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उत्तराखंड में रजिस्ट्री शुल्क दोगुना होने से लोगों में बढ़ी हलचल और चिंता

राजस्व बढ़ोतरी के नाम पर सरकार के इस बड़े फैसले ने आम जनता पर नया आर्थिक बोझ डाला, रजिस्ट्री कराने वालों को अब पहले से कहीं अधिक शुल्क चुकाना पड़ेगा।

देहरादून। राज्य सरकार ने संपत्ति से जुड़े लेनदेन पर लिए जाने वाले पंजीकरण शुल्क को लेकर बड़ा फैसला लेते हुए सरकार ने इसे एक बार फिर संशोधित कर दिया है। अब किसी भी रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी करने पर जनता को पहले के मुकाबले कहीं अधिक रकम जमा करनी होगी। सरकार द्वारा लिए गए नए निर्णय के अनुसार अब हर रजिस्ट्री पर एकमुश्त 50 हजार रुपये शुल्क देना अनिवार्य होगा, जबकि अभी तक यह राशि 25 हजार रुपये निर्धारित थी। अचानक आए इस बदलाव ने आम नागरिकों, खरीदारों तथा संपत्ति निवेश करने वालों के बीच नई चर्चा और हलचल छेड़ दी है, क्योंकि यह सीधा असर उन सभी लोगों पर पड़ेगा जो आने वाले समय में जमीन, मकान या किसी भी प्रकार की संपत्ति खरीदने का मन बनाए हुए हैं। सरकार का तर्क है कि तेजी से बढ़ती आवश्यकताओं, प्रशासनिक खर्चों और राजस्व सुधार की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक कदम है, जिसे लंबे समय से टाला जा रहा था।

दरअसल, राज्य में रजिस्ट्री शुल्क में बदलाव कोई पहली बार नहीं किया गया है। इससे पहले वर्ष 2015 में भी शुल्क में वाढ की गई थी, जब इसे 10 हजार रुपये से बढ़ाकर 25 हजार रुपये कर दिया गया था। लगभग एक दशक बाद शुल्क में फिर से दोगुना वृद्धि किए जाने को नीति-निर्माताओं ने राज्य की वित्तीय ज़रूरतों और बढ़ती राजस्व मांगों के अनुरूप उठाया गया आवश्यक कदम बताया है। बीते वर्षों में जनसंख्या वृद्धि, प्रशासनिक लागत, तकनीकी सुविधाओं का रखरखाव, डिजिटल रजिस्ट्री सिस्टम को मजबूत बनाने और पंजीकरण विभाग के आधुनिकीकरण पर तेजी से खर्च बढ़ा है। सरकार का कहना है कि यदि राजस्व संरचना को समय-समय पर अद्यतन नहीं किया जाएगा, तो व्यवस्थाएं कमजोर होंगी और जनता को पारदर्शी तथा सुरक्षित सेवा प्रदान करना मुश्किल होगा। हालांकि, आम लोगों में इस वृद्धि को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखी जा रही है।

राजधानी देहरादून से लेकर हर जिले तक खरीदारों, बिल्डरों और संपत्ति विशेषज्ञों के बीच इस फैसले पर तर्क-वितर्क शुरू हो गया है। एक वर्ग का कहना है कि बढ़ा हुआ शुल्क संपत्ति खरीदने वालों पर आर्थिक बोझ डालेगा, खासकर मध्यम वर्ग और गरीब तबकों पर इसका असर ज्यादा होगा। कई लोग इसे ऐसे दौर में जनता पर अतिरिक्त भार मान रहे हैं जब पहले से ही महंगाई और बढ़ती ब्याज दरें लोगों की जेब हल्की कर रही हैं। दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ इसे राज्य के वित्तीय ढांचे को मजबूत बनाने की प्रक्रिया में एक साहसिक निर्णय करार दे रहे हैं। उनका कहना है कि रजिस्ट्री प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले संसाधनों, स्टाफ, तकनीकी सुविधाओं और डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम के रखरखाव के लिए अतिरिक्त राजस्व जुटाना जरूरी है, अन्यथा पूरी प्रणाली पर दबाव बढ़ेगा।

इसके साथ ही सरकार के भीतर यह भी माना जा रहा है कि बढ़े हुए शुल्क से न केवल राजस्व में वृद्धि होगी, बल्कि अवैध सौदों, कम मूल्यांकन पर की जाने वाली रजिस्ट्री तथा अन्य अनियमितताओं पर भी अंकुश लगेगा। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि पंजीकरण शुल्क का वास्तविक उद्देश्य रियल एस्टेट लेनदेन को संगठित, पारदर्शी और पूर्ण रूप से दस्तावेजित बनाना है। ऐसे में शुल्क वृद्धि से विभाग को बेहतर प्रबंधन और सुचारु व्यवस्था बनाए रखने में मदद मिलेगी। हालांकि, यह भी सच है कि अचानक दोगुनी वृद्धि से आम जनता को तत्काल असर झेलना पड़ेगा और कई लोग अपने खरीद-बिक्री के निर्णय कुछ समय के लिए टाल भी सकते हैं। विशेषज्ञों का आकलन है कि शुरुआती महीनों में लेनदेन की गति थोड़ी धीमी पड़ सकती है, लेकिन धीरे-धीरे बाजार नए शुल्क के अनुरूप संतुलित हो जाएगा।

राज्य सरकार के इस फैसले से यह स्पष्ट संकेत गया है कि आने वाले समय में वित्तीय ढांचा और भी व्यवस्थित और अनुशासित करने की आवश्यकता है। विभिन्न विकास परियोजनाओं, सार्वजनिक सुविधाओं, बुनियादी ढांचे के विस्तार और राजस्व आधार बढ़ाने के लिए ऐसे निर्णय अनिवार्य हो सकते हैं। हालांकि, यह भी जरूरी है कि सरकार आम लोगों की चिंताओं को समझे और यदि आवश्यकता पड़े तो गरीब तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए रियायतों या विशेष प्रावधानों पर भी विचार करे। राज्य का रियल एस्टेट सेक्टर इस निर्णय को कैसे आत्मसात करेगा, यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा, लेकिन इतना तय है कि इस नीतिगत बदलाव ने प्रदेश में नई बहस को जन्म दे दिया है और संपत्ति पंजीकरण से जुड़ी प्रक्रियाओं पर जनमानस की नजरें टिक गई हैं।

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