उत्तराखंड(सुनील कोठारी)। राजनीति ने बिते सप्ताह सिर्फ़ बयानों तक सीमित रहकर नहीं, बल्कि शासन की दिशा और अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सांसद अजय भट्ट के विवादित बयान ने एक बार फिर राज्य को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है। इस बीच, मनरेगा जैसे महत्वपूर्ण जीवनरेखा योजनाओं में हो रहे बदलाव ने राज्य के गरीब ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। अधिकारियों की बढ़ती ताक़त और जनप्रतिनिधियों की बेबसी इस हफ्ते खुलेआम दिखाई दी। राज्यपाल कार्यालय से लौटे बिल और आगामी 2027 के चुनाव की आहट ये संकेत दे रहे हैं कि उत्तराखंड की राजनीति अब सतह से कहीं अधिक जटिल और गंभीर खेल खेल रही है। अजय भट्ट का हालिया वायरल वीडियो, जिसमें उन्होंने मनरेगा संशोधन बिल पर चर्चा करते हुए अजीब और हास्यास्पद बातें कही, पूरे सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। यह वीडियो केवल उनके भाषण का छोटा अंश है, जो उनके विवादित बयानों की लंबी फेहरिस्त में एक और उदाहरण के रूप में सामने आया है।
मनरेगा में हुए बदलावों का असर सीधे तौर पर राज्य की पहाड़ी आबादी पर पड़ेगा। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आजीविका सुनिश्चित करना है। परंतु, अब केंद्र सरकार तय करेगी कि किस राज्य को कितनी राशि दी जाएगी, जबकि पहले यह निर्णय राज्य सरकार और जिलों के स्तर पर होता था। इसके अलावा, योजना में केंद्र और राज्य का योगदान 60-40 के अनुपात में बदल गया है, जबकि पहले यह अनुपात 90-10 का था। उत्तराखंड में इस बदलाव के बावजूद अभी भी वास्तविक अनुपात पुराना ही है। राज्य में मनरेगा का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यहाँ के गरीब ग्रामीण रोजगार के साधनों की कमी के चलते इस योजना पर पूरी तरह निर्भर रहते हैं। यह योजना ग्रामीण युवाओं को महानगरों में कठिन और शोषणपूर्ण काम से बचाकर घर लौटने का अवसर भी देती रही है।
सांसद अजय भट्ट ने संसद में मनरेगा संशोधन बिल पर अपने भाषण में जो बातें कही, वे केवल हास्यास्पद नहीं, बल्कि ग्रामीण जनता की वास्तविक समस्याओं से पूरी तरह अलग हैं। उन्होंने यह दावा किया कि कुछ प्राकृतिक तत्व और जड़ी-बूटियाँ स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को ठीक कर सकती हैं। इस तरह के बयान न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गलत हैं, बल्कि यह दर्शाते हैं कि सांसद वास्तविक ग्रामीण मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय हास्य और अजीब कल्पनाओं में व्यस्त रहते हैं। जबकि राज्य में ग्रामीण जनता हर रोज़ जंगली जानवरों, पानी की कमी और खेती के कठिन कार्यों से जूझ रही है, सांसद संसद में ठहाके लगा रहे हैं।
राज्य में अधिकारी और जनप्रतिनिधि दोनों ही कार्यशैली में असंतुलित दिख रहे हैं। कभी सत्ता पक्ष के विधायक आपस में भिड़ रहे हैं, तो कहीं कैबिनेट मंत्री सड़क पर चार घंटे तक विवाद में लगे रहते हैं। अधिकारियों की यह दबंगई और विभागीय स्तर पर अनियमित कार्यवाही राज्य के सुचारु शासन के लिए गंभीर चुनौती पेश कर रही है। यह स्थिति केवल सचिवालय या विभागीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य प्रशासनिक तंत्र में दिखाई देती है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या अधिकारियों की कार्यशैली जिम्मेदार है या राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरी इसका कारण है।
भाजपा सरकार ने इस हफ्ते उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता और जबरन धर्मांतरण रोक कानून लागू करवाने का प्रयास किया, लेकिन राज्यपाल कार्यालय से लौटे बिल इस प्रयास को रोकते दिख रहे हैं। राज्यपाल केंद्र के एजेंट माने जाते हैं और जब केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार होती है, तो यह प्रक्रिया अक्सर राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन जाती है। इसके पीछे उद्देश्य स्पष्ट है कि आगामी विधानसभा चुनाव में यह कानून और इससे जुड़ा राजनीतिक संदेश जनता के दिमाग में बना रहे। भाजपा की रणनीति यह भी दिखाती है कि राजनीतिक हितों के लिए शासन और कानून के क्रियान्वयन का इस्तेमाल किया जा रहा है।
