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अग्रवाल सभा में गूंजा उत्तराखंड के आंदोलनकारियों का हुंकार और सम्मान पत्र पाकर भावुक हुए हकदार

ऐतिहासिक मंच से गरजे संघर्षशील सेनानी और जिला प्रशासन की दोहरी नीतियों के खिलाफ आर-पार की जंग का ऐलान करते हुए हक के लिए आंदोलन तेज करने की दी खुली चेतावनी।

काशीपुर। उत्तराखंड के अस्तित्व की लड़ाई में अपने खून-पसीने की आहुति देने वाले जांबाज वीर सपूतों की धरती काशीपुर में भावनाओं का एक ऐसा ज्वार उमड़ा, जिसने हर आंख को नम और हर सीने को गर्व से चौड़ा कर दिया। श्री अग्रवाल सभा के प्रांगण में आयोजित राज्य निर्माण आंदोलनकारियों के भव्य और ऐतिहासिक सम्मान सम्मेलन में जब बरसों से उपेक्षित बैठे आवेदकों के हाथों में पहली बार सम्मान पत्र सौंपे गए, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट और उत्तराखंडियत के नारों से गूंज उठा। इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बने सैकड़ों आंदोलनकारी अपने संघर्षों को मान्यता मिलता देख खुशी से झूम उठे और मंच पर मौजूद अतिथियों का आभार जताते हुए भावुक हो गए। इस विशेष महा-सम्मेलन में नगर के उन तमाम संघर्षशील चेहरों ने शिरकत की थी जो पिछले दो दशकों से ज्यादा समय से सरकारी फाइलों में दबे अपने हक और पहचान के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। लंबे समय से उपेक्षा का दंश झेल रहे इन आंदोलनकारियों के चेहरों पर आज एक नई उम्मीद और आत्मसम्मान की एक अनोखी चमक साफ दिखाई दे रही थी, जिसने इस पूरे आयोजन को राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनता के बीच चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बना दिया है।

इस गौरवमयी और ऐतिहासिक कार्यक्रम का शंखनाद बेहद भावुक और गरिमामयी क्षणों के साथ हुआ, जब नगर के घोषित और मान्यता प्राप्त आंदोलनकारियों का मंच पर आगमन हुआ। उत्तराखंड राज्य निर्माण सक्रिय आंदोलनकारी समिति की प्रदेश, जिला और नगर इकाइयों के तमाम पदाधिकारियों सहित वहां उपस्थित सभी आवेदकों ने खड़े होकर करतल ध्वनि के बीच नरपत सिंह राजपूत, राजेन्द्र पाल और शोभित कुमार का मालाएं पहनाकर तथा शॉल ओढ़ाकर बेहद भव्य और जोरदार स्वागत किया। इन जांबाज सेनानियों का सम्मान करते हुए उपस्थित जनसमूह के भीतर उत्तराखंड आंदोलन के दिनों की वो यादें ताजा हो गईं जब इन लोगों ने लाठियां और गोलियां खाकर इस राज्य की नींव रखी थी। इन सम्मानित विभूतियों ने भी हाथ जोड़कर सभी आवेदकों का अभिवादन स्वीकार किया और यह साफ संदेश दिया कि जब तक उनके आखिरी साथी को भी सरकारी तौर पर आंदोलनकारी का दर्जा नहीं मिल जाता, तब तक उनका यह संयुक्त मंच किसी भी कीमत पर खामोश बैठने वाला नहीं है।

कार्यक्रम के मुख्य सूत्रधार और संचालन की कमान संभाल रहे जिला महामंत्री विनय विश्नोई ने मंच संभालते ही अपनी ओजस्वी और बुलंद आवाज में उपस्थित जनसमूह के भीतर जोश का एक नया संचार कर दिया। उन्होंने सभी आंदोलनकारी परिवारों को विस्तार से संबोधित करते हुए कहा कि चिन्हीकरण की इस बेहद जटिल और लंबी लड़ाई को अंतिम मुकाम तक पहुंचाने के लिए राज्य निर्माण सक्रिय आंदोलनकारी समिति उत्तराखंड ने अब आर-पार की एक नई और अचूक रणनीति तैयार कर ली है। उन्होंने खुलासा किया कि कोर कमेटी की बंद कमरे में हुई मैराथन बैठकों में आगे की कानूनी और प्रशासनिक कार्यवाही पर बेहद गहन विचार-विमर्श और मंथन किया गया है। विनय विश्नोई ने जोर देकर कहा कि इस निर्णायक जंग को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए सभी प्रमुख पदाधिकारियों को अलग-अलग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां वितरित की जा चुकी हैं, ताकि पूरी एकजुटता और आपसी सहयोग के साथ पूर्व की भांति हर प्रशासनिक कार्यवाही को पूरी पारदर्शिता और मजबूती के साथ अंजाम दिया जा सके।

इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए प्रदेश स्तरीय कोर कमेटी की ओर से आए प्रखर वक्ता और प्रदेश महामंत्री नीरज ठाकुर ने काशीपुर नगर के सभी आवेदित आंदोलनकारियों के सामने आकर एक-एक व्यक्ति को पूरी तरह से आश्वस्त किया। उन्होंने पूरी दृढ़ता के साथ घोषणा की कि उनकी यह केंद्रीय समिति नगर के लगभग 215 आवेदित राज्य निर्माण आंदोलकारियों के अधिकारिक चिन्हीकरण और उनके जायज कानूनी अधिकारों को दिलाने के लिए पूरी तरह से संकल्पित और संघर्षरत है। नीरज ठाकुर ने विरोधियों और शरारती तत्वों पर निशाना साधते हुए कहा कि नगर के हमारे सीधे-साधे और सच्चे आवेदित राज्य आंदोलनकारी किसी भी प्रकार के झूठे भ्रम, अफवाह या किसी बाहरी व्यक्ति के बहकावे में बिल्कुल न आएं। उन्होंने मंच से बड़ा प्रशासनिक अपडेट साझा करते हुए बताया कि उनकी प्रदेश इकाई लगातार देहरादून में राज्य सम्मान परिषद के माननीय अध्यक्ष, मुख्य सचिवालय के आला अधिकारियों और जिला प्रशासन के कार्यालयों के साथ सीधे संपर्क में है और बहुत जल्द इसका सकारात्मक परिणाम सबके सामने आने वाला है।

मंच की पूरी व्यवस्था और कमान अपने हाथों में लेते हुए नगर के ऊर्जावान महामंत्री अनुराग सारस्वत ने सम्मेलन के इस विशाल पांडाल में सुदूर क्षेत्रों से आए सभी आवेदकों और उनके परिजनों का नगर कमेटी की तरफ से खुला स्वागत किया और उनके धैर्य की जमकर सराहना की। इसके तुरंत बाद अनुराग सारस्वत ने पूरी शालीनता और सम्मान के साथ समिति के मुख्य संरक्षक से विशेष रूप से आग्रह किया कि वह मंच पर आएं और अपने लंबे सामाजिक और राजनीतिक जीवन के अनुभवों के निचोड़ से इन सभी संघर्षरत आवेदकों का उचित मार्गदर्शन करें। मुख्य संरक्षक ने जैसे ही माइक संभाला, पूरा अग्रवाल सभा भवन शांत हो गया क्योंकि हर कोई उनकी दूरदर्शी सोच और आगामी रणनीति को सुनने के लिए बेहद उत्सुक था। उन्होंने अपने बेहद नपे-तुले और गंभीर संबोधन में कहा कि पिछले 21 वर्षों का एक लंबा कालखंड बीत जाने के बाद भी हमारे आंदोलनकारी परिवार के ये जांबाज साथी सिर्फ अपने नाम के चिन्हीकरण के लिए भटक रहे हैं, जो कि बेहद चिंताजनक है।

