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फ्लाईओवर पर सनसनीखेज खुलासा सात साल की देरी के पीछे सरकारी सुस्ती बेनकाब

बार–बार ठेकेदार बदलने, रेलवे डिजाइन संशोधन, बजट संकट और विभागीय देरी ने काशीपुर–रामनगर आरओबी निर्माण को लगभग ठप कर दिया है; आठ साल बाद भी अधूरा फ्लाईओवर शहर में जाम, परेशानी और नाराजगी का सबसे बड़ा कारण बन चुका है

काशीपुर(सुनील कोठारी)। कई वर्षों से काशीपुर और रामनगर के बीच आवाजाही करने वाले हजारों नागरिकों की उम्मीदों पर जैसे विराम लग गया है। शहर की इस जीवनरेखा मानी जाने वाली सड़क पर प्रस्तावित आरओबी का निर्माण पिछले आठ वर्षों से लगातार रफ्तार नहीं पकड़ पा रहा, जिससे स्थानीय निवासियों में गहरी नाराजगी और निराशा दोनों बढ़ रही है। जनवरी 2018 में शुरू हुई यह परियोजना मूल रूप से 54 करोड़ 40 लाख रुपये की लागत से तैयार होनी थी, ताकि आवागमन में होने वाले जाम से राहत मिल सके। लेकिन शुरुआत से ही रेलवे से साइट क्लियरेंस न मिलने, तकनीकी बाधाओं और विभागीय प्रक्रियाओं की लंबी खींचतान ने इसे कई बार अधर में छोड़ दिया। प्रारंभ में काम संभालने वाली कंपनी पीआरएल कम्पनी भी इन उलझनों से परेशान होकर निर्माण स्थल छोड़कर चली गई। लोगों को लगा था कि शायद दूसरी एजेंसी आने से काम में तेजी आएगी, परन्तु किस्मत ने मानो इस परियोजना से किनारा कर लिया और समस्याएँ खत्म होने का नाम नहीं ले रहीं।

इसके बाद निर्माण कार्य को संभालने के लिए वुडहिल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को जिम्मेदारी सौंपी गई। परंतु यहां भी तकनीकी दिक्कतों ने रास्ता रोक दिया। रेलवे द्वारा तैयार किए गए नए डिजाइन में किए गए भारी फेरबदल के कारण डीपीआर के अनुरूप प्रस्तावित कॉम्पोजिट फ्रेम के बजाय लो-हाइट सब-वे और बो स्ट्रिंग गर्डर का प्रावधान सामने आया, जिसकी लागत मूल परियोजना में शामिल ही नहीं थी। नतीजतन कंपनी ने आगे काम करना संभव न बताते हुए अपने हाथ पीछे खींच लिए। जब वुडहिल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के प्रोजेक्ट मैनजर से इस जटिल स्थिति पर सवाल किया गया तो उन्होंने विस्तार से बताया कि कॉम्पोजिट गर्डर और बो स्ट्रिंग गर्डर के निर्माण में भारी खर्च आता है और मूल डीपीआर में इनका बजट शामिल न होने के कारण विभाग द्वारा अतिरिक्त आर्थिक मंजूरी मिल पाना लगभग असंभव था। उनका कहना था कि विभाग की ओर से लगभग 40–45 करोड़ रुपये अतिरिक्त बढ़ाने का प्रस्ताव भेजा भी गया था, लेकिन इसे स्वीकृति मिलना आसान नहीं था क्योंकि कुल लागत लगभग दोगुनी हो जाती, जो ऑडिट और अनुमोदन दोनों में समस्या खड़ी कर सकती थी।

