देहरादुन। उत्तराखंड में विधानसभा परिसीमन को लेकर अब राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है। पहाड़ के क्षेत्रों में संभावित सीटों की कमी ने राज्य की राजनीति में चिंता की लहर पैदा कर दी है। विभिन्न मीडिया चौनल और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर परिसीमन को लेकर रिपोर्टें लगातार चर्चा में हैं, जिसमें यह बताया जा रहा है कि अगले परिसीमन में पहाड़ की आवाज़ कमजोर हो सकती है। अल्मोड़ा और पौड़ी जैसे जिलों में विधानसभा सीटों के कम होने का खतरा सबसे अधिक है, और यदि यह सच हुआ तो पहाड़ के नेताओं के राजनीतिक करियर पर भी बड़ा असर पड़ेगा। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर सीटों के वितरण में बदलाव पहाड़ की राजनीतिक भूमिका को सीमित कर देगा।
उत्तराखंड में इस समय परिसीमन को लेकर एक अजीब तरह का डर व्याप्त है। कई जगह इसे लेकर अफवाहें और सनसनीखेज दावे आम हो रहे हैं, लेकिन वास्तविकता में यह संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसे नीतिगत निर्णय और जनसंख्या आंकड़े निर्धारित करते हैं। पिछले परिसीमन ने भी पहाड़ की राजनीति को प्रभावित किया था। 2002 और 2007 के विधानसभा चुनावों में कई पहाड़ी विधानसभा सीटें कट गईं, जिनमें कनाले छीना, कांडा, भिकियासेण्ड, थैलीसेण्ड और वीरो खाल जैसे क्षेत्र शामिल थे। इन सीटों के कटने से न केवल स्थानीय नेतृत्व कमजोर हुआ, बल्कि क्षेत्रीय दलों जैसे उत्तराखंड क्रांति दल की जड़ें भी प्रभावित हुईं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अगला परिसीमन भी केवल जनसंख्या के आधार पर होता है, तो पहाड़ी विधानसभा सीटों में भारी कमी आ सकती है।
उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में जनसंख्या वृद्धि दर मैदानी जिलों की तुलना में लगातार कम रही है। 2001 से 2011 तक आंकड़ों में देखा गया कि पहाड़ में जनसंख्या वृद्धि केवल 3.25 प्रतिशत रही, जबकि मैदान में यह दर 33.69 प्रतिशत तक थी। इसका मतलब यह हुआ कि अगर यही रुझान जारी रहा तो भविष्य में पहाड़ की आबादी राज्य की कुल आबादी का केवल एक तिहाई रह जाएगी। विधानसभा में प्रतिनिधित्व जनसंख्या पर आधारित होता है, इसलिए स्पष्ट है कि पहाड़ की सीटें घट जाएंगी। यह स्थिति न केवल क्षेत्रीय राजनीति को कमजोर करेगी, बल्कि पहाड़ से जुड़े स्थानीय मुद्दे भी राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक चर्चाओं से दूर हो जाएंगे।
राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि हाल के वर्षों में पहाड़ के नेताओं का ध्यान लगातार मैदान की राजनीति की ओर बढ़ रहा है। कई बार देखा गया कि नेता पहाड़ से चुनाव जीतकर भी मैदानी क्षेत्रों में अपने घर और राजनीतिक केंद्र बनाए रखते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि स्थानीय मुद्दों की ओर उनका ध्यान कम हो जाता है। उदाहरण के लिए, चौकुटिया या टिहरी जैसे ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति की देखभाल कम होती है, जबकि विधायक अपने मैदानी क्षेत्र के विकास पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। इससे पहाड़ की जनता को यह महसूस होता है कि उनकी समस्याओं का समाधान विधानसभा में नहीं हो रहा।
अल्मोड़ा और पौड़ी जिलों में अगले परिसीमन में विधानसभा सीटों के कम होने का खतरा विशेष रूप से गंभीर माना जा रहा है। इन दोनों जिलों में 2001 और 2011 की जनसंख्या वृद्धि ऋणात्मक रही है, और इसके बाद कोई नई जनगणना नहीं हुई। यदि अगली जनगणना में यही रुझान कायम रहा और परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो इन जिलों की विधानसभा सीटें लगभग निश्चित रूप से कम हो जाएंगी। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इस प्रक्रिया का असर अन्य पहाड़ी विधानसभा सीटों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि जनसंख्या वितरण के आधार पर पूरे पहाड़ी क्षेत्र में सीटों का अनुपात घटेगा।
