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अरावली पहाड़ों का अस्तित्व खतरे में अब संरक्षण या खनन का फैसला बनी चुनौती

अरावली पर्वतों की कटाई से उत्तर भारत में मानसून की दिशा और तीव्रता प्रभावित होगी, जिससे बाढ़, भूस्खलन और पारिस्थितिकी संकट बढ़ सकता है, उत्तराखंड समेत पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न होगा।

उत्तराखण्ड(सुनील कोठारी)। अत्यंत ऐतिहासिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व पर अब बड़ा संकट मंडरा रहा है। देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल यह अरावली करीब 3.2 से 3.5 अरब साल पुरानी है और भारतीय उपमहाद्वीप की भूगर्भीय संरचना और मौसम को दिशा देने वाली महत्वपूर्ण श्रृंखला मानी जाती है। इसके संरक्षण के लिए कई दशकों से प्रयास किए गए, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने इस पुराने प्राकृतिक संरक्षक को नए खतरे में डाल दिया है। कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा तय की है, जिसमें 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा नहीं माना जाएगा। इस फैसले का सीधा असर 800 किलोमीटर लंबी पर्वतमाला पर होगा, क्योंकि 90 प्रतिशत से अधिक पहाड़ अब कानूनी रूप से संरक्षित नहीं रहेंगे। इससे न केवल पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित होगा, बल्कि जल संरक्षण, नदियों का बहाव और पारिस्थितिकी तंत्र भी गंभीर संकट में पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली की यह परिभाषा बदलाव प्राकृतिक संसाधनों के अनुचित दोहन को कानूनी रूप से बढ़ावा दे सकती है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) की 2010 की रिपोर्ट के अनुसार, अरावली में 1281 पहाड़ियाँ थीं, जिनमें से केवल 1048 ही नए 100 मीटर के बेंचमार्क को पार कर पाती हैं। इसके परिणामस्वरूप पूरे 90 प्रतिशत हिस्से को संरक्षण से बाहर रखा गया है। हरियाणा और राजस्थान में अवैध खनन की स्थिति पहले ही गंभीर थी। 1975 से 2019 के बीच अरावली के 8 प्रतिशत हिस्से पर अवैध खनन हुआ और 3.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र रेगिस्तानीकरण की चपेट में आ गया। अब कोर्ट के फैसले से यह स्थिति और गंभीर हो सकती है, क्योंकि खनन और निर्माण कार्यों के लिए सरकारी अनुमति दी जाएगी। यह निर्णय सीधे तौर पर पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय जीवन पर प्रभाव डालेगा।

पूर्वाेत्तर राज्यों में शेड्यूल सिक्स के लागू होने का उदाहरण बताते हुए देखा जा सकता है कि स्थानीय लोगों के नियंत्रण में खनिज और संसाधनों का संरक्षण किस प्रकार सुरक्षित रहता है। असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के लिए शेड्यूल सिक्स लागू होने से स्थानीय समुदायों के पास अपनी भूमि और संसाधनों के उपयोग का अधिकार सुरक्षित रहा। उन्हें माइनिंग, उद्योग या होटल निर्माण जैसी गतिविधियों में अनुमति देने का अधिकार प्राप्त हुआ। इसके विपरीत, अरावली में यह नियंत्रण अब स्थानीय समुदायों के हाथ से निकल रहा है और निर्णय केंद्रीय या न्यायिक स्तर पर हो रहा है। इससे पर्यावरणीय संरक्षण की दिशा में वर्षों से चल रहे प्रयासों को बड़ा झटका लगेगा। पूर्वाेत्तर राज्यों का उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि जब स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाता है तो संसाधनों का दोहन संतुलित तरीके से होता है और प्राकृतिक स्थायित्व बना रहता है।

अरावली की रक्षा में विफलता का असर पूरे उत्तर भारत के पर्यावरण पर पड़ेगा। अरावली थार रेगिस्तान को पूरब की ओर बढ़ने से रोकती रही है और साथ ही बारिश के पैटर्न को नियंत्रित करती है। इसके बिना राजस्थान और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्रों में धूल और गर्म हवाओं का स्तर बढ़ सकता है। अरावली नदियों की उत्पत्ति का मुख्य स्रोत है, जिनमें गंगा, यमुना, बनास, साबरमती और चंबल जैसी महत्वपूर्ण नदियाँ शामिल हैं। इन नदियों का जल स्तर और बहाव इस पर्वतमाला पर निर्भर करता है। यदि खनन और अवैध निर्माण बढ़ेगा, तो इन नदियों का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होगा और जलस्रोतों की कमी तथा बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय का असर करोड़ों लोगों के जीवन और कृषि, जल और बायोडायवर्सिटी पर पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अरावली में खनन का रास्ता अब कानूनी रूप से साफ हो गया है। इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन (आईसीएफआरई) को निर्देश दिया गया है कि वे एक वैज्ञानिक अध्ययन के जरिए सस्टेनेबल माइनिंग का रोडमैप तैयार करें। इसका तात्पर्य है कि अब तक अवैध खनन दबे और छुपे तरीके से होता था, जबकि अब इसे वैधता और सरकारी पट्टों के जरिए बढ़ावा दिया जाएगा। इससे अरावली के कई हिस्सों में उद्योग, होटल और अन्य निर्माण गतिविधियों की अनुमति मिलेगी। हालांकि यह कदम सतत विकास की दिशा में सही ठहराया जा सकता है, लेकिन स्थानीय पारिस्थितिकी और वन्यजीवन के दृष्टिकोण से यह खतरे को और बढ़ा देगा।