प्रोजेक्ट मैनजर ने यह भी स्पष्ट किया कि 2016 की डीपीआर के आधार पर वर्ष 2020 में कंपनी को यह कार्य मिला, लेकिन उसके बाद से निर्माण सामग्री, स्टील, लेबर, परिवहन आदि की कीमतों में भारी बढ़ोतरी ने लागत को और अधिक बढ़ा दिया। रेलवे द्वारा जीएडी (जनरल अरेंजमेंट ड्रॉइंग) भी समय पर पास नहीं किया गया। उनका कहना था कि जीएडी को निर्माण शुरू होने से पहले ही मंजूरी मिल जानी चाहिए थी, जबकि इसे मार्च 2025 में स्वीकृत किया गया, जिससे सामग्री के दामों में आए बड़े बदलावों ने परियोजना को आर्थिक रूप से असंतुलित बना दिया। इतना ही नहीं, रामनगर दिशा में खड़े दो बड़े ट्रांसमिशन टावरों की शिफ्टिंग भी जरूरी थी, क्योंकि उनकी वर्तमान स्थिति में ओवरब्रिज पर ट्रैफिक को सुरक्षित रूप से चलाना संभव नहीं था। परंतु इस कार्य का प्रावधान भी मूल प्रोजेक्ट में शामिल नहीं था, न ही इसके लिए अलग से बजट स्वीकृत हुआ, इसलिए यह दिक्कत भी परियोजना को रोकने वाली प्रमुख वजहों में शामिल रही।

निर्माण स्थल के तकनीकी और प्रशासनिक विवादों के बीच विभागीय प्रक्रियाएँ भी मजबूत बाधा बनती रहीं। वुडहिल के प्रोजेक्ट मैनजर का कहना था कि 90 प्रतिशत कार्य पूरा होने के बावजूद कई महत्वपूर्ण खंड रेलवे के अधीन होने के कारण काम आगे नहीं बढ़ पाया। परियोजना की जटिलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विभाग ने केवल 54 करोड़ रुपये की लागत पर आधारित मूल अनुबंध के बाद बाकी बचे कार्य को 92 करोड़ रुपये की नई निविदा के माध्यम से पूरा करने का प्रस्ताव बनाया। यह स्पष्ट संकेत देता है कि प्रारंभिक अनुमान वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं थे। नए कार्यों, बढ़े हुए दामों और तकनीकी संशोधनों ने प्रोजेक्ट की मूल संरचना को पूरी तरह बदल दिया, लेकिन वित्तीय स्वीकृति उतनी तेजी से नहीं मिल सकी, जितनी इस निर्माण के लिए आवश्यक थी।

वुडहिल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के प्रोजेक्ट मैनजर ने पूरी स्थिति को बेहद स्पष्ट और तर्कशील तरीके से समझाते हुए कहा कि कंपनी ने अभी तक परियोजना को छोड़ा नहीं है। उनका कहना है कि जब तक विभाग की ओर से आधिकारिक रूप से फोरक्लोजर पारित नहीं हो जाता, तब तक वे अपने दायित्वों के अनुसार कार्य कर रहे हैं। प्रोजेक्ट मैनजर के अनुसार परियोजना का लगभग 90 प्रतिशत काम पहले ही पूरा किया जा चुका है, और अब केवल वह हिस्सा बचा है जो मूल वर्क ऑर्डर में था ही नहीं—जिसमें कॉम्पोजिट गर्डर तथा बो स्ट्रिंग गर्डर का निर्माण शामिल है। उन्होंने यह भी बताया कि इन दोनों महत्वपूर्ण संरचनाओं को डीपीआर के अनुसार बाद में जोड़ा गया, इसलिए इन्हें पुराने अनुबंध में शामिल करना तकनीकी रूप से संभव नहीं था। उनकी मानें तो यदि री-टेंडरिंग की प्रक्रिया में यह प्रोजेक्ट दोबारा उनकी कंपनी को आवंटित किया जाता है, तो शेष सभी तकनीकी कार्यों और अंतिम फिनिशिंग को मिलाकर लगभग एक वर्ष के भीतर पूरा आरओबी पूरी तरह तैयार कर दिया जाएगा, बशर्ते इस बार आवश्यक स्वीकृतियाँ समय पर उपलब्ध हों।

