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उत्तराखंड की रजत जयंती के जश्न में आंदोलनकारियों का दर्द फिर हुआ ज़िंदा

एक ओर देहरादून में रजत जयंती के भव्य समारोह, तो दूसरी ओर काशीपुर में आंदोलनकारी सम्मान और पहचान के लिए सड़कों पर उतर संघर्षरत

काशीपुर। उत्तराखंड की पवित्र धरती आज जश्न में डूबी है। 9 नवंबर, वह ऐतिहासिक तारीख जब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था। पूरा प्रदेश आज रजत जयंती का पर्व मना रहा है। देहरादून में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में भव्य आयोजन हो रहे हैं, लेकिन इसी दिन काशीपुर की गलियों में एक अलग ही दृश्य देखने को मिला। जहां एक ओर झंडे लहरा रहे थे, मिठाइयां बंट रही थीं, वहीं दूसरी ओर वही आंदोलनकारी, जिन्होंने इस राज्य की नींव अपने खून-पसीने से रखी, एसडीएम कोर्ट के बाहर धरने पर बैठे थे। यह विडंबना ही है कि जिनकी कुर्बानियों के बिना उत्तराखंड का सपना पूरा नहीं होता, वे आज अपने ही सम्मान और पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

धरना स्थल पर बैठे वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारियों का कहना था कि उत्तराखंड की लड़ाई सिर्फ सीमाओं की नहीं थी, बल्कि एक पहचान, आत्मसम्मान और अवसरों की लड़ाई थी। वर्षों तक चले इस आंदोलन में कई लोगों ने अपनी जान गंवाई, अनगिनत परिवार टूट गए, लेकिन जब राज्य बना तो इन संघर्षों की कीमत आज भी अधूरी है। युगल किशोर सिंघल ने मीडिया से बातचीत में कहा कि यह बड़ा दुर्भाग्य है कि 25 साल बाद भी आंदोलनकारी सड़कों पर हैं। उन्होंने कहा कि जिस आंदोलन ने राज्य बनाया था, अब उसी राज्य में आंदोलनकारियों को अपने सम्मान के लिए फिर आंदोलन करना पड़ रहा है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि “हमने एक आंदोलन राज्य बनाने के लिए किया था, अब हमें एक और आंदोलन अपने चिह्नीकरण और अधिकारों के लिए करना पड़ेगा।”

धरना स्थल पर पहुंचकर काशीपुर के एसडीएम अभय प्रताप सिंह ने आंदोलनकारियों से मुलाकात की और उन्हें भरोसा दिलाया कि उनकी मांगों को उच्चाधिकारियों तक पहुंचाया जाएगा। उन्होंने कहा कि कल तक एक ज्ञापन तैयार कर उन्हें सौंपा जाए ताकि वे इसे शासन स्तर तक भेज सकें। इस पर आंदोलनकारियों ने आंशिक संतोष तो जताया, लेकिन उनका कहना था कि वे सिर्फ आश्वासन से थक चुके हैं। वरिष्ठ आंदोलनकारी वीरेंद्र चौहान ने कहा कि “सरकार ने हमें फिर छह महीने का समय दिया है, लेकिन यह राजनीति का पुराना खेल है। छह महीने बाद फिर वही वादे, वही इंतज़ार। पच्चीस साल तक इंतज़ार किया, अब और कितना करें?” उन्होंने कहा कि अगर अब भी सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो वे उग्र आंदोलन और आमरण अनशन तक जाने को मजबूर होंगे।

इस बीच वरिष्ठ आंदोलनकारी आशाराम ने भी अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि यह दिन जहां गर्व का है, वहीं दिल में दर्द भी जगाता है। उन्होंने कहा, “आज का दिन हमें उन शहीदों की याद दिलाता है जिन्होंने उत्तराखंड के सपने को हकीकत बनाया। लेकिन दुख इस बात का है कि हम अब भी अपने अधिकारों और मान्यता के लिए धरने पर हैं। हम आंदोलनकारी थे, हैं और रहेंगे। अगर हमारा जीवन यहां खत्म भी हो, तो कम से कम हमें यह सम्मानपत्र और राष्ट्रीय ध्वज के तले अंतिम विदाई मिले।” उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन आवाज़ में वही पुराना जज़्बा।

धरना स्थल पर मौजूद आंदोलनकारी सिर्फ विरोध नहीं कर रहे थे, बल्कि प्रदेश के भविष्य की भी बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जिस उत्तराखंड की उन्होंने कल्पना की थी, उसमें हर युवा को रोजगार, हर गांव को सुविधा और हर पहाड़ी को सम्मान मिलना था। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। बेरोजगारी और पलायन ने प्रदेश को खोखला कर दिया है। पहाड़ों से लोग लगातार नीचे आ रहे हैं, और नेता तक अब मैदानी क्षेत्रों में अपने घर बना रहे हैं। योगेश यादव ने कहा, “सरकार अगर चाहे तो पहाड़ों में रोजगार के अपार अवसर हैं। वहां की जड़ी-बूटियों पर आधारित उद्योग खोले जाएं, तो युवाओं और मातृशक्ति दोनों को काम मिल सकता है। लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति चाहिए, जो अब तक नहीं दिखी।”

इसी क्रम में आंदोलनकारी अर्चना लोहानी ने कहा कि “हम आज भी आंदोलन पर बैठे हैं, लेकिन दिल में गर्व है कि हमारा संघर्ष बेकार नहीं गया। आज उत्तराखंड अपनी पहचान के साथ खड़ा है। फिर भी, यह दुखद है कि हमदनपदम आंदोलनकारियों का अब तक चिन्हीकरण नहीं हो पाया है। मैं चाहती हूं कि सरकार जल्द निर्णय ले और योग्य लोगों को उनका हक़ दे। आखिर हमने यह राज्य अपने संघर्ष से बनाया है, किसी की दया से नहीं।” उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन की तरफ से लगातार देरी निराशाजनक है। “एसडीएम साहब ने अब तक हमसे कोई सीधा संवाद नहीं किया। बस अखबारों में बयान और तस्वीरें आ रही हैं। अगर सरकार ईमानदारी से काम करे, तो यह समस्या एक महीने में सुलझ सकती है।”

धरना स्थल पर माहौल भावनाओं से भरा हुआ था। एक तरफ नारेबाजी चल रही थी – “आंदोलनकारियों का सम्मान करो”, “हमारे बलिदान को मत भूलो” – जश्न की जगह संघर्ष की लकीरें ज़्यादा दिख रही थीं। यह विरोध सिर्फ सम्मानपत्र का नहीं, बल्कि उस आत्मसम्मान का है जो 25 साल पहले इस राज्य की नींव में गहराई से गड़ा था।

राज्य निर्माण की 25वीं वर्षगांठ जहां एक तरफ विकास, उपलब्धियों और योजनाओं की चर्चा का दिन है, वहीं काशीपुर का यह धरना याद दिलाता है कि हर उत्सव के पीछे कुछ अधूरे सपने भी होते हैं। यह दिन उन आंदोलनकारियों की याद का प्रतीक है जिन्होंने इस राज्य की नींव रखी, लेकिन आज भी अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रहे हैं। उत्तराखंड ने 25 सालों में बहुत कुछ पाया, पर शायद सबसे ज़रूरी चीज़ कृ अपने सच्चे निर्माताओं का सम्मान-अब भी अधूरा है।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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