रामनगर(सुनील कोठारी)।उत्तराखंड में कांग्रेस का संगठन सृजन अभियान लगातार चर्चाओं में बना हुआ है, लेकिन तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद यह पहल अभी भी धरातल पर उतरने में नाकाम दिखाई दे रही है। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व ने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने के उद्देश्य से हर जिले में ऑब्जर्वर्स भेजे थे, जिन्होंने कई दौर की बैठकों में स्थानीय नेताओं से संवाद किया और संगठन के पुनर्गठन को लेकर सुझाव जुटाए। पार्टी की ओर से दावा किया गया था कि दीपावली से पहले नए जिलाध्यक्षों की घोषणा कर दी जाएगी और इसके लिए ऑब्जर्वर्स की रिपोर्ट को ही सबसे अहम आधार बनाया जाएगा। लेकिन अब दीपावली बीत चुकी है और जिलाध्यक्षों के नामों को लेकर स्थिति पहले से अधिक उलझी हुई है। यह देरी पार्टी के भीतर ही संशय और असंतोष का कारण बन रही है, जिससे स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि कांग्रेस की रणनीतिक योजनाएं फिर एक बार आपसी खींचतान में फंस गई हैं।
जहां कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व चाहता है कि संगठनात्मक ढांचा मजबूत कर पार्टी को जमीनी स्तर पर सशक्त किया जाए, वहीं राज्य इकाई में आपसी मतभेद और गुटबाजी इस मिशन को कमजोर कर रहे हैं। पार्टी की सोच थी कि जिलों की कमान ऐसे कार्यकर्ताओं को सौंपी जाएगी जो सक्रिय, लोकप्रिय और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य के अनुरूप हों। लेकिन एक बार फिर वही पुरानी समस्या सिर उठा रही है कृ गुटबाजी। कई जिलों में नेताओं के बीच इतनी तीखी धड़ेबाजी है कि जिलाध्यक्षों की घोषणा तक को लेकर मतैक्य बन नहीं पा रहा है। पार्टी के भीतर यह अंदरूनी खींचतान अब इतनी गहरी हो चुकी है कि दिल्ली तक इसकी गूंज सुनाई दे रही है। विशेष रूप से पिथौरागढ़ और उधम सिंह नगर जैसे दो महत्वपूर्ण जिलों में स्थिति काफी पेचीदा बन चुकी है, जिसके कारण संगठन सृजन की प्रक्रिया अधर में लटक गई है।
जब इस अभियान की शुरुआत हुई थी, तब उत्तराखंड कांग्रेस की प्रभारी कुमारी सैलजा ने यह स्पष्ट कहा था कि हर जिले में संगठनात्मक रूप से सक्षम और मेहनती लोगों को अवसर दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा था कि जो वर्तमान जिलाध्यक्ष अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें बरकरार रखा जा सकता है, जबकि कुछ जिलों में बदलाव लाना आवश्यक होगा ताकि संगठन में नई ऊर्जा का संचार हो सके। कुमारी सैलजा ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व राहुल गांधी और प्रदेश अध्यक्ष कार्तिकेय के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा था कि यह नया प्रयोग संगठन में नई सोच और जोश लेकर आएगा। लेकिन अब जब नियुक्तियों की बात सामने आई है, तो इन वादों और वास्तविकता के बीच गहरा अंतर दिखाई देने लगा है। सुधार की मंशा तो दिखी, मगर उसे व्यवहार में बदलने की राह जटिल होती जा रही है।
उधम सिंह नगर में स्थिति सबसे ज्यादा उलझी हुई मानी जा रही है, जहां पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेद खुलकर सामने आ चुके हैं। सूत्रों के अनुसार नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य और वरिष्ठ विधायक तिलक राज बीहड़ के बीच जिले के अध्यक्ष पद को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है। दोनों ही अपने-अपने समर्थकों को यह पद दिलाने के लिए जोर लगा रहे हैं और यही वजह है कि किसी एक नाम पर मुहर नहीं लग पा रही। वहीं संगठन का एक अन्य गुट यह चाहता है कि उधम सिंह नगर जैसे बहु-सांस्कृतिक जिले में किसी बंगाली समुदाय से जुड़े नेता को यह जिम्मेदारी दी जाए, जिससे स्थानीय समीकरणों को भी साधा जा सके। इन सबके चलते यह मामला अब सीधा दिल्ली तक पहुंच चुका है, और निर्णायक फैसला फिलहाल अटका हुआ है।
पिथौरागढ़ में भी हालात कम जटिल नहीं हैं। मौजूदा जिलाध्यक्ष अंजुलुंडी पहले से ही इस पद के दावेदार बने हुए हैं, लेकिन उनके साथ-साथ छह और नाम भी इस दौड़ में हैं। कहा जा रहा है कि विधायक मयूक मेहर ने यहां अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए कुछ नामों पर वीटो लगाया हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि मयूक मेहर ने पहले ही सार्वजनिक रूप से कहा था कि जब तक करण मेहरा प्रदेश अध्यक्ष रहेंगे, तब तक वे संगठन की गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे। बावजूद इसके, उनकी मौजूदगी और प्रभाव इस चयन प्रक्रिया पर असर डाल रहा है। मौजूदा संगठन और मयूक मेहर के बीच तनाव की यह स्थिति कांग्रेस के लिए नई सिरदर्दी बन गई है, जिसने पिथौरागढ़ में नियुक्ति प्रक्रिया को रोक रखा है।
इन दोनों जिलों में विवाद के कारण प्रदेश के अन्य जिलों में भी नियुक्तियों की घोषणा टलती जा रही है। अब तक जो प्रक्रिया दीपावली से पहले पूरी होनी थी, वह अनिश्चितता के घेरे में आ चुकी है। कांग्रेस एक ओर आगामी चुनावों की तैयारियों में तेजी लाने की बात कर रही है, तो दूसरी ओर उसका संगठनात्मक ढांचा ही असमंजस में फंसा हुआ है। यह विरोधाभास पार्टी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर कांग्रेस इसी तरह गुटबाजी और देरी में उलझी रही, तो आने वाले चुनावों में इसका नुकसान उसे सीधा झेलना पड़ सकता है।
अंततः, यह स्पष्ट हो गया है कि संगठन सृजन का सपना फिलहाल अधूरा है। कांग्रेस जिस एकजुटता और नए जोश की बात कर रही थी, वह आपसी टकरावों और असहमति के बोझ तले दबती नजर आ रही है। कुमारी सैलजा और प्रदेश नेतृत्व की प्रतिबद्धता के बावजूद जमीनी हकीकत यही है कि जिलाध्यक्षों की घोषणा कब होगी, यह अभी भी अनिश्चित है। पार्टी के भीतर यह ठहराव न केवल उसकी संगठनात्मक क्षमता को प्रभावित कर रहा है, बल्कि कार्यकर्ताओं के उत्साह पर भी सवाल खड़े कर रहा है। उत्तराखंड में कांग्रेस का यह हाल दिखाता है कि जमीनी मजबूती के दावे और वास्तविक तैयारी के बीच अभी भी लंबी दूरी बाकी है, और अगर जल्द ही समाधान नहीं निकला तो यह संकट आने वाले दिनों में और गहराने वाला है।



