उत्तराखंड(सुनील कोठारी)। भारतीय राजनीति में ‘वोटकटवा’ शब्द अब जनता की जुबान पर चढ़ चुका है। इसकी जड़ें बिहार और उत्तर प्रदेश से निकलीं, पर आज यह हर राज्य की सियासत में गूंजता है। यह शब्द उस राजनीतिक रणनीति का प्रतीक बन गया है, जिसमें छोटी पार्टियां, निर्दलीय प्रत्याशी या महत्वाकांक्षी नेता बड़े दलों के वोट बैंक में सेंध लगाकर पूरे चुनावी समीकरण को पलट देते हैं। इस खेल में जनता का मुद्दा पीछे छूट जाता है और सत्ता का गणित आगे बढ़ जाता है। लोकतंत्र की बहसें कमजोर पड़ जाती हैं, जबकि पर्दे के पीछे छिपे राजनीतिक हितधारक असली लाभ उठा लेते हैं। दरअसल, यह राजनीति का वह रूप है जिसमें हार-जीत से अधिक महत्व वोटों की कटौती को दिया जाता है — और यही वजह है कि अब ‘वोटकटवा’ न सिर्फ एक शब्द, बल्कि भारतीय राजनीति की एक सच्चाई बन चुका है।
वोटकटवा राजनीति तीन प्रमुख रूपों में काम करती है। पहला, जब कोई छोटी पार्टी किसी बड़ी पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाती है, जिससे उस दल की जीत का अंतर घट जाता है। दूसरा, जब कोई बागी उम्मीदवार अपनी ही पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़कर उसे नुकसान पहुँचाता है। और तीसरा, जब बड़ी पार्टियां किसी अन्य बड़ी पार्टी को रोकने के लिए किसी छोटे दल को पर्दे के पीछे से प्रोत्साहित करती हैं। बिहार में प्रशांत किशोर की पार्टी की भूमिका इसका हालिया उदाहरण मानी जाती है। वहां यह चर्चा आम रही कि प्रशांत किशोर को मिलने वाले वोट, कांग्रेस और राजद के हिस्से में सेंध लगा सकते हैं। अंग्रेजी में इस रणनीति को ‘स्पॉइलर इफेक्ट’ कहा जाता है, और इसका असर हरियाणा, पंजाब, गुजरात से लेकर उत्तराखंड तक देखा जा सकता है।
हरियाणा के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को ‘स्पॉइलर इफेक्ट’ का गहरा झटका लगा। सत्रह सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों, इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) ने इतने वोट खींच लिए कि भाजपा और कांग्रेस के बीच जीत का अंतर बेहद मामूली रह गया। इन छोटी पार्टियों और बागी प्रत्याशियों ने सीधे तौर पर किसी पार्टी को सत्ता नहीं दिलाई, लेकिन परोक्ष रूप से नतीजों की दिशा जरूर बदल दी। यही सियासी समीकरण उत्तराखंड में भी धीरे-धीरे दोहराया जाने लगा। यहां बसपा, उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) और आम आदमी पार्टी जैसे दलों ने मत प्रतिशत में तो उल्लेखनीय वृद्धि की, लेकिन सत्ता के गलियारों में उनकी आवाज़ कमजोर रही। इन दलों ने चुनावी मैदान में शोर तो खूब मचाया, पर नीतिगत प्रभाव या निर्णय स्तर पर असर नहीं डाल पाए। नतीजा यह हुआ कि मुख्य मुकाबला फिर भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमट गया, और क्षेत्रीय राजनीति धीरे-धीरे हाशिए पर चली गई।
उत्तराखंड में भाजपा और कांग्रेस ने मिलकर क्षेत्रीय राजनीति को लगभग समाप्त कर दिया है। राज्य गठन के वक्त उम्मीद थी कि अब निर्णय ‘पहाड़’ से होंगे, लखनऊ से नहीं। लेकिन राजधानी देहरादून बनाकर दोनों राष्ट्रीय दलों ने सत्ता और निर्णयों का केंद्र मैदानों में सीमित कर दिया। बीते पच्चीस वर्षों में विधानसभाओं के विशेष सत्र तक देहरादून में ही सीमित रह गए। आंकड़े बताते हैं कि 2002 के पहले चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को कुल मिलाकर लगभग 50% वोट मिले थे, जबकि यूकेडी, निर्दलीयों और अन्य को लगभग 36% वोट प्राप्त हुए थे। यह बताता है कि आधे से अधिक मतदाताओं ने शुरुआत में ही राष्ट्रीय दलों से दूरी बनाई थी।