वहीं, दूसरी ओर अधिशासी अभियंता आसुतोष ने भी हिन्दी दैनि‍क सहार प्रजंत्रत्र से बातचीत में परियोजना की स्थिति पर अपनी राय रखी। उन्होंने बताया कि वुडहिल कंपनी काम समय पर पूरा नहीं कर पा रही थी, जिसके चलते विभाग ने उससे कार्य वापस लेकर उसे औपचारिक रूप से क्लोज कर दिया है। अब नए ठेकेदार की नियुक्ति की प्रक्रिया जारी है। उनका कहना था कि वर्तमान समय में निविदा (टेंडर) का प्रस्ताव तैयार कर दिया गया है और फील्ड प्रक्रिया पूरी होते ही इसे अंतिम स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा। अधिशासी अभियंता ने यह भी माना कि ऐसे बड़े कार्यों में देरी से तकनीकी और आर्थिक दोनों कठिनाइयाँ exponentially बढ़ जाती हैं, लेकिन विभाग कोशिश कर रहा है कि नए ठेकेदार के आते ही निर्माण फिर से गति पकड़ सके।

आसुतोष के अनुसार, आरओबी का मूल निर्माण 2021 में शुरू हुआ था और इसके उद्घाटन के बाद लोगों को उम्मीद थी कि परियोजना कुछ ही वर्षों में पूरी हो जाएगी, लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत निकली। समय पर निर्माण न होने से शहर में जाम की समस्या लगातार बढ़ी है। भारी वाहनों, स्कूली बसों, एम्बुलेंसों और रोजाना यात्रा करने वाले नागरिकों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। अधिशासी अभियंता ने यह भी स्वीकार किया कि फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि आरओबी का कार्य कब तक पूरा हो पाएगा, लेकिन विभाग इस बात को सुनिश्चित करना चाहता है कि नई निविदा प्रक्रिया में कोई तकनीकी या वित्तीय खामी न रहे।

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा परेशान आम नागरिक हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि रेलवे ओवरब्रिज की यह परियोजना काशीपुर और रामनगर दोनों की जीवनरेखा है। हर दिन हजारों लोग इस मार्ग से गुजरते हैं, और मौजूदा स्थिति में रेलवे क्रॉसिंग पर लगने वाले लंबे जाम न केवल समय बर्बाद करते हैं बल्कि कई बार आपात स्थिति में गंभीर खतरा भी उत्पन्न कर देते हैं। व्यापारियों का कहना है कि शहर का व्यावसायिक ढांचा भी इस निर्माण की धीमी प्रगति से प्रभावित हो रहा है। जहां विकास कार्यों को शहर की उन्नति का आधार माना जाता है, वहीं इस परियोजना की विलंबित राह ने विकास की गति को उल्टा मोड़ दिया है। फिलहाल लोगों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि नई निविदा प्रक्रिया कब पूरी होगी और नया ठेकेदार कब कार्यभार संभालेगा। विभागीय सूत्र बताते हैं कि टेंडर दस्तावेज़ आरओ ऑफिस भेजे जा चुके हैं और थोर-क्लोजर रिपोर्ट भी विभाग को प्राप्त हो गई है। अब निर्णय उच्च स्तर पर होना है कि वुडहिल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को औपचारिक रूप से हटाकर नए ठेकेदार को कार्य सौंपा जाए या कुछ और तकनीकी औपचारिकताएँ पूरी की जाएँ। लेकिन इसमें कितना समय लगेगा, यह कोई नहीं बता सकता। लोगों को केवल यह उम्मीद है कि इतनी बड़ी देरी के बाद अब कम से कम आगे की कार्यवाही तेजी से हो, ताकि शहर को उस ओवरब्रिज का लाभ मिल सके जिसकी प्रतीक्षा आठ वर्षों से की जा रही है।

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