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आंगनवाड़ी बहनों का फूटा गुस्सा मानदेय और सम्मान की लड़ाई में उठी आवाज

आवाज अब दबेगी नहीं, आंगनवाड़ी बहनों ने निगम सभागार से उठाई हक और सम्मान की मांग कहा—जब तक पूरा मानदेय और साधन नहीं, काम नहीं करेंगे

काशीपुर। नगर निगम सभागार में सोमवार को हुई बैठक एक बार फिर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की व्यथा का आईना बन गई। कई जिलों की तरह काशीपुर की कार्यकर्ता बहनों ने भी खुलकर अपनी पीड़ा बयां की। उनका कहना था कि विभाग का काम पहले से ही सिर पर लदा हुआ है, ऊपर से निर्वाचन आयोग ने भी बीएलओ के रूप में अतिरिक्त जिम्मेदारी दे दी है। विभागीय कार्यों के बीच अब हर महीने KYC और फेस कैप्चरिंग जैसे कामों ने बोझ और बढ़ा दिया है। जबकि मानदेय का जो वादा किया गया था, वह अब तक अधूरा है। चुनाव आयोग ने 12 हजार रुपये का जियो पास किया था, लेकिन अभी तक केवल 7 हजार रुपये ही मिले हैं। दीपावली से पहले भुगतान की बात कही गई थी, मगर त्योहार निकल गया, बहनों के हाथ अब भी खाली हैं। आयोग और विभाग की उदासीनता ने इन कार्यकर्ताओं के उत्साह पर ठंडा पानी डाल दिया है।

इन आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि उनसे काम तो दो विभागों का कराया जा रहा है, मगर सुविधा किसी की भी नहीं दी गई। मोबाइल फोन हैंग होने से ऑनलाइन कार्यों में दिक्कत होती है, और जो 4G फोन दिए गए हैं वे समय की गति से पीछे हैं। उनका कहना है कि जब पूरा देश 5G युग में प्रवेश कर चुका है, तो निर्वाचन आयोग को भी समय की मांग के अनुसार साधन उपलब्ध कराने चाहिए। एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने गुस्से में कहा कि “जब हमसे निर्वाचन आयोग के काम कराए जा रहे हैं तो हमें वैसी तकनीकी सुविधा भी दी जानी चाहिए, ताकि हम कार्य सुचारू रूप से कर सकें।” विभाग की ओर से बार-बार अलग-अलग सूचियों के सत्यापन और ऑनलाइन प्रविष्टियों के निर्देश दिए जाते हैं, जिससे मानसिक दबाव बढ़ रहा है।

कार्यकर्ताओं ने अपनी आर्थिक स्थिति पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि त्यौहारों पर भी उन्हें कोई बोनस या प्रोत्साहन राशि नहीं मिलती। “हमारी तुलना अगर किसी घरेलू सहायिका से की जाए, तो वे भी एक मिठाई का डिब्बा तो पाती हैं, हमें तो वह भी नहीं मिलता,” एक बहन ने भावुक स्वर में कहा। लगातार मेहनत करने के बाद भी विभाग न तो उन्हें मजदूर की श्रेणी में रखता है और न अधिकारी के दर्जे में, जिससे वे दोनों के बीच पिस रही हैं। कई मिनी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता वर्षों से सेवा में हैं, मगर प्रमोशन के बावजूद वेतन वृद्धि के लाभ से वंचित हैं।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने यह भी बताया कि नगर निगम में उन्हें दस-दस बार बुलाया जाता है, लेकिन किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलता। कई बहनें ऐसी हैं जिनके क्षेत्रों में सहयोगी स्टाफ तक नहीं है। पहले रजिस्टर में हस्ताक्षर कर कार्य पूरा हो जाता था, अब फेस कैप्चरिंग और ऑनलाइन एंट्री का नया झंझट शुरू हो गया है। “काम तो हमारा ही है, क्योंकि लॉगिन हमारे फोन से होता है, तो पूरा दबाव भी हम पर ही आता है,” उन्होंने कहा। उनके मुताबिक यह सीधा शोषण है — महिला सशक्तिकरण की बातें तो बड़ी-बड़ी की जाती हैं, मगर जमीनी हकीकत बिलकुल उलट है।