राज्य में मनरेगा योजना के संशोधन ने ग्राम पंचायतों की भागीदारी को कमजोर कर दिया है और केंद्र के अधिकारियों का दखल बढ़ा दिया है। इससे ग्रामीण जनता के लिए योजना का लाभ कम हो सकता है। मनरेगा जैसी योजनाओं का मुख्य उद्देश्य गरीब और कमजोर वर्गों को रोजगार और आजीविका सुनिश्चित करना है, लेकिन संशोधनों के कारण यह मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। उत्तराखंड में गरीब जनता के लिए मनरेगा अब भी जीवनरेखा का काम करती है, परंतु बदलाव और राजनीतिक हस्तक्षेप इसे कमजोर करने का खतरा पैदा कर रहे हैं।
उत्तराखंड के अधिकारी कई मामलों में अति सक्रिय नहीं दिख रहे हैं। गढ़ी डाकरा क्षेत्र में सिंचाई विभाग के अधिकारी अतिक्रमण हटाने के लिए पहुंचे, तो उनका सामना कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी से हुआ। दोनों के बीच सवाल-जवाब और बहसें घंटों चलीं। इसी तरह, राजधानी देहरादून में भाजपा के दो विधायक आपस में निर्माण को लेकर भिड़ते रहे। अधिकारी कभी एक विधायक को सही मानते हैं, तो दूसरे को लापरवाह दिखाते हैं। यह टालमटोल रवैया राज्य प्रशासन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की कमी को स्पष्ट करता है।
भाजपा सरकार लगातार आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी है। चुनावी रणनीतियों के तहत कानून और योजनाओं का समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा रहा है। समान नागरिक संहिता और जबरन धर्मांतरण रोक कानून जैसे विधेयक चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुके हैं। यह कानून केवल इस वर्ष फरवरी के बजट सत्र तक विधायकों पर नियंत्रण बनाए रखने और फिर अध्यादेश द्वारा लागू करने की योजना के तहत आगे बढ़ाए जा रहे हैं। इससे भाजपा को आगामी छह महीनों में चुनाव के समय यह मुद्दा हवा में बनाए रखने का अवसर मिलेगा।
उत्तराखंड में भाजपा सरकार ने पिछले कई वर्षों में जनसंख्या और डेमोग्राफिक परिवर्तन के मुद्दे पर बार-बार बयानबाजी की है, परंतु कोई ठोस आंकड़े सामने नहीं लाए। पिछले साल सभी जिलों के ैैच् को रिपोर्ट तैयार करने के आदेश दिए गए थे, लेकिन उसका परिणाम अज्ञात है। इस बार भी सरकार ने पिछले दस वर्षों के दस्तावेजों की जांच के आदेश दिए हैं, जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि सरकारी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठते हैं। इस प्रकार, उत्तराखंड की राजनीति और प्रशासनिक कार्यशैली दोनों ही जनता के सामने गंभीर सवाल छोड़ते हैं।
मनरेगा और अन्य योजनाओं में हुए बदलाव, विवादास्पद बयानों की वायरल क्लिप, अधिकारी-जनप्रतिनिधियों के बीच बढ़ती टकराहट और चुनावी रणनीतियाँ इस सप्ताह उत्तराखंड में राजनीतिक चर्चा का केंद्र बनी रही। यह सभी घटनाएँ संकेत देती हैं कि राज्य की राजनीति सतह पर दिखाई देने वाली हलचल से कहीं अधिक गंभीर और जटिल है। ग्रामीण जनता, विशेषकर गरीब और कमजोर वर्ग, इन घटनाओं से सीधे प्रभावित हो रहे हैं। उत्तराखंड की आगामी राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा पर इन घटनाओं का गहरा असर पड़ने वाला है।
कुल मिलाकर यह देखा जा सकता है कि उत्तराखंड की राजनीति अब केवल बयानों और मीडिया चर्चा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह राज्य के प्रशासन, योजनाओं और चुनावी रणनीतियों को प्रभावित करने वाली गंभीर प्रक्रिया बन चुकी है। सांसद अजय भट्ट के विवादित बयानों से लेकर मनरेगा में हुए संशोधनों और अधिकारियों की कार्यशैली तक, हर पहलू इस हफ्ते राज्य में राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल का प्रतीक बन गया है। यह स्पष्ट करता है कि उत्तराखंड की राजनीति अब सतह के नीचे कहीं अधिक गंभीर खेल खेल रही है, जिसका असर सीधे जनता और राज्य की योजनाओं पर पड़ता है।