समय के साथ दोनों बड़ी पार्टियों ने अपने वोट प्रतिशत को दोगुना कर लिया। भाजपा का वोट शेयर 25% से बढ़कर 45% तक पहुंचा, जबकि कांग्रेस ने भी लगभग 36% तक बढ़ोतरी की। परंतु यह बढ़ोतरी छोटे दलों और स्वतंत्र उम्मीदवारों के खिसकते वोटों की कीमत पर हुई। प्रारंभिक तीन चुनावों में सरकार बनाने की कुंजी हमेशा निर्दलीयों और यूकेडी के पास रही, लेकिन 2017 तक आते-आते उनका वोट शेयर 7% से घटकर नगण्य रह गया। यही वह समय था जब भाजपा और कांग्रेस ने छोटे दलों को वोटकटवा के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया।
2012 और 2017 के चुनावों में कई स्थानों पर बसपा और यूकेडी को चुनाव मैदान में बनाए रखा गया ताकि विपक्षी वोटों में बिखराव हो सके। आंकड़े बताते हैं कि 2017 में 22 सीटों पर जीत का अंतर 5000 वोटों से भी कम था, जबकि बसपा और निर्दलीयों ने औसतन 2500 से 4000 वोट तक काटे। 2022 तक यूकेडी की स्थिति इतनी खराब हो गई कि उसका वोट प्रतिशत एक फीसदी से भी नीचे गिर गया। इसका एक बड़ा कारण चुनाव खर्च का बढ़ना और क्षेत्रीय नेतृत्व की कमी रही। आज जब एक उम्मीदवार को चुनाव में 40 लाख रुपये तक खर्च करने की सीमा है, तो यूकेडी जैसे दलों के कई प्रत्याशी स्वयं इतनी संपत्ति तक नहीं रखते।
2022 के चुनावों में 83 से अधिक प्रत्याशी करोड़पति के रूप में सामने आए। इस स्थिति में यह कहना गलत नहीं होगा कि अब विधानसभा में प्रवेश का पहला शर्त करोड़पति होना बन चुकी है। यही नहीं, आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों में भी कई करोड़पति शामिल थे, जिससे साफ है कि धन और सत्ता का गठजोड़ राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। इस आर्थिक वर्चस्व ने जनता से जुड़े मुद्दों को पीछे धकेल दिया। जल, जंगल और जमीन की बातें गायब हो गईं, और उनके स्थान पर पलायन का मुद्दा प्रमुख हो गया।
‘पलायन’ के इस मुद्दे को भी सत्ता के गलियारों में योजनाबद्ध तरीके से प्रचारित किया गया। दिल्ली के कमरों में बैठकर योजनाएं बनीं, जबकि पहाड़ों की जमीन और नौकरियों का हाल लगातार बिगड़ता गया। भाजपा और कांग्रेस, दोनों ने मिलकर स्थानीय नेतृत्व को कमजोर रखा। केंद्र से निर्देशित राजनीति ने ऐसे नेताओं को जन्म ही नहीं लेने दिया जो जनता की आवाज़ बन सकें। नित्यानंद तिवारी, हरिश रावत या भुवन चंद्र खंडूड़ी जैसे नेताओं के साथ केंद्र की राजनीति ने हमेशा सियासी संतुलन का खेल खेला।
आज स्थिति यह है कि राज्य में नेतृत्व का संकट सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। एक ओर, करोड़ों रुपये विज्ञापनों पर खर्च करने के बावजूद कोई नेता जनसंपर्क का केंद्र नहीं बन पा रहा, तो दूसरी ओर विपक्ष की स्थिति इतनी कमजोर है कि वह सत्ता के सामने सवाल तक नहीं उठा पा रहा। इस खालीपन को भरने के लिए अब ‘उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा’ के रूप में एक नया तीसरा मोर्चा उभरने की कोशिश में है, जिसकी अगुवाई युवा नेता बॉबी पंवार कर रहे हैं।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ‘उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा’ सच में जनता का विकल्प है, या भाजपा के लिए एक नया वोटकटवा मोहरा? बीते लोकसभा चुनावों में बॉबी पंवार का आंदोलन युवा आवाज़ के रूप में उभरा था और उसे राजनीतिक ताकत में बदलने की कोशिश हुई। उत्तराखंड क्रांति दल के कुछ युवाओं ने भी उनके साथ आकर यह नई पार्टी बनाई। लेकिन जब इन युवाओं की गतिविधियां भाजपा समर्थक नजर आने लगीं, तो सवाल खड़े हो गए। जिस भूमि कानून के मुद्दे पर ये युवा एकजुट हुए थे, वह अब विधानसभा की चर्चा में ही नहीं है।