अरावली की नई परिभाषा और इसके प्रभाव को समझने के लिए इतिहास की ओर भी देखना आवश्यक है। 1995 में तमिलनाडु के जमींदार टीएन गोदावर्मन ने सुप्रीम कोर्ट में नीलगिरी जंगलों की रक्षा के लिए याचिका दायर की थी। कोर्ट ने 1996 में ऐतिहासिक निर्णय दिया कि जंगल की परिभाषा केवल सरकार के नोटिफिकेशन से तय नहीं होगी, बल्कि वास्तविक स्थिति के आधार पर जंगल को संरक्षित किया जाएगा। इसी निर्णय के आधार पर अरावली की परिभाषा भी तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तय की गई। एफएसआई, जीएसआई और सर्वे ऑफ इंडिया की टीमों ने मिलकर नई टेक्निकल कमेटी बनाई, जिसने ढलान, ऊँचाई और दूरी के पैमानों को बदलकर अरावली के संरक्षण के लिए नई सिफारिशें दी। लेकिन कोर्ट के अंतिम फैसले में 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को संरक्षित क्षेत्र से बाहर रखा गया, जिससे अरावली का 90 प्रतिशत हिस्सा संरक्षण से बाहर हो गया।

राजस्थान में अरावली की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि 80 प्रतिशत हिस्सा इसी राज्य में आता है। अरावली की एवरेज ऊँचाई 60 से 90 मीटर तक है, जबकि माउंट आबू की सबसे ऊँची चोटी 1722 मीटर है। अवैध खनन के कारण पहले ही 31 पहाड़ियाँ गायब हो चुकी हैं। हरियाणा में फरीदाबाद के राजावास गांव में वन क्षेत्र घोषित होने के बावजूद माइनिंग विभाग उसी जमीन पर पत्थर खदान के लिए नीलामी करवा रहा था। इससे स्पष्ट है कि सरकारी नीतियाँ और न्यायिक आदेश अरावली की सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अवैध खनन के कारण पर्यावरणीय नुकसान और स्थानीय समुदायों के जीवन पर प्रतिकूल असर बढ़ रहा है।

अरावली पर्वतमाला का संकट केवल वनस्पति और जलस्रोत तक सीमित नहीं है। यह पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता के लिए भी खतरा बन गया है। इस पर्वतमाला में लेपर्ड, टाइगर, भालू और कई अन्य संकटग्रस्त प्रजातियाँ निवास करती हैं। इसके अलावा यह क्षेत्र स्थानीय आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के जीवन का आधार है। यदि खनन और निर्माण गतिविधियाँ बढ़ीं, तो वन्यजीवन का प्राकृतिक आवास प्रभावित होगा और स्थानीय लोगों के जीवन और रोजगार पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। पर्यावरणविदों का कहना है कि अरावली का संरक्षण सिर्फ एक पहाड़ बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत के जल, मौसम और जीवन की सुरक्षा की लड़ाई है।

अरावली की स्थिति केवल राजस्थान और हरियाणा तक सीमित नहीं है। दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की हवा और मौसम पर भी इसका असर पड़ता है। अरावली की कटाई से धूल, गर्म हवाओं और प्रदूषण में वृद्धि होगी। यह क्षेत्र के तापमान को बढ़ाकर गर्मी की लहरों को और तीव्र बना सकता है। अगर मानसून की हवाएँ अरावली के बिना सीधे उत्तराखंड और हिमालय की ओर बढ़ीं, तो भारी वर्षा और बाढ़ जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इससे न केवल कृषि प्रभावित होगी, बल्कि मानव जीवन पर भी गंभीर संकट आ सकता है। यह निर्णय पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय जीवन के लिए गंभीर खतरे का संकेत देता है।

अरावली की नई परिभाषा और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह स्पष्ट होता है कि अब स्थानीय समुदायों का नियंत्रण कम और केंद्रीय या न्यायिक नियंत्रण अधिक होगा। इससे पर्यावरणीय संरक्षण के प्रयासों में बाधा आएगी। शेड्यूल सिक्स के उदाहरण से पता चलता है कि स्थानीय नियंत्रण में संसाधनों का संरक्षण कितना प्रभावी हो सकता है। असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में स्थानीय लोगों के पास माइनिंग और अन्य गतिविधियों में निर्णय लेने का अधिकार था, जिससे प्राकृतिक संसाधनों और जीवन के संतुलन को बनाए रखा गया। वहीं अरावली में यह अधिकार अब स्थानीय लोगों से छिन गया है।