मुख्य संरक्षक ने इस ऐतिहासिक मंच से पूरी प्रतिबद्धता जताते हुए कहा कि हम सभी नगर के पहले से घोषित आंदोलनकारी अपने इन तमाम छूटे हुए साथियों के हक की इस लड़ाई में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं और हमारा पूरा तंत्र इनका सहयोग कर रहा है। उन्होंने दहाड़ते हुए कहा कि यह केवल एक मांग नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व का सवाल है और हम सरकार की चौखट से अपने इन सभी वीर साथियों को उनका असली मान-सम्मान और हक दिलाकर ही दम लेंगे। इस जोशीले भाषण के तुरंत बाद कार्यक्रम के सबसे भावुक क्षण की शुरुआत हुई, जब मुख्य मंच से घोषित आंदोलनकारियों द्वारा वहां मौजूद 60 योग्य आवेदकों को एक-एक करके मंच पर बुलाया गया और उन्हें “उत्तराखंड सक्रिय आंदोलन सम्मान पत्र” का वितरण किया गया। जैसे ही इन आवेदकों ने अपने हाथों में वो चमचमाता हुआ सम्मान पत्र थामा, कई बुजुर्ग आंदोलनकारियों की आंखों से आंसू छलक पड़े और वे अपने बरसों के संघर्ष को इस रूप में सम्मानित होते देख खुद को बेहद गौरवान्वित और धन्य महसूस करने लगे।

आयोजन की इस गौरवमयी बेला को आगे बढ़ाते हुए नगर अध्यक्ष ने स्थानीय जिला प्रशासन के काम करने के तौर-तरीकों पर बेहद तीखे और गंभीर सवाल खड़े करते हुए माहौल को और अधिक गर्मा दिया। उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि ऊधमसिंह नगर का जिला प्रशासन एक ही जिले के भीतर दो अलग-अलग मानकों और दोहरी नीतियों के आधार पर भेदभावपूर्ण कार्य कर रहा है, जिसे अब किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। नगर अध्यक्ष ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि खटीमा क्षेत्र के आवेदकों के चिन्हीकरण और उनके आवेदनों पर तो प्रशासनिक अमला तुरंत विचार करता है और उन्हें राहत देता है, परंतु जब बात काशीपुर के वीर आवेदकों की आती है तो जिला प्रशासन हर बार ठंडे बस्ते का रुख कर लेता है और फाइलों को दबा दिया जाता है। उन्होंने कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि इस बार हम सरकार के आगे हाथ फैलाकर भीख नहीं मांगेंगे, बल्कि अपने इस लोकतांत्रिक अधिकार को शासन-प्रशासन के हलक से छीनकर बाहर लाएंगे और अपना हक लेकर रहेंगे। इसके साथ ही उन्होंने इस पूरी मुहिम को जन-जन तक पहुंचाने के लिए वहां मौजूद तमाम निर्भीक मीडिया कर्मियों का भी दिल से आभार जताया।

इस ऐतिहासिक और गरिमामयी सम्मान सम्मेलन की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें क्षेत्र की कई जानी-मानी और सम्मानित शख्सियतों ने एक साथ एक मंच पर बैठकर आंदोलनकारियों की आवाज को बुलंद किया। इस महा-आयोजन में मुख्य रूप से वेद प्रकाश विद्यार्थी, संदीप सहगल, मंयक गुप्ता, मीनू लता गुप्ता, महेन्द्र खुराना, महेन्द्र कुमार, राम सिंह, इरशाद, दीपक कश्यप, सुनील प्रताप सिंह, डा0 दिनेश शर्मा, भूपेन्द्र कुमार, रामकुमार, सतीश कुमार, विनोद कुमार, जयपाल सिंह अहेरिया, रिजवान अहमद, डा0 ए. के. सेन, अमित शर्मा, विनय शर्मा, अरविन्द कुमार, सुभाष चन्द्र शर्मा, एड0 जगदीश पनेरू, सुशील कुमार विक्की, सुशील शर्मा, दिशा गुप्ता, संजीव कुमार, कृष्ण कुमार सारस्वत और सावित्री देवी जैसी तमाम बड़ी हस्तियां आदि सहित प्रमुख रूप से उपस्थित रहीं। इन सभी प्रबुद्ध नागरिकों ने एक सुर में कहा कि उत्तराखंड के विकास की कहानी इन आंदोलनकारियों के सम्मान के बिना अधूरी है, और जब तक हर एक सच्चे सेनानी को उसका अधिकार नहीं मिल जाता, तब तक काशीपुर से शुरू हुई यह चिंगारी पूरे प्रदेश में एक महा-आंदोलन का रूप ले सकती है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी केवल और केवल गूंगे-बहरे प्रशासन की होगी।

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