काशीपुर। बार एसोसिएशन के भीतर बीते कुछ सप्ताहों में जिस तरह अचानक तनाव और गलतफहमियों का घना बादल छाया, उसने न केवल संगठन के माहौल को विचलित किया बल्कि बाहर की दुनिया में भी एक भ्रम की स्थिति पैदा कर दी। बार के कुछ सदस्यों द्वारा मीडिया के सामने जो बयान दिए गए, उन्हें लेकर कार्यकारिणी ने गंभीर एतराज़ जताया और यह माना कि ऐसे वक्तव्य एसोसिएशन की वर्षों पुरानी गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं। इस बार के चुनावी वर्ष में माहौल पहले ही संवेदनशील था और बार काउंसिल ऑफ उत्तराखंड की ओर से आए चुनाव स्थगन संबंधी आदेश ने इस संवेदनशीलता को और तीखा कर दिया। कार्यकारिणी के अनुसार, बाय लॉज़ के तहत हर दो वर्ष में चुनाव होना अनिवार्य है और इसी कड़ी में सारी तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी थीं, लेकिन उत्तराखण्ड बार काउंसिल का निर्देश आने के बाद चुनाव कराने या रोकने को लेकर स्वाभाविक रूप से अनिश्चितता बनी। इसी अनिश्चितता को कुछ सदस्यों ने गलत अर्थों में लेते हुए, कार्यकारिणी के विरुद्ध बयानबाज़ी कर दी, जिससे संगठन के भीतर विश्वास को चोट लगी और इसीलिए आवश्यक हुआ कि कार्यकारिणी खुलकर मीडिया के सामने अपना पक्ष रखे।
उधर, बार एसोसिएशन द्वारा जारी कारण बताओ नोटिसों ने भी माहौल को और गर्माया, हालांकि स्थिति कुछ दिनों बाद तब शांत होती दिखी जब सीनियर अधिवक्ताओं ऋषि अग्रवाल, कश्मीर सिंह, संजय चौधरी, संदीप सहगल और शैलेंद्र मिश्रा ने अपने स्पष्टीकरण भेजे और कार्यकारिणी ने इन्हें स्वीकार कर नोटिस तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिए। कार्यकारिणी का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी को निशाना बनाना नहीं था, बल्कि एसोसिएशन की गरिमा बनाए रखना था। बाकी जिन सदस्यों के नोटिस लंबित हैं, उनके जवाब के बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा। वहीं, आगामी गतिविधियों की रूप रेखा साफ करते हुए बताया गया कि 17 दिसंबर को आम सभा बुलाई गई है, जिसमें चुनाव से जुड़ी सभी परिस्थितियों पर निर्णय लेने के साथ यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि एसोसिएशन की प्रतिष्ठा अक्षुण्ण रहे और बेमतलब के विवादों को खत्म कर सभी सदस्य एक परिवार की तरह साथ खड़े हों। कार्यकारिणी का स्पष्ट मत है कि इस संस्था की पहचान उसकी एकजुटता से है और कोई भी ऐसा व्यवहार जो मर्यादा की सीमा लांघे, संगठन के हित में नहीं हो सकता।
दूसरी ओर, क्रिकेट टूर्नामेंट को लेकर उठे सवालों ने भी विवाद को हवा देने का काम किया। इस आयोजन को लेकर कार्यकारिणी का कहना है कि यह पूरी तरह एक स्वतंत्र संरचना ऑल उत्तराखंड बार एसोसिएशन क्रिकेट टूर्नामेंट कमेटी 2025 के अंतर्गत हो रहा है, जिसे काशीपुर बार एसोसिएशन ने केवल आयोजन की जिम्मेदारी मिलने के बाद गठित किया है। अतुल अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि टूर्नामेंट कमेटी और बार एसोसिएशन दो अलग संस्थाएं हैं और दोनों के वित्तीय लेनदेन पूरी तरह अलग हैं। टूर्नामेंट में होने वाले खर्च टीमों की एंट्री फीस और शहर के गणमान्य नागरिकों तथा व्यवसायियों से मिले सहयोग से पूरे किए जा रहे हैं। एक स्वतंत्र बैंक खाता खोला गया है, जिसे निरपेंद्र चौधरी, जो टूर्नामेंट कमेटी के सचिव भी हैं, संचालन कर रहे हैं। इन सभी बातों के बावजूद कुछ सदस्यों द्वारा लगाए गए “लाखों के गबन” जैसे आरोपों को आयोजकों ने बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निराधार बताया। उनका कहना है कि असलियत तो यह है कि आयोजन घाटे में चल रहा है और टीम दिन रात संघर्ष कर रही है कि काशीपुर की प्रतिष्ठा पर कोई आंच न आए।
