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उत्तराखंड में सांसदों की आवाज कमजोर, सत्ता गलियारों में बढ़ता संवाद संकट चर्चा में

रामनगर(सुनील कोठारी)। उत्तराखंड की राजनीति के गलियारों में इन दिनों जिस तरह की हलचल और दबे स्वर में उठती चिंताओं ने नया मोड़ लिया है, उसने इस बहस को तेज कर दिया है कि आखिर भारतीय जनता पार्टी के सांसदों की राज्य सरकार तक पहुंच कितनी कम हो चुकी है। हाल के हफ्तों में जिस तरह राज्य से संबंधित मुद्दे सीधे दिल्ली में संसद के अंदर उठने लगे, उससे यह सवाल और गहरा होता दिखाई दे रहा है। आम तौर पर माना जाता था कि प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के कारण संवाद की प्रक्रिया अधिक सहज होगी, लेकिन घटनाओं की श्रृंखला यह बताती है कि मैदान में मौजूद सांसद अपनी ही सरकार तक संदेश पहुँचाने में किसी न किसी स्तर पर कठिनाई महसूस कर रहे हैं। सांसदों की भूमिका राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ अपने क्षेत्रों की आवाज़ दिल्ली तक ले जाने की भी होती है, लेकिन जिस तरह राज्य के अधिकार क्षेत्र वाले विषय अब राष्ट्रीय मंच पर सामने आने लगे हैं, उसने इसे राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में ला दिया है।

पिछले दिनों जब हरिद्वार से भाजपा सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अवैध खनन के गंभीर मसले को लोकसभा में उठाया, तो देहरादून से लेकर दिल्ली तक माहौल गर्म हो गया। सांसद ने सदन में खुलकर कहा कि रात के अंधेरे में भारी वाहन तेजी से गुजर रहे हैं, नियमों की अनदेखी हो रही है, हादसे बढ़ रहे हैं और अवैध खनन बेखौफ जारी है। यह वही मुद्दा था जिसे प्रदेश के अनेक विधायकों ने भी समय-समय पर उठाया था, लेकिन जब यह प्रश्न संसद के पटल पर गूंजा, तो प्रदेश सरकार की भूमिका और संचार तंत्र पर सवाल उठने स्वाभाविक थे। इस घटनाक्रम ने यह संकेत भी दिया कि अगर सांसदों को राज्य स्तर पर संतोषजनक जवाब मिल रहा होता, तो शायद उन्हें दिल्ली में इस मसले को इतनी सख्ती से उठाने की जरूरत न पड़ती। इसी दौरान यह बात भी सामने आई कि जब कभी सांसद जिलों में समीक्षा बैठकें करते हैं, तो कुछ जनप्रतिनिधि औपचारिकता निभाकर चलते बनते हैं, जिससे समस्या समाधान की प्रक्रिया और कमजोर हो जाती है।

इसी सिलसिले में टिहरी झील के आसपास चल रहे निर्माण कार्यों को लेकर उठे विवाद ने तो स्थिति को और उलझा दिया। झील के आसपास हो रहे कार्य एडीबी के सहयोग से चल रहे हैं और स्थानीय लोगों की आपत्तियों तथा पर्यावरण संबंधी चिंताओं को लेकर लंबे समय से सवाल उठ रहे थे। जब शिकायतें सांसदों तक पहुँचीं, तो एक नहीं बल्कि चार सांसदों ने दिल्ली में केंद्र सरकार से इन परियोजनाओं पर स्पष्टीकरण माँगा। आश्चर्य की बात यह रही कि केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री ने लिखित जवाब में स्पष्ट कर दिया कि पूरी योजना राज्य सरकार के कार्यक्षेत्र में आती है और एडीबी के साथ हस्ताक्षर भी राज्य के आग्रह पर हुए थे। यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है कि यदि सांसदों को अपने ही प्रदेश में हो रहे कार्यों की प्राथमिक जानकारी नहीं मिल पा रही, तो यह संचार प्रणाली में किसी गंभीर कमी की ओर इशारा करता है। एक तरफ स्थानीय जनता परेशान है, दूसरी तरफ सांसद दिल्ली में मंच तलाश रहे हैं, जबकि जवाब राज्य सरकार के पास मौजूद हैं।

