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ससुराल की कथित क्रूरता और अपनों की बेरुखी के बीच न्याय मांगती बीस साल पुरानी प्रेम कहानी

बीस साल के प्रेम विवाह का अंत राशन और पानी की बंदी तक पहुँचा जहाँ अपनों ने ही बहू को तिल-तिल मरने को मजबूर किया और अब सिख समाज न्याय की मशाल लिए खड़ा है।

काशीपुर। उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जनपद की औद्योगिक नगरी काशीपुर से सामने आई यह घटना न सिर्फ एक परिवार के भीतर पनपी कथित क्रूरता को उजागर करती है, बल्कि समाज और व्यवस्था दोनों के सामने कई असहज सवाल भी खड़े करती है। लगभग दो दशक पहले प्रेम को जीवन का आधार मानकर किया गया एक विवाह आज पीड़ा, अपमान और संघर्ष की लंबी कहानी में बदल चुका है। आरोप है कि जिस रिश्ते को सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक होना चाहिए था, वही रिश्ता एक महिला के लिए असहनीय मानसिक व शारीरिक यातनाओं का कारण बन गया। हालात यहां तक पहुंच गए कि बीते ढाई वर्षों से वह महिला गुरुद्वारे से मिलने वाले राशन और पानी के सहारे जीवन यापन करने को मजबूर है। जब पीड़ा असह्य हुई और उसने आत्महत्या जैसे गंभीर विचारों का संकेत दिया, तब सिख समाज के लोगों ने एकजुट होकर उसके समर्थन में आवाज उठानी शुरू की। यह मामला अब केवल एक पारिवारिक विवाद न रहकर सामाजिक न्याय और प्रशासनिक संवेदनशीलता की कसौटी बनता जा रहा है।

मोहल्ला पक्काकोट स्थित गुरुद्वारा श्री ननकाना साहिब में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान पीड़िता सुखविंदर कौर ने सार्वजनिक मंच पर अपनी आपबीती साझा की। उनके साथ गुरुद्वारा श्री ननकाना साहिब के हेड ग्रंथी सूबा सिंह और बाजपुर गुरुद्वारा प्रबंधक स. कुलविंदर सिंह किंदा भी मौजूद रहे। कैमरों के सामने रखी गई यह कहानी किसी एक दिन या एक घटना की नहीं, बल्कि बीस वर्षों में धीरे-धीरे जमा हुए उन जख्मों की दास्तान है, जिन्हें वह आज भी ढो रही हैं। सुखविंदर कौर ने बताया कि वर्ष 2006 में उन्होंने जसपुर खुर्द निवासी स. निशान सिंह के पुत्र गुरताज सिंह के साथ प्रेम विवाह किया था। शुरुआती कुछ वर्षों तक परिस्थितियां सामान्य रहीं, लेकिन उसके बाद ससुराल पक्ष के व्यवहार में लगातार कठोरता आती गई। उनका कहना है कि शादी के बाद जुड़वां बेटों के जन्म के बावजूद उन्हें परिवार में कभी अपनापन नहीं मिला और धीरे-धीरे उनके अस्तित्व को ही नकारने की कोशिश की जाने लगी।

पीड़िता के अनुसार ससुराल पक्ष का रवैया शुरू से ही उपेक्षापूर्ण रहा। आरोप है कि उन्हें सामाजिक कार्यक्रमों, पारिवारिक समारोहों और यहां तक कि सामान्य रिश्तेदारों के बीच भी पति के साथ जाने की अनुमति नहीं दी जाती थी। घर के भीतर एक तरह का कैद जैसा वातावरण बना दिया गया, जहां हर कदम पर ताने, अपमान और डर का सामना करना पड़ा। सुखविंदर कौर का दावा है कि दहेज को लेकर भी उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और बार-बार यह जताया गया कि वह पर्याप्त दहेज नहीं लाई हैं। उन्होंने कहा कि बीस वर्षों तक उन्होंने अपने बच्चों के भविष्य और परिवार की प्रतिष्ठा के लिए सब कुछ सहा, लेकिन बदले में उन्हें केवल अपमान ही मिला। उनका यह भी आरोप है कि मारपीट और मानसिक दबाव का सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा, जिससे उनका स्वास्थ्य भी प्रभावित हुआ। दिल और सांस से जुड़ी गंभीर समस्याओं के बावजूद कथित तौर पर उनकी स्थिति के प्रति किसी ने संवेदना नहीं दिखाई।

मामले में एक और गंभीर पहलू बच्चों से जुड़ा हुआ है। सुखविंदर कौर ने बताया कि उनके दो जुड़वां बेटे हैं, जिनकी उम्र अब उन्नीस वर्ष के आसपास है। आरोप है कि ससुराल पक्ष ने एक बेटे को अपने पास रख लिया, जबकि दूसरे बेटे को उनके साथ रहने के बावजूद लगातार परेशान किया जाता रहा। इससे न केवल मां-बेटे पर मानसिक दबाव बढ़ा, बल्कि दोनों भाइयों के बीच भी दूरी पैदा कर दी गई। पीड़िता का कहना है कि परिवार के दबाव और माहौल के कारण दोनों बेटों को एक-दूसरे से बात तक करने से रोका गया। बेटे ने भी मीडिया के सामने अपनी पीड़ा जाहिर की और बताया कि किस तरह पारिवारिक कलह ने उसके भविष्य और मानसिक स्थिति को प्रभावित किया है। मां का कहना है कि बच्चों को इस तरह अलग करना किसी भी माता-पिता के लिए सबसे बड़ा दर्द होता है, जिसे वह रोज़ महसूस करती हैं।

