काशीपुर(सुनील कोठारी)। काफी समय से सुस्ती और आंतरिक खींचतान में उलझी काशीपुर महानगर कांग्रेस ने अब एक बार फिर से करवट लेनी शुरू कर दी है। शहर संगठन की बागडोर अलका पाल के हाथों में आने के बाद पार्टी के भीतर हलचल बढ़ी है और एक लंबे अंतराल के बाद कार्यकर्ताओं में उम्मीद की नई किरण दिखाई देने लगी है। हालांकि असली परीक्षा अब उनके सामने खड़ी है—एक ऐसा संगठन पुनर्जीवित करना, जिसे वर्षों की खेमेबाजी, उदासीनता और नेतृत्वहीनता ने भीतर से कमजोर कर दिया। कांग्रेस हाईकमान ने उन पर भरोसा जताकर बड़े बदलाव की जिम्मेदारी सौंप दी है, और अलका पाल भी इस विश्वास को निभाने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट गई हैं। मगर चुनौती इसलिए कठिन है क्योंकि काशीपुर कांग्रेस सिर्फ चुनावी हारों की मार ही नहीं झेलती रही, बल्कि अंदरूनी मतभेदों ने भी उसे लंबे समय तक जकड़े रखा।
पार्टी के अंदर कई वर्षों से चले आ रहे ठहराव और निराशा के बीच अब अलका पाल की नियुक्ति एक नए आरंभ की तरह देखी जा रही है, लेकिन इसके साथ ही जिम्मेदारी का बोझ भी बेहद बड़ा है। काशीपुर के संगठन को मजबूत आधार देना, पुराने कार्यकर्ताओं को वापस जोड़ना, निष्क्रिय पड़े यूनिट्स को फिर से सक्रिय करना और बूथ स्तर की कमजोरियों को दूर करना—ये सभी कार्य किसी छोटे लक्ष्य का हिस्सा नहीं, बल्कि लम्बे राजनीतिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया की शुरुआत है। कांग्रेस के पुराने धड़ों के बीच उपजे मनमुटाव को पाटना और सभी पक्षों को एक दिशा में खड़ा करना अलका पाल के सामने सबसे कठिन दीवार है। शहर के कई बूथों का दौरा करते हुए उन्होंने न सिर्फ संगठन की वास्तविक स्थिति को समझा, बल्कि वहां मौजूद अनियमितताओं और कमियों पर भी गंभीरता से बात की।

कार्यभार संभालने के बाद शुरू हुए शुरुआती मतभेदों ने यह भी साफ कर दिया कि अलका पाल के लिए सफर इतना आसान नहीं होने वाला। बावजूद इसके वे एक-एक कार्यकर्ता से व्यक्तिगत संवाद बनाकर हालात सुधारने में जुट गई हैं। उनका मानना है कि राजनीतिक संगठन सिर्फ चुनावी संरचना नहीं होता, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव और सामूहिक सहभागिता पर टिका रहता है। इसलिए वे लगातार बैठकों, वार्ताओं और जनसंपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से उस पुल को खड़ा कर रही हैं, जिसमें हर कार्यकर्ता को अपनी भूमिका का महत्व महसूस हो। पार्टी के अंदर जो लोग वर्षों से निष्क्रिय थे, वे भी अब दोबारा सक्रियता दिखाने लगे हैं—जो संकेत देता है कि अंदरूनी ऊर्जा धीरे-धीरे संगठन में वापस लौट रही है।
आने वाले विधानसभा चुनावों पर नज़र रखते हुए अलका पाल ने स्पष्ट कर दिया है कि उनके लिए लक्ष्य केवल संगठन को फिर से व्यवस्थित करना नहीं, बल्कि आगामी चुनावों में कांग्रेस को एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करना है। इसी वजह से वे दिन-रात बैठकें कर रही हैं, क्षेत्रवार दौरे कर रही हैं और वरिष्ठ नेताओं से लगातार विचार-विमर्श कर रही हैं। कार्यकर्ताओं में उत्साह जगाने के लिए उन्हें नई जिम्मेदारियाँ दी जा रही हैं, ताकि टीम में सक्रियता और प्रक्रियागत अनुशासन दोनों का निर्माण हो सके। शहर के रणनीतिक क्षेत्रों में बूथ प्रभारियों की तैनाती पर भी विचार चल रहा है, जिससे चुनावी समीकरणों को समय रहते मजबूत किया जा सके।

पार्टी के भीतर नए जोश का सबसे बड़ा कारण यह है कि अलका पाल केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सीधे जमीन पर उतरकर काम कर रही हैं। बूथों पर छोटी-छोटी टीमों से मिलना हो या महिला कार्यकर्ताओं के बीच संवाद स्थापित करना—उनकी यह मेहनत संगठन में नई ऊर्जा का संचार कर रही है। कई पुराने सदस्य, जो वर्षों से किनारे हो चले थे, अब फिर से सक्रिय होने की इच्छा जता रहे हैं। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार आने वाले कुछ महीनों में संगठन में बड़े बदलाव संभव हैं और नई टीम की घोषणा भी होने की उम्मीद है।
काशीपुर कांग्रेस की लंबे समय से चली आ रही सबसे बड़ी समस्या—अंदरूनी टूट—आज भी एक वास्तविक चुनौती है। कई पुराने पदाधिकारी और क्षेत्रीय टीमों के बीच लंबे समय से मतभेद हैं, जो संगठन को कमजोर करते रहे। यह वही बिंदु है जिसे सुलझाए बिना कांग्रेस की ताकत वापस नहीं लौट सकती। अलका पाल की रणनीति साफ है कि वे किसी भी गुट को अलग-थलग नहीं होने देंगी और हर पक्ष को साथ लेकर ही आगे बढ़ेंगी। उनका कहना है कि मजबूत संगठन की पहली शर्त आपसी विश्वास है, और इस विश्वास को स्थापित करने के लिए वे लगातार व्यक्तिगत संवाद और खुले कार्यक्रमों पर जोर दे रही हैं।

महिला शक्ति और युवाओं की भागीदारी को लेकर भी वे बेहद गंभीर हैं। अलका पाल का मानना है कि आज के राजनीतिक परिदृश्य में महिलाओं और युवाओं के बिना कोई भी पार्टी ताकतवर नहीं बन सकती। यही कारण है कि वे हर वार्ड में छोटे स्तर की महिला बैठकों में खुद उपस्थित होकर कार्यप्रणाली को मजबूत कर रही हैं। इसके साथ ही युवा कांग्रेस को फिर से सक्रिय करने के लिए अलग योजनाएँ भी तैयार की जा रही हैं, ताकि पार्टी के पास जमीनी स्तर पर एक मजबूत कैडर उपलब्ध हो।
कुल मिलाकर काशीपुर कांग्रेस जिस पुनरुत्थान की उम्मीद वर्षों से कर रही थी, उसकी पहल अब मजबूत कदमों के साथ दिखाई दे रही है। लेकिन आगे की जंग आसान नहीं होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का भी यही मानना है कि संगठन तभी खड़ा होगा, जब पार्टी एकजुट होकर आगे बढ़ेगी। अलका पाल का स्पष्ट संदेश है—“सबका सहयोग, सबकी जिम्मेदारी—यही जीत तक पहुंचने का रास्ता है।” उनकी सक्रियता, गंभीरता और संवाद शैली को देखते हुए यह साफ झलक रहा है कि वे संगठन के लंबे सूखे को खत्म करने के लिए पूरी क्षमता और समर्पण के साथ मैदान में उतर चुकी हैं।