पिछले परिसीमन के उदाहरणों से स्पष्ट है कि ग्रामीण इलाकों के मुद्दे शहरी राजनीति में दब गए हैं। मुक्तेश्वर और धारी जैसे इलाकों में ग्रामीण समस्याओं जैसे ग्राम पंचायत, जल स्रोत और जंगलों पर हक क़ानून जैसी समस्याएं शहरी कस्बों के मुद्दों, जैसे स्मार्ट सिटी विकास और धार्मिक कार्यक्रमों के बीच दब गई हैं। गढ़वाल क्षेत्र में भी ग्रामीण मुद्दे शहरी राजनीतिक एजेंडा में शामिल नहीं हो पाए हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि पहाड़ी क्षेत्र की जरूरतें विधानसभा और राज्य स्तरीय राजनीतिक मंचों पर नजरअंदाज हो रही हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले दो विधानसभा चुनावों में यह स्पष्ट रूप से देखा गया कि पहाड़ी क्षेत्रीय मुद्दों की राजनीति धीरे-धीरे राष्ट्रीय मुद्दों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की राजनीति में बदल गई है। लोकसभा चुनावों में उत्तराखंड के लोगों ने अधिकतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही वोट दिया, जिससे राज्य के आठ प्रतिनिधियों की व्यक्तिगत भूमिका और पहाड़ी मुद्दों की आवाज़ कम हो गई। आज उत्तराखंड में चुनावों में मुख्य रूप से चेहरों की राजनीति और राष्ट्रीय नेतृत्व का प्रभाव ज्यादा नजर आता है, बजाय कि स्थानीय पहाड़ी मुद्दों के।
पहाड़ी विधानसभा सीटों की कमी से राज्य की राजनीति पर गहरा असर पड़ेगा। अगर अल्मोड़ा और पौड़ी जैसी सीटें कट गईं, तो पहाड़ का प्रतिनिधित्व विधानसभा में घट जाएगा। इससे क्षेत्रीय नेताओं की राजनीतिक संभावनाएं सीमित होंगी और पहाड़ के मुद्दे धीरे-धीरे गायब हो जाएंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल राजनीतिक बदलाव नहीं बल्कि पहाड़ी संस्कृति और जनसंख्या की राजनीति पर भी असर डाल सकता है। यदि पहाड़ के नेता अपने क्षेत्र की आवाज़ को संरक्षित नहीं करेंगे, तो भविष्य में मैदान के नेता पहाड़ के स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता नहीं देंगे।
परिसीमन आयोग के सामने पहाड़ी नेताओं को अपनी स्थिति मजबूती से प्रस्तुत करना आवश्यक होगा। आयोग का निर्णय केवल जनसंख्या आंकड़ों पर आधारित होता है, लेकिन स्थानीय नेताओं और समुदाय की सक्रिय भागीदारी से पहाड़ की विधानसभा सीटों की रक्षा संभव है। राजनीतिक कार्यकर्ता और क्षेत्रीय दल इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उनके प्रयासों से आयोग को यह संदेश पहुंचाया जा सकता है कि पहाड़ी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व राज्य की राजनीतिक संरचना में आवश्यक है और इसे घटाना राज्य की संवेदनशील राजनीति के लिए हानिकारक होगा।
विधानसभा में पहाड़ का प्रतिनिधित्व केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। अगर पहाड़ की सीटें घटती हैं, तो राज्य के विकास और स्थानीय मुद्दों की आवाज़ कमजोर हो जाएगी। जल, जंगल, जमीन और पारंपरिक खेती जैसे विषय विधानसभा में कम ध्यान पाएंगे। इससे ग्रामीण इलाकों के विकास और स्थानीय जनता की समस्याओं का समाधान प्रभावित होगा। पहाड़ी नेताओं को यह समझना होगा कि विधानसभा में सीटों का घटाव केवल संख्यात्मक कमी नहीं है, बल्कि यह उनकी राजनीतिक और सामाजिक जिम्मेदारी को भी चुनौती देगा।
अंततः उत्तराखंड में परिसीमन केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक दिशा और पहाड़ की पहचान के लिए निर्णायक मोड़ है। अगर स्थानीय नेता और जनता सक्रिय नहीं हुए, तो पहाड़ी मुद्दे धीरे-धीरे शहरी और राष्ट्रीय राजनीति में डूब जाएंगे। अल्मोड़ा और पौड़ी जैसी सीटों के संभावित नुकसान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य में भविष्य की राजनीति में पहाड़ का प्रभाव कम होने वाला है। विधानसभा में पहाड़ की आवाज़ को बनाए रखना, स्थानीय नेताओं और जनता की साझा जिम्मेदारी है।
यदि पहाड़ी क्षेत्र की विधानसभा सीटें सुरक्षित नहीं रही, तो इसका असर न केवल राजनीतिक नेतृत्व पर होगा बल्कि पहाड़ी समुदाय के जीवन और पहाड़ी राजनीति की परंपरा पर भी पड़ेगा। स्थानीय नेताओं को क्षेत्रीय जनसंख्या, विकास और संस्कृति के मुद्दों को प्रमुखता देने की जरूरत है। इसके अलावा, जनता को भी अपनी राजनीतिक समझ और सक्रियता के साथ इस प्रक्रिया में भाग लेना होगा। तभी पहाड़ की विधानसभा सीटें और उनकी राजनीतिक आवाज़ को कायम रखा जा सकता है।
इस प्रकार, उत्तराखंड में आगामी परिसीमन और विधानसभा सीटों के वितरण पर नजर रखनी बेहद जरूरी है। अल्मोड़ा और पौड़ी जैसे जिलों में संभावित कमी से पहाड़ी राजनीति की नींव कमजोर हो सकती है। अगर पहाड़ की सीटें घटती हैं, तो विधानसभा में स्थानीय मुद्दों की आवाज़ कम हो जाएगी। इसलिए जरूरी है कि राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व मिलकर इस चुनौती का सामना करे। केवल तभी पहाड़ की राजनीति बच सकती है और विधानसभा में पहाड़ की पहचान कायम रह सकती है।