उधर, पौड़ी क्षेत्र में जंगली जानवरों के बढ़ते हमलों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी और सांसद महेंद्र भट्ट, दोनों ने संसद में इस मुद्दे को उठाते हुए बताया कि हाल ही के महीनों में भालू तथा गुलदार के हमलों ने लोगों का जीवन असुरक्षित कर दिया है। कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, बच्चे स्कूल तक जाने से डर रहे हैं और ग्रामीण शाम ढलते ही घरों में सिमटने को मजबूर हैं। सांसदों ने सदन में यह भी सवाल किया कि आखिर कब तक उत्तराखंड वन विभाग इस स्थिति पर गंभीरता से कदम उठाएगा? पिंजरे, टैंकुलाइज़र जैसी बुनियादी चीज़ों की कमी तक की शिकायत उन्होंने केंद्र के सामने रखी। लेकिन यह स्पष्ट है कि वन्यजीव नियंत्रण और सुरक्षा का पूरा दायरा राज्य सरकार का है। सांसदों द्वारा यह प्रश्न दिल्ली में उठाए जाने से यह संदेश बाहर गया कि उन्हें राज्य स्तर पर समाधान की उम्मीद कम दिखाई दे रही है, या फिर उनकी बात शासन स्तर पर पर्याप्त वजन नहीं पा रही।

इन सभी घटनाओं ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जिसमें यह कहना मुश्किल हो गया है कि पार्टी के भीतर संवाद तंत्र मजबूत है या नहीं। सवाल यह उठ रहा है कि जब पांच लोकसभा सांसद और तीन राज्यसभा सदस्य प्रदेश से जुड़े सीधे मुद्दों को लगातार दिल्ली में उठा रहे हैं, तो क्या यह संकेत नहीं देता कि देहरादून में उनकी आवाज़ वांछित गंभीरता के साथ नहीं सुनी जा रही? यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सांसदों की ओर से पूछे गए अनेक सवाल ऐसे हैं जिन्हें प्रदेश सरकार सरलता से संबोधित कर सकती थी, लेकिन जब जवाब नहीं मिला तो दिल्ली का मंच ही उनके लिए प्रभावी विकल्प बन गया। इस पूरे प्रकरण ने भाजपा की आंतरिक संरचना, विशेषकर शासन और संगठन के बीच सामंजस्य पर कई प्रकार के प्रश्नचिह्न लगाए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संवाद की यह खाई लंबी अवधि में शासन की कार्यक्षमता पर भी असर डाल सकती है।

राजनीतिक हलकों में इस समय यह चर्चा तेजी पकड़ रही है कि सांसदों की चिंता केवल मुद्दों को उठाने की नहीं, बल्कि इस बात की भी है कि जनता के मन में यह संदेश न जाए कि उनकी बात राज्य सरकार तक पहुँच ही नहीं पा रही। प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के बावजूद ऐसी स्थिति पैदा होना कई दृष्टि से असामान्य माना जा रहा है। विपक्ष भी इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर प्रस्तुत कर रहा है कि जब सत्ता के भीतर ही संवाद कमजोर हो, तो आम जनता की समस्याओं का समाधान कैसे होगा? यह भी कहा जा रहा है कि सांसदों द्वारा दिल्ली का रास्ता अपनाना संकेत देता है कि शासन-प्रशासन के स्तर पर किसी न किसी तरह की अनदेखी या उदासीनता पैदा हुई है। हालांकि पार्टी के भीतर इस विषय पर अभी खुलकर कोई टिप्पणी सामने नहीं आई है, लेकिन घटनाओं का क्रम यह तय कर रहा है कि चर्चा व्यापक स्तर पर जारी रहेगी।

कुल मिलाकर, उत्तराखंड की बदलती राजनीतिक तस्वीर यह बताती है कि संवाद की इस जटिलता को अनदेखा नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार और सांसदों के बीच तालमेल मजबूत होना इसलिए आवश्यक है क्योंकि दोनों ही जनता के प्रतिनिधि हैं और उनका उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान करना है। लेकिन लगातार हो रही घटनाओं से यह धारणा बनती जा रही है कि किसी स्तर पर यह समन्वय कमजोर पड़ा है। आने वाले दिनों में यह देखने वाली बात होगी कि पार्टी संगठन और सरकार इस स्थिति को सुधारने के लिए क्या कदम उठाते हैं और क्या सांसदों की आवाज़ को देहरादून में वह महत्व मिलता है जिसकी वे अपेक्षा रखते हैं। यही कारण है कि यह पूरा मुद्दा अभी भी प्रदेश की राजनीति में सुर्खियों में है और इसके समाधान की दिशा में बढ़ाया गया हर कदम आने वाले समय की राजनीतिक स्थिरता और प्रशासनिक दक्षता दोनों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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