उधर आयोजन की तारीखों से जुड़ी स्थिति भी चर्चा का विषय रही क्योंकि 21 दिसंबर से 31 दिसंबर तक चलने वाले इस विशाल टूर्नामेंट के दौरान बार एसोसिएशन के संभावित चुनावी कार्यक्रम के टकराने की आशंका जताई गई। अतुल अग्रवाल ने कहा कि 54 टीमों और लगभग 850 खिलाड़ियों का आगमन, साथ ही उत्तराखंड की 58 बारों के अध्यक्ष, सचिव और प्रतिनिधियों की मौजूदगी को देखते हुए यह महाकाय आयोजन अत्यंत श्रमसाध्य है और इसमें चुनावी गतिविधियों का हस्तक्षेप किसी भी तरह से उचित नहीं होगा। उन्होंने बताया कि संभावित रूप से मुख्य न्यायाधीश उत्तराखंड को उद्घाटन समारोह के लिए आमंत्रित किया गया है, जबकि समापन दिवस पर मुख्यमंत्री की उपस्थिति की संभावना जताई गई है। ऐसे में आयोजन को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए काशीपुर बार की सामूहिक सहभागिता आवश्यक है और पूरी टीम चाहती है कि एसोसिएशन आंतरिक विवादों से ऊपर उठकर इस जिम्मेदारी को सम्मानपूर्वक निभाए।
विवाद की जड़ में बार काउंसिल से आए दो अलग अलग पत्र भी रहे, जिससे भ्रम और बढ़ा। एक पत्र के अनुसार स्थानीय निकायों के चुनाव रोकने को कहा गया था, वहीं दूसरा पत्र चुनाव कराने का निर्देश देता हुआ आया। इसी विरोधाभास ने सवालों को जन्म दिया और कुछ उम्मीदवारों ने मान लिया कि कार्यकारिणी जानबूझकर चुनाव टालना चाहती है, जबकि कार्यकारिणी का दावा है कि ऐसा कोई इरादा था ही नहीं। बजट चस्पा न होने को भी मुद्दा बनाया गया, हालांकि सचिव की ओर से स्पष्ट किया गया कि भ्रम की स्थिति दूर होते ही बजट प्रदर्शित कर दिया गया है। बाय लॉज़ के मुताबिक बजट को समय पर लगना होता है, और देरी सिर्फ इसलिए हुई क्योंकि स्थिति अस्पष्ट थी और किसी भी गलत कदम से विवाद और बढ़ सकता था।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच जब एक बैठक में सभी पक्ष खुले संवाद के लिए बैठे, तब स्पष्ट हुआ कि मामला विरोध का नहीं बल्कि संचार की कमी का था। कई सदस्यों ने माना कि चुनाव और टूर्नामेंट की तैयारी के दबाव ने सूचनाओं के आदान प्रदान को कमजोर किया और अनजाने में गलतफहमियां बढ़ीं। इस दौरान ऋषि अग्रवाल, यशवंत सिंह चौहान, अमित चौहान, संदीप सहल और अन्य सदस्यों ने यह स्वीकार किया कि यदि किसी शब्द या अभिव्यक्ति से कार्यकारिणी या अध्यक्ष को ठेस पहुंची हो तो वे उसे वापस लेते हैं और भविष्य में ऐसी गलती न दोहराने का वचन देते हैं। संदीप सहल ने कहा कि उनका स्वभाव अपशब्दों से कोसों दूर है तथा उनका उद्देश्य केवल व्यवस्था को पारदर्शी रखने का था। वहीं अन्य सदस्यों ने भी कहा कि बार एसोसिएशन एक विशाल परिवार है और मतभेद होना स्वाभाविक है, परंतु मनभेद नहीं होने चाहिए। उन्होंने अध्यक्ष और कार्यकारिणी की सराहना की कि उन्होंने तुरंत मीटिंग बुलाकर विवाद को शांत किया और सुनिश्चित किया कि चुनाव समय पर होंगे, टूर्नामेंट बिना बाधा के संपन्न होगा और एसोसिएशन की गौरवशाली परंपरा कायम रहेगी।
अंततः, जैसे जैसे सभी पक्ष एक मंच पर आए, माहौल फिर से सहज होता दिखा और यह संदेश स्पष्ट हुआ कि काशीपुर बार एसोसिएशन की सबसे बड़ी ताकत उसकी एकता है। वरिष्ठों से लेकर नवागत अधिवक्ताओं तक, सभी ने इस बात को स्वीकारा कि आगे बढ़ने का केवल एक ही रास्ता है संवाद, पारदर्शिता और पारस्परिक सम्मान। 900 से अधिक सदस्यों वाला यह परिवार जब एकजुट होकर चलता है, तो न केवल आंतरिक विवाद शांत होते हैं बल्कि बाहरी दुनिया के सामने भी संगठन का वही मजबूत रूप प्रस्तुत होता है, जिसके लिए यह संस्था पंडित गोविंद लाल पंत के समय से जानी जाती रही है। और अब जब बजट प्रदर्शित हो चुका है, एजीएम की तिथि तय हो गई है, चुनाव से जुड़े निर्णय सदन में होने वाले हैं, और टूर्नामेंट की तैयारियां अंतिम चरण में हैं, तब एसोसिएशन ने यह संदेश दे दिया है कि असहमति हो सकती है, परंतु बार की प्रतिष्ठा सर्वाेच्च है और उसे अक्षुण्ण रखना सभी का साझा दायित्व।



