रामनगर। राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के बाद अब उत्तराखंड की राजनीति का एक और दिलचस्प अध्याय शुरू होने जा रहा है। इस बार राजनीतिक दलों को सीधे जनता के बीच नहीं जाना है, बल्कि अब खेल सिमट गया है सदस्यों की गणना और समर्थन साधने तक। जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख के चुनाव को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग ने अपनी तैयारियों का आगाज़ कर दिया है। यह चुनाव सीधे आम लोगों द्वारा नहीं लड़ा जाता, बल्कि चुने हुए पंचायत प्रतिनिधियों के बीच शक्ति प्रदर्शन के रूप में उभरता है। इसमें जनता के बजाय वही सदस्य वोट देते हैं जिन्हें पहले ही जनता ने जिला या क्षेत्र पंचायत सदस्य के रूप में निर्वाचित किया है। यह प्रणाली ‘एकल संक्रमणीय मत पद्धति’ पर आधारित होती है, जिसे राष्ट्रपति चुनाव की तरह जटिल और गणनात्मक माना जाता है। ऐसे में हर सदस्य का समर्थन किसी भी प्रत्याशी की किस्मत का फैसला कर सकता है।
प्रक्रिया की तकनीकी जटिलता और राजनीतिक रणनीतियों की कसौटी पर देखा जाए तो यह चुनाव महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि असली सियासी परीक्षा होती है। क्योंकि जिला पंचायत अध्यक्ष या ब्लॉक प्रमुख की कुर्सी पर बैठने का सपना वही देख सकता है जो पहले से निर्वाचित सदस्य हो। अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी उन्हीं के बीच होती है जिन्हें जनता पहले ही बतौर सदस्य चुन चुकी होती है। इसके बाद प्रत्येक निर्वाचित सदस्य को मतपत्र दिया जाता है, जिसमें विभिन्न प्रत्याशियों के नाम होते हैं। सदस्य अपने पसंदीदा प्रत्याशी के नाम के सामने मोहर लगाते हैं और मतपत्र जमा करते हैं। यह चुनाव बहुमत से नहीं बल्कि वरीयता के आधार पर होता है, जहां अगर पहले वरीयता पर कोई प्रत्याशी बहुमत नहीं हासिल कर पाता तो अन्य प्रत्याशियों के मत क्रमशः स्थानांतरित होते जाते हैं, और अंत में सबसे अधिक समर्थन पाने वाला प्रत्याशी जीत का ताज पहनता है।
फिलहाल राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख पदों के लिए आरक्षण सूची जारी कर दी गई है। अब अगली कड़ी में आयोग चुनाव की अधिसूचना जारी करेगा, जिसके बाद नामांकन की प्रक्रिया शुरू होगी और फिर मतदान की तिथि तय की जाएगी। इस मतदान में केवल वही सदस्य भाग लेंगे जो जिला और क्षेत्र पंचायत चुनावों में विजयी होकर आए हैं। इस प्रकार यह चुनाव मैदान भले सीमित हो, लेकिन संघर्ष उससे कहीं अधिक तीखा और रणनीति-प्रधान होता है। एक-एक मत की अहमियत इतनी अधिक हो जाती है कि कई बार छोटी-छोटी गणनाएं और समीकरण किसी बड़े दल की उम्मीदों को पलट सकते हैं।
राजनीतिक दलों की नज़रें इस समय पूरी तरह निर्दलीयों पर टिकी हैं। राज्य के 12 जिलों में 385 जिला पंचायत सदस्य निर्वाचित हुए हैं, जिनमें सबसे अधिक संख्या में सदस्य भारतीय जनता पार्टी के समर्थन वाले हैं। कांग्रेस ने भी पूरे चुनावी मैदान में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, लेकिन कई क्षेत्रों में निर्दलीयों ने बाज़ी मार ली है। यही कारण है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दल अब निर्दलीयों को अपने पक्ष में लाने के लिए जोड़-तोड़ की राजनीति में जुटे हुए हैं। इन प्रयासों में वचन, वर्चस्व और वज्र जैसे सभी राजनीतिक हथियारों का प्रयोग देखा जा सकता है, क्योंकि जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी महज़ एक पद नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सियासत में भविष्य की गारंटी मानी जाती है।
उत्तराखंड की पंचायत राजनीति में यह चुनाव अक्सर बाहुबल और धनबल के प्रदर्शन के तौर पर देखा जाता रहा है। सत्ताधारी दलों के लिए यह चुनाव ज़मीनी पकड़ को दर्शाने का माध्यम होता है, जबकि विपक्षी पार्टियों के लिए यह ताकत दिखाने का सबसे मुफ़ीद मौका होता है। यही वजह है कि अध्यक्ष पद के लिए सदस्यों की खरीद-फरोख्त की चर्चा हर बार तेज हो जाती है। आरोप-प्रत्यारोप, गुप्त बैठकों, लॉबीइंग और व्यक्तिगत वादों की राजनीतिक बिसात इस चुनाव में सबसे अधिक दिखाई देती है। मतगणना के दिन तक यह साफ नहीं हो पाता कि बाज़ी किसके हाथ में जाएगी, क्योंकि अंतिम समय तक समीकरण बदलते रहते हैं।
दूसरी ओर राज्य निर्वाचन आयोग की ज़िम्मेदारी भी कम नहीं है। निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराना, मतगणना की गोपनीयता बनाए रखना और पारदर्शिता सुनिश्चित करना, इन सभी पहलुओं पर आयोग की गंभीर नजर है। इस बार आयोग का प्रयास है कि चुनावी प्रक्रिया को बिना किसी विवाद और रुकावट के संपन्न कराया जाए। हालांकि यह कितना संभव हो पाएगा, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। फिलहाल उत्तराखंड की पंचायत राजनीति का यह अगला अध्याय ना केवल रोचक है, बल्कि सियासी गणित और रणनीतिक चातुर्य का असली मैदान भी साबित होने वाला है।