कांग्रेस विरोधी कई सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों को परोक्ष रूप से सहयोग देने के आरोप भी सामने आए, खासकर केदारनाथ जैसी संवेदनशील सीटों पर। कहा गया कि बॉबी पंवार गुट ने ऐसी रणनीति अपनाई जिससे विपक्षी वोटों में बिखराव हुआ और भाजपा को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिला। इस घटनाक्रम ने तीसरे मोर्चे की साख पर गहरे सवाल खड़े कर दिए। हाल ही में देहरादून में आयोजित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान मुख्यमंत्री के साथ बॉबी पंवार की नजदीकियों वाली तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, जिससे इन आशंकाओं को और बल मिला। विपक्ष का दावा है कि जो मोर्चा खुद को जनता की आवाज़ बताता था, वह अब सत्ता के इशारों पर चलता दिख रहा है। इन घटनाओं के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा का असली मकसद सत्ता का विकल्प बनना नहीं, बल्कि चुनावी समीकरणों को प्रभावित करना है।
पिछले कुछ महीनों में उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा ने खुद को जनता का प्रतिनिधि बताने की कोशिश तो की, लेकिन उनके मुद्दों की सीमितता ने सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने नौकरियों, स्थानीय युवाओं की भर्ती और छोटे व्यवसायों के संरक्षण जैसे विषयों पर आवाज़ उठाई, परंतु शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन और बेरोजगारी जैसे व्यापक जनहित के मुद्दों पर उनकी चुप्पी ने जनता को असमंजस में डाल दिया। राज्य के विकास से जुड़ी बड़ी नीतियों पर भी उनका रुख अस्पष्ट बना रहा। यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी), पतंजलि भूमि विवाद, और हजार करोड़ रुपये के औद्योगिक निवेश पैकेज जैसे प्रमुख मामलों पर उन्होंने कोई स्पष्ट रुख नहीं अपनाया। इन संवेदनशील विषयों पर मौन रहने से यह धारणा और मजबूत हुई कि मोर्चा सत्ता के असली सवालों से बच रहा है। जनता में यह चर्चा तेज है कि क्या यह संगठन सच में जनस्वर बनने निकला है या फिर सियासी गणित का हिस्सा बनकर केवल चर्चा में रहना चाहता है।
उत्तराखंड की राजनीति इस वक्त ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहां जनता हर नई चमक को उम्मीद की किरण समझ बैठती है, लेकिन कुछ ही समय में एहसास होता है कि वह चमक असली नहीं, बल्कि टॉर्च की कृत्रिम रोशनी थी — जिसका बटन दरअसल भाजपा और कांग्रेस जैसे दो बड़े दलों के हाथों में है। पिछले पच्चीस वर्षों में इस राज्य ने कई राजनीतिक प्रयोग देखे, लेकिन हर बार परिणाम लगभग एक जैसा ही निकला — जनता के असली मुद्दे सियासी गणित में गुम हो गए। जल, जंगल, जमीन, रोजगार और पलायन जैसे अहम सवाल कभी नीतिगत प्राथमिकता नहीं बन पाए। सत्ता के खेल में हर बार नए चेहरे सामने आए, लेकिन सोच और रणनीति वही पुरानी रही — सत्ता तक पहुंचने के लिए वोटों का बिखराव, और जनता के भरोसे के साथ समझौता। आज सवाल यह नहीं रह गया कि तीसरा मोर्चा कौन बनाएगा या किसे सत्ता मिलेगी; असली सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड की जनता इस ‘वोटकटवा’ राजनीति के जाल से खुद को मुक्त कर पाएगी? क्या कभी ऐसा नेतृत्व उभरेगा जो वोट की नहीं, आवाज़ की राजनीति करे? या फिर आने वाले वर्षों में भी यही खेल नए चेहरों और नए नारों के साथ चलता रहेगा?