सुखविंदर कौर ने अपनी ननद और सास पर भी गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि विवाहिता ननद लंबे समय से मायके में रह रही है और अपनी मां के साथ मिलकर उन्हें और उनके बेटे को प्रताड़ित करती रही है। आरोप है कि छह-सात महीने पहले उनके कमरे की खिड़कियां जानबूझकर बंद कर दी गईं, ताकि हवा का प्रवाह रुक जाए और वह घुटन महसूस करें। पीड़िता का दावा है कि उनकी स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में परिवार को पूरी जानकारी थी, इसके बावजूद ऐसी परिस्थितियां बनाई गईं, जो उनकी जान के लिए खतरा बन सकती थीं। उन्होंने कहा कि यह सब उन्हें मानसिक रूप से तोड़ने और घर छोड़ने के लिए मजबूर करने की साजिश का हिस्सा था। इस दौरान घर में तोड़फोड़ और निर्माण कार्य के नाम पर उनके रहने की जगह को भी असुरक्षित बना दिया गया, जिससे हर समय दुर्घटना का डर बना रहता था।

बीते ढाई वर्षों की स्थिति को बयान करते हुए सुखविंदर कौर की आवाज भर्रा गई। उनका कहना है कि इस दौरान उनके ससुराल पक्ष ने बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाएं तक बंद कर दीं, जिससे जीवन यापन लगभग असंभव हो गया। ऐसे हालात में गुरुद्वारे से मिलने वाले राशन और पानी ने ही उन्हें और उनके बेटे को जीवित रखा। उन्होंने बताया कि कई बार पंचायत और रिश्तेदारों के सामने अपनी पीड़ा रखी गई, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका। कुछ लोगों ने सीमित आर्थिक सहायता की बात कही, जो उनकी जरूरतों के सामने नाकाफी थी। पीड़िता का यह भी आरोप है कि उनके ससुर निशान सिंह के नाम पर ही सारी संपत्ति है और जानबूझकर उनके पति के नाम पर कुछ भी नहीं रखा गया, ताकि भविष्य में उन्हें घर से बाहर करने में आसानी हो। उनका कहना है कि जिस घर में उन्होंने बीस साल बिताए, उसी से उन्हें बेदखल करने की कोशिश की जा रही है।

कानूनी मोर्चे पर भी सुखविंदर कौर खुद को असहाय महसूस कर रही हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें तलाक के कागजात भेजे गए हैं और उनके खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराने की कोशिश की गई है। पीड़िता का दावा है कि आर्थिक तंगी के कारण वह अदालत में प्रभावी ढंग से अपना पक्ष रखने में असमर्थ हैं। उनके पास न तो वकील की फीस चुकाने के संसाधन हैं और न ही लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने की ताकत। उनका कहना है कि वह तलाक नहीं चाहतीं, बल्कि अपने बच्चों के साथ उसी घर में सम्मानपूर्वक रहना चाहती हैं, जहां वह विवाह के बाद आई थीं। उन्होंने मीडिया के माध्यम से प्रशासन और समाज से अपील की कि उन्हें और उनके बच्चों को उनका हक दिलाया जाए, ताकि उनके भविष्य को सुरक्षित किया जा सके।

पत्रकार वार्ता के दौरान स. कुलविंदर सिंह किंदा ने भी इस मामले पर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि समाज के कई संभ्रांत लोगों ने ससुर निशान सिंह से बातचीत करने की कोशिश की, लेकिन किसी भी तरह का सकारात्मक परिणाम नहीं निकला। उनका कहना है कि जब एक महिला सार्वजनिक रूप से आत्महत्या की बात करने पर मजबूर हो जाए, तो यह समाज और प्रशासन दोनों के लिए चेतावनी है। उन्होंने पुलिस प्रशासन से मांग की कि मामले की निष्पक्ष जांच कर पीड़िता को सुरक्षा और न्याय दिया जाए। सिख समाज के अन्य लोगों ने भी इस दौरान एकजुटता दिखाई और भरोसा दिलाया कि सुखविंदर कौर को अकेला नहीं छोड़ा जाएगा। उनका कहना है कि यह लड़ाई केवल एक महिला की नहीं, बल्कि उन तमाम महिलाओं की है, जो पारिवारिक उत्पीड़न के बावजूद चुप रहने को मजबूर होती हैं।

पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रेम विवाह करने का निर्णय किसी महिला के लिए आज भी सामाजिक दंड बन जाता है। दो दशक तक कथित तौर पर अपमान और उपेक्षा झेलने के बाद आज सुखविंदर कौर केवल इंसाफ की मांग कर रही हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते उनकी आवाज नहीं सुनी गई, तो न जाने कितनी और महिलाएं इसी तरह खामोशी में अपनी जिंदगी गुजारने को मजबूर होंगी। यह मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई, सामाजिक समर्थन और न्यायिक संवेदनशीलता की कसौटी पर है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या व्यवस्था इस पीड़ा को समझकर ठोस कदम उठाती है, या फिर यह कहानी भी फाइलों में दर्ज होकर रह जाएगी।

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