अरावली पर्वतमाला की रक्षा के लिए तत्काल कदम उठाना आवश्यक है। यह केवल एक प्राकृतिक संरचना नहीं, बल्कि लाखों लोगों के जीवन, जलस्रोत, कृषि और जैव विविधता की सुरक्षा का आधार है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले और नई परिभाषा के तहत खनन, निर्माण और अन्य गतिविधियों को सीमित करने के लिए ठोस नीति बनाना जरूरी है। यदि अरावली की सुरक्षा में असफल रहे, तो उत्तर भारत का पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर खतरे में पड़ जाएगा। इसे बचाने के लिए सरकार, न्यायपालिका और स्थानीय समुदायों को मिलकर रणनीति बनानी होगी।

अरावली की स्थिति पर गौर करें तो यह स्पष्ट है कि भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला अब संरक्षण के बजाय दोहन के अधीन होती जा रही है। यह पर्वतमाला थार रेगिस्तान को रोकने, बारिश के पैटर्न को नियंत्रित करने, नदियों और जलस्रोतों को बनाए रखने और बायोडायवर्सिटी के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। अगर इसे संरक्षित नहीं किया गया तो पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक प्रभाव गहन होंगे। इसलिए अरावली को बचाना न केवल पर्यावरणीय दायित्व है, बल्कि पूरे उत्तर भारत और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की जीवनरेखा को बचाने का भी सवाल है।

सारांश में कहा जा सकता है कि अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और सरकारी नीतियाँ अब इस पर्वतमाला के अस्तित्व को सीधे प्रभावित कर रही हैं। अवैध खनन और निर्माण गतिविधियों के लिए कानूनी अनुमति मिलना, वन्यजीवन, जलस्रोत और स्थानीय समुदायों के लिए खतरा बन रहा है। यह निर्णय पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से बेहद चिंताजनक है। यदि तुरंत कदम नहीं उठाए गए तो उत्तर भारत के पारिस्थितिकी तंत्र पर स्थायी प्रभाव पड़ेगा। अरावली की रक्षा केवल प्राकृतिक धरोहर की रक्षा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन और भविष्य की सुरक्षा की लड़ाई है।

उत्तराखंड के लोगों के लिए यह चेतावनी किसी कल्पना का हिस्सा नहीं, बल्कि आने वाले समय की गंभीर सच्चाई बनती जा रही है। अब तक अरावली पर्वतमाला एक प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर की तरह काम कर रही थी, जो पश्चिम से उठने वाली तेज मानसूनी हवाओं और आक्रामक मौसमी सिस्टम को सीधे हिमालय से टकराने से रोकती थी। लेकिन यदि अरावली को कमजोर किया गया या उसके बड़े हिस्से को समाप्त कर दिया गया, तो यह प्राकृतिक सुरक्षा कवच भी खत्म हो जाएगा। इसके बाद मानसून बिना किसी अवरोध के पूरी ताकत के साथ उत्तराखंड की पहाड़ियों पर सीधा हमला करेगा, जिसका परिणाम भयावह भूस्खलन, विनाशकारी बाढ़ और भारी तबाही के रूप में सामने आ सकता है।

जिन लोगों को लगता है कि पहाड़ काट देने से सिर्फ जमीन समतल होती है, वे भूगोल की बुनियादी समझ से भी अनजान हैं। अरावली केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि हवा की दिशा, नमी के दबाव और वर्षा की तीव्रता को संतुलित करने वाली प्राकृतिक दीवार है। जब यह दीवार टूटेगी, तो मानसून की ऊर्जा बिना रुके हिमालय से टकराएगी, जिससे बारिश की तीव्रता कई गुना बढ़ जाएगी। उत्तरकाशी जैसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति केवल एक आशंका नहीं, बल्कि तयशुदा परिणाम बन सकती है।

तब सवाल यह नहीं रहेगा कि किसने पहाड़ काटने की अनुमति दी, बल्कि यह पूछा जाएगा कि समय रहते चेतावनी को क्यों नजरअंदाज किया गया। भूगोल को न समझकर लिए गए फैसले जब प्रकृति के नियमों से टकराते हैं, तो कीमत पूरे समाज को चुकानी पड़ती है। अरावली का कमजोर होना सिर्फ राजस्थान या दिल्ली का संकट नहीं, बल्कि उत्तराखंड के अस्तित्व से जुड़ा सीधा खतरा है, जिसे अनदेखा करना आने वाली पीढ़ियों के साथ बड़ा अन्याय होगा।

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