल करने के लिए हर संभव सहायता प्रदान करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि इन बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए केवल आर्थिक मदद ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें समय, मार्गदर्शन, स्नेह और समाज की स्थायी भागीदारी की जरूरत है। उनका मानना है कि समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है जब हम अपने कमजोर बच्चों के लिए परिवार, शिक्षक और मार्गदर्शक का रोल निभाएँ। डॉ. रवि सहोता ने कहा, “काशीपुर के ये 50 बच्चे अब अकेले नहीं हैं,” और हम सब उनके साथ खड़े हैं, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित और प्रेरणादायक बन सके।

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शहर की भीड़भाड़ और बढ़ती बीमारियों के दौर में जब चिकित्सा जगत को नए और भरोसेमंद विकल्पों की तलाश थी, उसी समय काशीपुर से उभरती एक संस्था ने अपनी गुणवत्ता, विशेषज्ञता और इंसानी सेहत के प्रति समर्पण की मिसाल कायम कर दी। एन.एच.-74, मुरादाबाद रोड पर स्थित “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” आज उस भरोसे का नाम बन चुका है, जिसने अपनी प्रतिबद्धता, सेवा और उन्नत चिकित्सा व्यवस्था के साथ लोगों के दिलों में एक अलग स्थान स्थापित किया है। इस संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ इलाज का आधार केवल दवा नहीं, बल्कि रोगी की पूरी जीवनशैली, उसकी भावनाओं और उसके व्यवहार तक को समझकर उपचार उपलब्ध कराया जाता है। संस्था के केंद्र में वर्षों से सेवा कर रहे डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा का अनुभव, उनकी अंतरराष्ट्रीय योग्यता और कार्य के प्रति उनका गहरा समर्पण उन्हें चिकित्सा जगत में एक विशिष्ट पहचान देता है। अपनी अलग सोच और उच्च स्तरीय चिकित्सा व्यवस्था के कारण यह संस्थान न केवल स्थानीय लोगों का विश्वास जीत रहा है, बल्कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले मरीज भी यहाँ भरोसे के साथ उपचार लेने पहुँचते हैं। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” ने NABH Accreditation और ISO 9001:2008 व 9001:2015 प्रमाणपत्र हासिल कर यह साबित कर दिया है कि यहाँ इलाज पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया, गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के साथ किया जाता है। संस्थान की दीवारों पर सजे सैकड़ों प्रमाणपत्र, सम्मान और पुरस्कार इस बात के गवाह हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा ने उपचार को केवल पेशा नहीं, बल्कि मानव सेवा की जिम्मेदारी माना है। यही वजह है कि उन्हें भारतीय चिकित्सा रत्न जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है। रोगियों के प्रति संवेदनशीलता और आधुनिक तकनीकी समझ को मिलाकर जो उपचार मॉडल यहाँ तैयार हुआ है, वह लोगों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है। संस्थान के भीतर मौजूद विस्तृत कंसल्टेशन रूम, मेडिकल फाइलों की सुव्यवस्थित व्यवस्था और अत्याधुनिक निरीक्षण प्रणाली इस बात को स्पष्ट दिखाती है कि यहाँ मरीज को पूर्ण सम्मान और ध्यान के साथ सुना जाता है। पोस्टर में दर्शाए गए दृश्य—जहाँ डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मानित होते दिखाई देते हैं—उनकी निष्ठा और चिकित्सा जगत में उनकी मजबूत प्रतिष्ठा को और मजबूत बनाते हैं। उनकी विदेशों में प्राप्त डिग्रियाँ—बीएचएमएस, एमडी (होम.), डी.आई.एच. होम (लंदन), एम.ए.एच.पी (यूके), डी.एच.एच.एल (यूके), पीएच.डी—स्पष्ट करती हैं कि वे केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिकित्सा अनुसंधान और उपचार के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। काशीपुर जैसे शहर में आधुनिक विचारों और उच्च गुणवत्ता वाले उपचार का ऐसा संयोजन मिलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। संस्था की ऊँची इमारत, सुगम पहुँच और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित परिसर मरीजों को एक शांत, सकारात्मक और उपचार के अनुकूल माहौल प्रदान करता है। इसी माहौल में रोगियों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली वैज्ञानिक होम्योपैथिक औषधियाँ उनके लंबे समय से चले आ रहे दर्द और समस्याओं को जड़ से ठीक करने की क्षमता रखती हैं। उपचार के दौरान रोगी को केवल दवा देना ही उद्देश्य नहीं होता, बल्कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य पुनर्स्थापन पर यहाँ विशेष ध्यान दिया जाता है। यही वह कारण है कि मरीज वर्षों बाद भी इस संस्थान को याद रखते हुए अपने परिवार और परिचितों को यहाँ भेजना पसंद करते हैं। समाज के विभिन्न समूहों से सम्मान प्राप्त करना, राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों द्वारा सराहना मिलना, और बड़े मंचों पर चिकित्सा सेवाओं के लिए सम्मानित होना—ये सभी तस्वीरें इस संस्था की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को और अधिक उजागर करती हैं। पोस्टर में दिखाई देने वाले पुरस्कार न केवल उपलब्धियों का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा लगातार लोगों की सेहत सुधारने और चिकित्सा के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने में जुटे हुए हैं। उनका सरल स्वभाव, रोगियों के प्रति समर्पण और ईमानदारी के साथ सेवा का भाव उन्हें चिकित्सा जगत में एक उल्लेखनीय व्यक्तित्व बनाता है। संपर्क के लिए उपलब्ध नंबर 9897618594, ईमेल drrajneeshhom@hotmail.com और आधिकारिक वेबसाइट www.cureme.org.in संस्थान की पारदर्शिता और सुविधा की नीति को मजबूत बनाते हैं। काशीपुर व आसपास के क्षेत्रों के लिए यह संस्थान विकसित और उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बन चुका है जहाँ लोग बिना किसी डर, संदेह या हिचकिचाहट के पहुँचते हैं। बढ़ते रोगों और बदलती जीवनशैली के समय में इस प्रकार की संस्था का होना पूरा क्षेत्र के लिए बड़ी राहत और उपलब्धि है। आने वाले समय में भी यह संस्था चिकित्सा सेवा के नए आयाम स्थापित करती रहेगी, यही उम्मीद लोगों की जुबान पर साफ झलकती है।
कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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