उन्होंने प्रदेशभर की स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि देहरादून और हरिद्वार में तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कार्य बहिष्कार पर हैं, लेकिन काशीपुर की बहनें अभी भी जिम्मेदारी निभा रही हैं। “हमारे परिवार का खर्च नहीं चल पा रहा, फिर भी हम काम कर रहे हैं, लेकिन जब मेहनत की कीमत न मिले तो यह सेवा व्यर्थ हो जाती है,” एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने कहा। उनका सवाल था कि जब एक आंगनवाड़ी एक जगह का काम कर सकती है, तो उसे दो-दो विभागों का कार्य क्यों सौंपा जा रहा है?

कार्यकर्ताओं ने बताया कि निर्वाचन आयोग हर बार काम पूरा करने के लिए सिर्फ पंद्रह दिन का समय देता है, जबकि ऑनलाइन प्रक्रिया दो-दो महीने का काम मांगती है। “इतने कम समय में हम कैसे सब कुछ अपडेट करें?” उन्होंने पूछा। इसके साथ ही मोबाइल रिचार्ज की समस्या भी गंभीर है। बिना इंटरनेट और रिचार्ज के ऑनलाइन कार्य कर पाना असंभव है। पहले कहा गया था कि उन्हें टैबलेट दिए जाएंगे, लेकिन अब तक किसी को भी नहीं मिले। “जब तक हमें रिचार्ज का पैसा और टैबलेट नहीं मिलते, तब तक हम काम सुचारू रूप से कैसे करेंगे?” एक अन्य कार्यकर्ता ने सवाल उठाया।

बैठक में कई कार्यकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि वर्ष 2003 से 2013 तक की मतदाता सूचियों के सत्यापन का जिम्मा भी उन्हीं पर डाल दिया गया है। यह काम बेहद संवेदनशील और सटीकता वाला है, लेकिन इसके लिए न पर्याप्त समय दिया गया और न ही उचित प्रशिक्षण। निर्वाचन आयोग ने उन्हें बीएलओ के रूप में इसलिए चुना क्योंकि वे घर-घर जाकर संपर्क कर सकती हैं, मगर आयोग ने उनके बोझ और सीमित साधनों पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने कहा कि ईमानदारी और पारदर्शिता से कार्य करना उनका कर्तव्य है, लेकिन विभाग को भी उन्हें सक्षम बनाना होगा। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की मांग है कि निर्वाचन आयोग तत्काल 12 हजार रुपये का पूरा मानदेय और 2 हजार रुपये का वार्षिक रिचार्ज भत्ता जारी करे। साथ ही सभी कार्यकर्ताओं को 5G मोबाइल फोन या टैबलेट उपलब्ध कराए जाएं, ताकि ऑनलाइन कार्य आसानी से हो सके। इसके अलावा उचित समय और प्रशिक्षण देकर कार्य की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए। “जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जातीं, तब तक कोई भी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता निर्वाचन आयोग का यह अतिरिक्त कार्य नहीं करेगी,” उन्होंने चेतावनी दी।

इन आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं का कहना है कि वे धरातल पर सबसे ज्यादा मेहनत करने वाली कर्मी हैं, जो सही लाभार्थियों की पहचान से लेकर घर-घर सर्वेक्षण तक करती हैं। फिर भी उन्हें सम्मान और सुविधा के बजाय उपेक्षा मिलती है। उन्होंने दो टूक कहा कि अब उन्हें केवल भाषण नहीं, हक चाहिए। उनकी यह आवाज न सिर्फ एक विभाग के खिलाफ है, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ भी है, जो ‘महिला सशक्तिकरण’ की बात तो करती है, पर असल में महिलाओं को मजबूरी के नाम पर श्रम कराने से नहीं चूकती। इस दौरान कई कार्यकर्ताओं की आंखों में आंसू थे, तो कुछ के स्वर में गुस्सा और जिद। सबकी एक ही मांग थी — “काम करेंगे, मगर उचित मानदेय, साधन और सम्मान के साथ।” यदि जल्द ही सरकार और निर्वाचन आयोग ने उनकी बात नहीं सुनी, तो यह आवाज आने वाले दिनों में और बुलंद हो सकती है।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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